Gauri Vrat 2026 Puja Vidhi and Significance: हिंदू धर्म में आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी यानि देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर आषाढ़ी पूर्णिमा तक रखे जाने वाले गौरी व्रत (Gauri Vrat) का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. भगवान शिव को समर्पित पवित्र श्रावण मास (सावन का महीना) शुरू होने से ठीक पहले रखा जाने वाला यह माता पार्वती का आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है. गौरतलब है कि हिंदू धर्म में माता पार्वती का एक नाम गौरी भी है. इस व्रत को गुजरात में 'मोड़ाकत व्रत' (Morakat Vrat) के नाम से भी जाना जाता है. आइए जानते हैं कि गौरी व्रत को किस कामना के लिए कब से कब तक रख जाएगा और क्या इसकी पूजा विधि क्या है?

गौरी व्रत का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार जिस आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि से गौरी व्रत की शुरुआत होती है, वह 25 जुलाई 2026, शनिवार को पड़ेगी और यह व्रत 29 जुलाई 2026 यानि गुरु पूर्णिमा के दिन समाप्त होगा. पंचांग के अनुसार जिस दिन गौरी व्रत की शुरुआत होगी, उस दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रात:काल 04:16से 04:57 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:00 से लेकर 12:55 बजे तक रहेगा. यह व्रत सुख-सौभाग्य की कामना लिए पूरे पांच दिनों तक रखा जाएगा.
गौरी व्रत की पूजा विधि

पांच दिवसीय गौरी व्रत के पहले दिन कुंआरी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं स्नान-ध्यान करने के बाद इस पावन व्रत को विधि-विधान से करने का संकल्प लेती है. इसके बाद पवित्र मिट्टी से माता गौरी की प्रतिमा बनाती हैं तथा एक मिट्टी के पात्र में गेहूं के बीज बोकर जवारा स्थापित करती हैं और प्रतिदिन माता गौरी के साथ उसकी भी पूजा करती हैं. सुख-सौभाग्य की कामना लिए हुए युवतियां इस दिन रुई से एक माला बनाकर उसे सिंदूर से सजाती हैं. गौरी व्रत की पूजा में देवी पार्वती के साथ भगवान शिव और भगवान श्री गणेश जी की पूजा भी की जाती है.
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माता पार्वती को समर्पित इस व्रत में सुबह-शाम पूजा और आरती करने के साथ कुछेक जगहों पर व्रत के आखिरी दिन रात्रि जागरण की परंपरा भी निभाई जाती है. गौरी व्रत का पारण आखिरी दिन विधि-विधान से किया जाता है. इस व्रत में नमक और टमाटर का सेवन नहीं किया जाता है. गौरी माता को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए युवतियों को इस व्रत की पूजा में प्रत्येक दिन 'ॐ देवी महागौर्यै नमः' मंत्र का अधिक से अधिक जप करना चाहिए।
गौरी व्रत का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में मां पार्वती को समर्पित गौरी व्रत मुख्य रूप से गुजरात और पश्चिमी राज्यों में कुंआरी कन्याओं द्वारा मनचाहे जीवनसाथी की कामना से रखा जाता है. इसे 'मोड़ाकत व्रत' और 'आलुना व्रत' आदि के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को करने पर अविवाहित कन्याओं को देवों के देव महादेव के समान सुयोग्य,संस्कारी और गुणी पति प्राप्त होता है. यह व्रत पूरे पांच दिनों तक रखा जाता है. इस व्रत को सुहागिन महिलाएं भी सुखी वैवाहिक जीवन और अपने परिवार के कल्याण की कामना लिए हुए रखती हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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