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Sant Ki Seekh: सद्गुरु वो पारस पत्थर हैं जो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल देते हैं

Guru Purnima 2026: संत और ज्ञानी लोग सद्गुरु की तुलना पारस पत्थर से क्यों करते हैं? सद्गुरु पारस पत्थर और देवताओं से भी ज्यादा महान कैसे हैं? अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गुरु की महिमा को विस्तार से बता रहे हैं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति एवं प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक डॉ. चिन्मय पंण्ड्या.

Sant Ki Seekh: सद्गुरु वो पारस पत्थर हैं जो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल देते हैं
Guru Purnima 2026: सद्गुरु ही शिष्य के अज्ञान का आवरण हटाते हैं
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Guru Purnima 2026 Significance: भारतीय अध्यात्म में सद्गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु परम चेतना के प्रतिनिधि हैं. वे शिष्य के जीवन से अज्ञान, मोह और भ्रम के आवरण हटाकर उसके अंतःकरण में ज्ञान, विवेक और आत्मबोध का प्रकाश प्रज्वलित करते हैं. इसीलिए शास्त्रों ने गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष प्रतिष्ठित करते हुए उन्हें साक्षात् परब्रह्म का स्वरूप माना है. गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व इसी गुरु-तत्त्व के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आत्ममंथन का महापर्व है.

शास्त्रकारों ने कहा है-

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन-शलाकया.
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः.

अर्थात्-जो सद्गुरु ज्ञानरूपी अंजन से अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए शिष्य की अंतर्दृष्टि का उद्घाटन करते हैं, उन श्रीगुरुदेव को बार-बार प्रणाम है.

सद्गुरु की महिमा

गुरु गीता में गु का अर्थ अंधकार और रु का अर्थ प्रकाश बताया गया है. यानि गुरु वही है, जो मनुष्य के भीतर संचित अज्ञान, दुर्बलताओं और विकृतियों का निवारण कर उसके जीवन में आत्मज्ञान का सूर्य उदित कर दे. गुरु का कार्य केवल उपदेश देना नहीं, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व का नवसृजन करना है. वे जीवन को दिशा ही नहीं देते, उसे दिव्यता की ओर अग्रसर भी करते हैं.

गोस्वामी तुलसीदास जी ने सद्गुरु को नररूप में नारायण कहा है. श्रद्धा और समर्पण से युक्त शिष्य ही गुरु-वाणी के वास्तविक मर्म को ग्रहण कर पाता है. उसके लिए गुरु का प्रत्येक वचन साधना का सूत्र, प्रत्येक संकेत जीवन का मार्गदर्शन और प्रत्येक प्रेरणा आत्मोत्कर्ष का द्वार बन जाती है.

महाकवि तुलसीदास लिखते हैं -

बंदऊँ गुरुपद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा.
अमिय मूर्तिमय चूरन चारू, समन सकल भव-रुज परिवारू.

गुरुचरणों की रज साधक के अंतःकरण का परिष्कार करती है. उसके प्रभाव से जीवन में सुरुचि, सुवास, सरसता और अनुराग जैसे दिव्य गुणों का विकास होता है. सुरुचि मनुष्य को आदर्श जीवन की ओर प्रेरित करती है. सुवास उसके व्यक्तित्व को सद्गुणों की सुगंध से भर देती है. सरसता संवेदनशीलता, करुणा और आत्मीयता का विकास करती है तथा अनुराग गुरु के आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा और समर्पण का आधार बनता है.

गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा

वास्तव में गुरु के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल उनके चरणों में प्रणाम करना नहीं, बल्कि उनके बताए जीवन-दर्शन को अपने विचार, व्यवहार और चरित्र में उतारना है. जब शिष्य अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ और संकीर्णताओं का परित्याग कर आत्मपरिष्कार की साधना में प्रवृत्त होता है, तभी वह गुरु-कृपा का वास्तविक अधिकारी बनता है.

Sant Ki Seekh: तीर्थ क्या है? आखिर जीवन के लिए क्यों जरूरी होती है तीर्थ यात्रा?

युगऋषि पं श्रीराम शर्मा आचार्यश्री कहते हैं कि गुरु का सबसे बड़ा अनुग्रह यह है कि वह शिष्य के अंतःकरण में सोई हुई देवत्व की शक्ति को जगाता है. वे कहते हैं गुरु की कृपा का अर्थ चमत्कार नहीं, वरन् अपने दोषों को छोड़ने और श्रेष्ठता अपनाने की प्रेरणा प्राप्त होना है.

गुरु पूर्णिमा का धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व

गुरु पूर्णिमा हमें स्मरण कराती है कि गुरु बाहर से जितना मार्ग दिखाते हैं, उससे कहीं अधिक वे हमारे भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाते हैं. उनका सान्निध्य व्यक्ति को साधारण से असाधारण, सीमित से असीम और स्वार्थ से लोकमंगल की दिशा में अग्रसर करता है. यही सद्गुरु की वास्तविक कृपा है और यही गुरु-शिष्य परंपरा का सनातन संदेश भी. इस गुरु पूर्णिमा पर हम सभी गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा को केवल भावनाओं तक सीमित न रखें, बल्कि आत्मपरिष्कार, सेवा, साधना और युगनिर्माण के संकल्प के रूप में जीवन में उतारें. यही सद्गुरु के प्रति सच्ची गुरुदक्षिणा होगी और यही उनके प्रति हमारी वास्तविक कृतज्ञता. 

लेखक देवसंस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार के प्रतिकुलपति एवं प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक हैं. 

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