आज 10 अगस्त को सावन का दूसरा सोमवार है और इसी दिन प्रदोष व्रत भी पड़ रहा है. सोमवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है. हिंदू धर्म में यह दिन भगवान शिव की पूजा के लिए बेहद खास माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से महादेव की आराधना करने और प्रदोष व्रत की कथा सुनने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. सावन सोमवार और सोम प्रदोष का संयोग होने से आज का दिन शिव भक्तों के लिए और भी विशेष माना जा रहा है.
प्रदोष व्रत में कथा सुनना क्यों माना जाता है जरूरी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष व्रत रखने वाले भक्तों को पूजा के साथ इसकी कथा भी सुननी या पढ़नी चाहिए. ऐसा माना जाता है कि कथा के बिना पूजा अधूरी रह सकती है. वहीं, जो लोग व्रत नहीं रख पाए हैं, वे भी प्रदोष काल में श्रद्धा से कथा सुन सकते हैं. इससे पुण्य की प्राप्ति होने की मान्यता है.
यहां पढ़ें प्रदोष व्रत की कथापौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ रहती थी. उसके पति का देहांत हो चुका था. घर में कमाने वाला कोई नहीं था, इसलिए वह अपने बेटे के साथ भिक्षा मांगकर जीवन चलाती थी.
एक दिन घर लौटते समय ब्राह्मणी को रास्ते में एक घायल युवक दिखाई दिया. वह दर्द से परेशान था. ब्राह्मणी के मन में दया जागी और वह उसे अपने घर ले आई. असल में वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था. दुश्मनों ने उसके राज्य पर हमला कर दिया था और उसके पिता को बंदी बना लिया था. राजकुमार अपना सब कुछ खोकर भटक रहा था.
ब्राह्मणी को इस बात की जानकारी नहीं थी, फिर भी उसने राजकुमार को अपने बेटे की तरह पाला. कुछ समय बाद ब्राह्मणी दोनों बच्चों को लेकर ऋषि शांडिल्य के आश्रम पहुंची. ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से पहचान लिया कि वह बालक विदर्भ का राजकुमार है. उन्होंने ब्राह्मणी को भगवान शिव की भक्ति करने और प्रदोष व्रत रखने का महत्व बताया. ऋषि की बात मानकर ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया. समय के साथ भगवान शिव की कृपा से उनके जीवन में अच्छे बदलाव आने लगे.
एक दिन जंगल में घूमते समय अंशुमति नाम की एक गंधर्व कन्या की नजर राजकुमार पर पड़ी. वह राजकुमार को पसंद करने लगी. अंशुमति अपने माता-पिता को भी राजकुमार से मिलाने लाई. उन्हें भी राजकुमार पसंद आया.
उन्होंने भगवान शिव की प्रेरणा से अपनी पुत्री का विवाह धर्मगुप्त के साथ कर दिया.
उधर ब्राह्मणी नियमित रूप से प्रदोष व्रत रखती और भगवान शिव की पूजा करती थी. मान्यता है कि उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वों की सेना की सहायता से धर्मगुप्त ने अपने शत्रुओं को हराकर अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त कर लिया. कहा जाता है कि जैसे प्रदोष व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी और राजकुमार के जीवन में अच्छे दिन लौटे, वैसे ही भगवान शिव अपने भक्तों के जीवन में सुख और शांति लाते हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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