पूर्व क्रिकेटर रॉबिन उथप्पा सक्रिय क्रिकेट से खेलने के बाद एक नहीं, कई काम कर रहे हैं. वह हाई परफॉरमेंस कोच हैं, स्टार्ट-अप बिजनस में निवेश करते हैं. मॉटिवेशनल स्पीकर हैं. लेखन भी उनका उम्दा है और न जाने क्या-क्या! इन दिनों वह सोशल मीडिया पर अपना अनुभव साझा कर रहे हैं. हाल ही में बहुत कम उम्र में अमीर बनने वाले युवाओं को पैसे के इस्तेमाल पर नसीत देने के बाद अब रॉबिन एक और विषय के साथ सामने आए हैं. और यह है बढ़ती उम्र के साथ ही इसे व्यवस्थित रखने के तरीकों में बदलाव आदि के बारे में
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'डेढ़ दशक पहले की बातों से उम्मीद बेमानी'
रॉबिन ने सोशल मीडिया पर किए पोस्ट में लिखा, 'मैं अब वह इंसान नहीं रहा जो 25 साल की उम्र में था, और मुझे होना भी नहीं चाहिए मेरा शरीर बदल चुका है. वैसे ही मेरा काम, मेरा माहौल और जिम्मेदारियों का बोझ भी बदल गया है. यह सोचना बिल्कुल बेमानी है कि जो सिस्टम तब काम करते थे, वे आज भी ठीक उसी तरह काम करेंगे.' उथप्पा ने आगे कहा, 'कई हाई परफॉर्मर्स एक ऐसा रूटीन ढूंढ लेते हैं जो उनके लिए काम करता है, और फिर वे उससे गहरे रूप से जुड़ जाते हैं. वे अपनी बीस की उम्र में कोई वर्कआउट तलाशते हैं और अगले पंद्रह सालों तक उसी पर चलते रहते हैं. वे कोई ऐसी डाइट ढूंढते हैं जिससे परिणाम मिलते हैं और मान लेते हैं कि यह हमेशा काम करेगी. किसी किताब से सीखी गई सुबह की दिनचर्या धीरे-धीरे उनकी पहचान का हिस्सा बन जाती है. फिर परिणाम बदलने लगते हैं.'

साल 2007 टी20 विश्व कप विजेता सदस्य ने कहा, 'जिस वर्कआउट से कभी ऊर्जा मिलती थी, अब उससे थकावट होने लगती है. नींद का पैटर्न बदल जाता है. रिकवरी में ज्यादा समय लगता है. जिंदगी ज्यादा व्यस्त हो जाती है. रूटीन पर सवाल उठाने के बजाय, वे खुद पर सवाल उठाने लगते हैं. उन्हें लगता है कि वे आलसी हो गए हैं या उनका अनुशासन खो गया है. कभी-कभी, इसका अधिक सीधा और सरल कारण यह होता है कि वह रूटीन उनके उस रूप (वर्जन) के लिए बनाया गया था जो अब अस्तित्व में ही नहीं है.'
'प्रदर्शन के साथ शरीर का आनंद भी पसंद'
रॉबिन लिखते हैं, 'मेरी मौजूदा दीवानगी पैडेल को लेकर है. दुबई में यह बहुत लोकप्रिय है. यह टेनिस और स्क्वाश का मिला-जुला रूप है, और मुझे यह बेहद पसंद है. मैं हफ्ते में तीन या चार बार खेलता हूँ, और यह मेरी ट्रेनिंग का एक मुख्य जरिया बन गया है. मेरे लिए "बेहद पसंद" शब्द बहुत महत्वपूर्ण है. मेरी जिंदगी के ज्यादातर हिस्से में ट्रेनिंग हमेशा पेशेवर प्रदर्शन से जुड़ी रही. मैं हमेशा किसी न किसी चीज की तैयारी कर रहा होता था: कोई मैच, टूर्नामेंट, सीजन, कमबैक या टीम में अपनी जगह बनाने के लिए. आज मेरी जिंदगी में शारीरिक गतिविधि (मूवमेंट) का एक अलग स्थान है.'
उथप्पा ने लिखा, 'मुझे अब भी प्रदर्शन करना और प्रतिस्पर्धा करना पसंद है, लेकिन मैं अपने शरीर का आनंद भी लेना चाहता हूं. पैडेल के साथ मुझे खेलने जाने के लिए खुद को मनाना नहीं पड़ता. मैं इसके खेलने का इंतजार करता हूं. यह शायद सबसे वैज्ञानिक रूप से सटीक वर्कआउट ढूंढने और हर सुबह उससे नफरत करने से कहीं ज्यादा उपयोगी है. एक अच्छा फिटनेस सिस्टम वही है जिसका आप इतने लंबे समय तक आनंद ले सकें कि उसके साथ बने रह सकें. मेरी उत्सुकता जड़ी-बूटियों (प्लांट मेडिसिन) और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों तक भी फैली हुई है.'
'ऐसी चीजें ढूंढना पसंद है'
रॉबिन लिखते हैं, 'जब मैं हॉन्गकॉन्ग सिक्सस के लिए हॉन्गकॉन्ग में था, तो मैं एक मेडिकल स्टोर में गया और मुझे रीशी मशरूम, कॉर्डिसेप्स और ऊर्जा, रिकवरी तथा संज्ञानात्मक क्षमता (कॉग्निटिव परफॉर्मेंस) से जुड़े कई फॉर्मूलेशन मिले. वहां अंदर एक वैद्य थे जो व्यक्ति की जरूरत के हिसाब से चीजें बता सकते थे. मैं समझना चाहता था कि यह सब कैसे काम करता है, लेकिन भाषा की बाधा के कारण विस्तृत बातचीत करना लगभग असंभव था. मैं जवाबों से ज्यादा सवाल लेकर वहाँ से निकला, जिससे मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगा. मुझे ऐसी चीजें ढूंढना पसंद है जिन्हें मैं पूरी तरह नहीं समझता और फिर उस उत्सुकता का पीछा करना पसंद है. हांगकांग वापस जाने की मेरी वजहों में से यह भी एक है. जाहिर तौर पर, मैं टूर्नामेंट जीतना चाहता हूँ, लेकिन मैं वापस जाकर इन पद्धतियों को ठीक से समझना भी चाहता हूं.'
इस तरह के सवाल बहुत उपयोगी हैं
पूर्व ओपनर ने लिखा, 'मेरे लिए बायोहैकिंग का मतलब बीस तरह के सप्लीमेंट्स लेना या इंटरनेट पर हर हेल्थ ट्रेंड के पीछे भागना नहीं है. इसका मतलब अपने शरीर पर ध्यान देना है. अभी मुझे किस चीज़ से ऊर्जा मिल रही है? मुझे रिकवर होने में क्या मदद कर रहा है? कौन सी आदतें अब भी उपयोगी हैं, और कौन सी ऐसी हैं जिन्हें मैं सिर्फ इसलिए दोहरा रहा हूँ क्योंकि वे दस साल पहले काम करती थीं? मुझे लगता है कि ये सवाल सेहत के दायरे से बाहर भी उतने ही उपयोगी हैं. हाई परफॉर्मर्स आमतौर पर सिस्टम बनाने में अच्छे होते हैं. खतरा यह है कि हम उस कारण (वजह) से ज्यादा उस सिस्टम के प्रति वफादार हो सकते हैं जिसके लिए हमने उसे बनाया था.'
उन्होंने कहा, 'एक रूटीन का काम आपकी जिंदगी को बेहतर बनाना है. आपको अपने रूटीन को बचाए रखने के लिए अपनी पूरी जिंदगी को उसके इर्द-गिर्द व्यवस्थित नहीं करना चाहिए. जो ट्रेनिंग प्लान तब काम करता था जब आप सिंगल थे. हो सकता है कि शायद बच्चे होने के बाद काम न करे. जो शेड्यूल बेंगलुरु की जिंदगी के अनुकूल था, वह शायद दुबई की जिंदगी के अनुकूल न हो. 40 की उम्र में रिकवरी 25 की उम्र से अलग दिखनी ही चाहिए.'
40 की उम्र में एक अलग जिंदगी, अलग सवाल
'मैं ऑप्टिमाइजेशन (चीजों को बेहतर बनाने) को ऐसी चीज के रूप में नहीं देखता जिसे आप एक बार में पूरा कर लेते हैं. आप प्रयोग करते रहते हैं. आप मूवमेंट के अलग-अलग तरीकों को आजमाते हैं, बेहतर सवाल पूछते हैं और तब ध्यान देते हैं जब आपका शरीर आपको अलग-अलग संकेत (जानकारी) देना शुरू करता है. कभी-कभी इसका मतलब उस सिस्टम को छोड़ना भी होता है, जिसने आपको सफल बनाने में मदद की थी. उसने अपना काम कर दिया. अब आपकी जरूरतें बदल चुकी हैं. मैं वह इंसान नहीं हूं, जो अपनी बीस की उम्र में पेशेवर क्रिकेट खेलता था, और मैं वैसा बनना भी नहीं चाहता. मेरे उस रूप (वर्जन) ने बुनियाद तैयार की थी' 40 की उम्र में, मेरी एक अलग जिंदगी है और सवालों का एक अलग सेट है. और मुझे इनका हल निकालने में मजा आ रहा है.'
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