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मंदिरों में हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही क्यों लगाई जाती है परिक्रमा, जानिए इसका महत्व और कारण

Parikrama: मंदिर की प्रतिमा में दिव्य कंपन होते हैं. घड़ी की सुई की दिशा में परिक्रमा करने पर हमारा शरीर उन सकारात्मक ऊर्जाओं को बेहतर ढंग से ग्रहण कर पाता है.

मंदिरों में हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही क्यों लगाई जाती है परिक्रमा, जानिए इसका महत्व और कारण
Parikrama kaise karni chahiye
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Parikrama Kaise Karni Chahiye: आप जब भी किसी मंदिर में जाते हैं तो वहां आपने देखा होगी कि हमेशा परिक्रमा घड़ी की सुई की दिशा में लगाई जाती है. दरअसल, मंदिरों में घड़ी की सुई की दिशा में यानी क्लॉकवाइज परिक्रमा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसे सिर्फ धार्मिक रीति नहीं बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. मंदिर का गर्भगृह एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र होता है. मंदिर में क्लॉकवाइज परिक्रमा करना केवल रिवाज नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा दिशा के साथ तालमेल बिठाने का वैज्ञानिक तरीका है. सही तरीके से की गई परिक्रमा व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है.

घड़ी की सुई की दिशा में परिक्रमा के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांत भी है. उत्तरी गोलार्ध में परिक्रमा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है, क्योंकि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुकूल है. धर्म शास्त्रों के अनुसार, परिक्रमा के दौरान अगर बाल गीले हों तो ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है. इससे भी बेहतर है कि पूरे कपड़े गीले हों. सबसे अधिक लाभ तब मिलता है जब व्यक्ति गीले कपड़ों में परिक्रमा करता है. गीले कपड़े शरीर को लंबे समय तक नम रखते हैं, जिससे ऊर्जा का अवशोषण बेहतर होता है. गीले कपड़ों में करना अधिक व्यावहारिक और बेहतर है, क्योंकि शरीर जल्दी सूख जाता है.

देवताओं के अनुसार परिक्रमा

मंदिरों में विभिन्न देवताओं की परिक्रमा संख्या भी अलग-अलग तय है. धर्मशास्त्र के अनुसार, गणेश जी की तीन बार, विष्णु जी की चार बार, देवी दुर्गा की एक बार और भगवान शिव की आधी परिक्रमा या जलधारी तक करने की परंपरा है. यह नियम ऊर्जा संतुलन और भक्ति के अनुसार बनाए गए हैं.

घड़ी की सुई की दिशा में परिक्रमा करने के लाभ

सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह- मंदिर की प्रतिमा में दिव्य कंपन होते हैं. घड़ी की सुई की दिशा में घूमने से हमारा शरीर उन सकारात्मक ऊर्जाओं को बेहतर ढंग से ग्रहण कर पाता है.

प्रकृति के साथ तालमेल- दक्षिणावर्त परिक्रमा सूर्य के उगने और अस्त होने की दिशा (पूर्व से पश्चिम) का अनुसरण करती है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है.

ईश्वर को दाईं ओर रखना- परिक्रमा करते समय, इष्ट देव हमेशा भक्त के दाईं ओर रहते हैं, जिसे शुभ माना जाता है.

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