टीम इंडिया के चोटिल खिलाड़ियों की लिस्ट बेहद लंबी हो गईन है- क़रीब दर्जन भर से ज़्यादा. वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप-WTC के साइकिल में भारत को श्रीलंका के ख़िलाफ़ 15 अगस्त से दो टेस्ट मैच की सीरीज़ खेलनी है. इस सीरीज़ में जसप्रीत बुमराह से लेकर साई सुदर्शन जैसे खिलाड़ी नहीं खेल पाएंगे. हार्दिक पांड्या तो लंबे समय से पहले से ही बाहर हैं. टीम इंडिया को फ़ाइनल में पहुंचने के लिए बाक़ी के 9 में से 7 टेस्ट मैच जीतने हैं. ऐसे में स्टार खिलाड़ियों का चोटिल होना ज़ाहिर तौर पर बड़े सवाल खड़े करता है.
सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस पहुंची NDTV की टीम
NDTV की टीम ने संवाददाता रिका राय के साथ बेंगलुरु के सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस-COE पहुंचकर इसकी वजहों को जानने की कोशिश की. COE के इंचार्ज और पूर्व टेस्ट क्रिकेटर VVS लक्ष्मण का कहना है कि इस सुविधा को सिर्फ रिहैबिलिटेशन सेंटर के तौर पर मानना सही नहीं है. वीवीएस लक्ष्मण का मानना है कि सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस एक ऐसी जगह है जहाँ क्रिकेटर बेहतर होने, रिकवर करने और अंततः अपना बेस्ट हासिल करने आते हैं.
तो फिर, आखिर 40 एकड़ में फैले इस सेंटर के अंदर होता क्या है? और BCCI कैसे तय करता है कि कोई चोटिल खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी के लिए तैयार है या नहीं? CoE के प्रमुख वीवीएस लक्ष्मण ने इस धारणा को खारिज किया कि यह सिर्फ एक रिहैब सेंटर भर है. लक्ष्मण मानते हैं कि क्रिकेटर यहां अपनी उत्कृष्टता की तलाश में आते हैं.
40 एकड़ में फैला है क्रिकेट की मॉडर्न लैबोरेट्री
40 एकड़ में फैली यह सुविधा अंडर-16 से लेकर राष्ट्रीय टीमों- पुरुष और महिला- तक के क्रिकेटरों को तैयार करने के लिए बनाई गई है. यहाँ 45 पिचें हैं, जिनमें काली मिट्टी, लाल मिट्टी और कालाहांडी मिट्टी का इस्तेमाल होता है, ताकि खिलाड़ी अलग-अलग परिस्थितियों के लिए तैयारी कर सकें.

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मेलबर्न, लॉर्ड्स से भी बेहतर सुविधाएं, 45 पिच
स्पोर्ट्स साइंस और रिहैबिलिटेशन की सुविधाएँ दुनिया की टॉप क्लास उम्दा सुविधाओं से किसी तरह कमतर नहीं हैं. लक्ष्मण कहते हैं, “हमने मेलबर्न और लॉर्ड्स से भी बेहतर सुविधाएँ तैयार की हैं. लेकिन यही वह जगह भी है जहाँ चोटिल होकर बाहर हुए भारतीय क्रिकेटर आते हैं. फिलहाल यहाँ लगभग एक दर्जन खिलाड़ी अलग-अलग चोटों से उबर रहे हैं.”

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इस सेंटर में दुनिया के अलग अलग तरह की 45 पिच खिलाड़ियों को सभी हालात में खुद को ढालने में भी मदद करती हैं. खिलाड़ियों के चोटिल होने की वजह से CoE के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं. आलोचकों कहते हैं कि कहीं खिलाड़ियों को कभी-कभी राष्ट्रीय टीम में पूरी तरह फिट होने से पहले ही भेज तो नहीं दिया जाता. जसप्रीत बुमराह और साई सुदर्शन को लेकर इसी वजह से बहस तेज़ हो गई है.
‘दोष' देना ठीक नहीं
CoE के इंचार्ज वीवीएस लक्ष्मण कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि हमें ‘दोष' शब्द इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि जब आप ‘दोष' कहते हैं तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कोई चूक हुई है या जवाबदेही से बचा गया है. मुझे ऐसा नहीं लगता.
CoE और टीम मैनेजमेंट में कैसा है तालमेल?
लक्षमण बताते हैं कि सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस टीम मैनेजमेंट और सपोर्ट स्टाफ़ और कोच के बीच अच्छा तालमेल होता है. वो कहते हैं, “अब आप बुमराह और साई सुदर्शन की बात कर रहे हैं. जब हम फिटनेस स्टेटस रिपोर्ट भेजते हैं, तो प्रक्रिया यह है कि चयनकर्ता CoE से खिलाड़ी की फिटनेस स्टेटस मांगते हैं. हम खिलाड़ी की मौजूदा फिटनेस का आकलन करके चयन समिति के अध्यक्ष या महिला चयन समिति की अध्यक्ष को फिटनेस रिपोर्ट भेजते हैं. इसकी एक कॉपी संबंधित टीम के हेड कोच और BCCI को भी भेजी जाती है."
लक्ष्मण ने बताया कि जबकि खिलाड़ी रिकवरी प्रोग्राम से गुजरता तो प्रोटोकॉल CoE, टीम मैनेजमेंट, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग स्टाफ और चयनकर्ताओं के बीच लगातार बातचीत पर आधारित होता है. लक्ष्मण के लिए असली मुद्दा शीर्ष स्तर पर खिलाड़ियों पर पड़ने वाले दबाव को मैनेज करना है.

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इंजरी के बावजूद क्यों चुन लिए जाते हैं खिलाड़ी?
BCCI के सचिव देवजीत सैकिया कहते हैं, "टीम का चयन मैच से तीन-चार हफ्ते पहले हो जाता है. उस समय हमें खिलाड़ी की सटीक स्थिति नहीं पता होती. इसलिए ‘सब्जेक्ट टू फ़िटनेस- subject to fitness' का स्टार लगाया जाता है क्योंकि वह खिलाड़ी रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम में होता है. अगर वह 21 या 28 दिन में फिट हो जाता है, तो उसे टीम में शामिल कर लिया जाएगा. इसीलिए हम उसे सीधे खारिज नहीं करते. चयन के दिन अगर वह फिट नहीं है तो उसे बाहर रखना पड़ सकता है. लेकिन जब उसे मैच खेलना हो तब तक वह पूरी तरह फिट हो सकता है.”
बड़ी फ़िक्र नहीं?
लक्ष्मण कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि यह फ़िक्र की वजह से. लेकिन जाहिर है, जब कोई एलीट स्तर पर खेलता है तो उसे 100% से ज्यादा देना होता है. क्योंकि अगर आप ऐसा नहीं करते तो आप अपने रोल और उस उद्देश्य के साथ न्याय नहीं कर रहे जिसके लिए आपका चयन हुआ है.”
लक्ष्मण ये भी कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि आज के खिलाड़ियों को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा क्रिकेट खेलना पड़ता है, खासकर T20 और तीनों फॉर्मेट जुड़ने के बाद. लेकिन यहीं पर CoE और सपोर्ट स्टाफ़ और कोच की कोशिशें उनके काम आती हैं. वो ये भी कहते हैं कि यह सिर्फ कॉन्ट्रैक्टेड या टार्गेटेड खिलाड़ियों के लिए नहीं है, इससे राज्य स्तर के खिलाड़ियों को भी फायदा होगा.
CoE में स्पोर्ट्स साइंस सेटअप का सिर्फ एक हिस्सा रिहैबिलिटेशन है. परफॉर्मेंस, घरेलू क्रिकेट और शिक्षा इसके दूसरे अहम हिस्से हैं. यहाँ एक एथलीट मैनेजमेंट सिस्टम भी है जो पिछले चार साल से खिलाड़ियों और उनकी प्रगति को ट्रैक कर रहा है.

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दुनिया में दी जाती है मिसाल
बड़ी बात ये है कि सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस का काम सिर्फ भारत के एलीट क्रिकेटरों तक सीमित नहीं है. इस सिस्टम में गैर-एलीट खिलाड़ी भी शामिल हैं, जिससे BCCI को खिलाड़ियों के विकास और वर्कलोड की बड़ी तस्वीर सामने आती है.

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क्रिकेट में मेलबर्न और लॉर्ड्स की मिसाल दी जाती है कि कैसे लंबे समय से स्पोर्ट्स साइंस से परफॉर्मेंस को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है. BCCI का सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस-CoE अब उसी मॉडल को बड़े पैमाने पर बनाने की कोशिश कर रहा है- युवा घरेलू खिलाड़ियों से लेकर भारत के स्टार खिलाड़ियों तक. और इसी वजह से दुनिया भर के क्रिकेटर और टीमें अब बेंगलुरु आ रही हैं, ताकि यहाँ जो बन रहा है उससे सीख सकें.
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