मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और तेल की कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका के सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व ने फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. यानी, अमेरिका में ब्याज दरें अभी 3.5% से 3.75% के स्तर पर ही बनी रहेंगी.फेड चेयर जेरोम पॉवेल ने साफ कहा कि तेल की बढ़ती कीमतें और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव आगे अर्थव्यवस्था और महंगाई पर असर डाल सकते हैं. ऐसे में अभी हालात को देखकर ही आगे फैसला लिया जाएगा.फेडरल रिजर्व की मीटिंग में तय हुआ कि पॉलिसी रेट अभी के लिए सही स्तर पर है, इसलिए इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया. पॉवेल ने कहा कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह स्टांस फिलहाल ठीक है.
जेरोम पॉवेल के मुताबिक अमेरिकी इकोनॉमी ठीक-ठाक रफ्तार से बढ़ रही है. हालांकि, महंगाई अभी भी टारगेट से ऊपर बनी हुई है और जॉब मार्केट में थोड़ी कमजोरी के संकेत दिख रहे हैं.
महंगाई अभी भी टारगेट से ऊपर
फेड के डेटा के मुताबिक,PCE महंगाई दर फरवरी तक 2.8% रही और कोर PCE महंगाई 3.0% पर रही.पॉवेल ने कहा कि 2022 के मुकाबले महंगाई जरूर कम हुई है, लेकिन अभी भी 2% के टारगेट से ऊपर है जिसे कम करना फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है
तेल कीमतों का खतरा, आगे क्या असर होगा?
मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से तेल की कीमतों में तेजी आई है. पॉवेल ने माना कि इससे आने वाले समय में महंगाई बढ़ सकती है. हालांकि, इसका असर कितना बड़ा होगा और कितने समय तक रहेगा इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल है.जब उनसे पूछा गया कि अगर तेल महंगा ही रहा तो फेड क्या करेगा, तो पॉवेल ने साफ कहा,स्थिति अनिश्चित है, असर बड़ा भी हो सकता है और छोटा भी. अभी कोई तय दिशा नहीं है.
आगे रेट कट पर क्या मिला संकेत?
फेड ने साफ किया कि भविष्य में दरें घट सकती हैं, लेकिन यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि महंगाई कितनी तेजी से नीचे आती है.अगर महंगाई कंट्रोल में नहीं आई, तो रेट कट भी नहीं होगा.पॉवेल ने कहा कि अगर लोगों की महंगाई को लेकर उम्मीदें 2% के आसपास बनी रहती हैं, तभी फेड राहत दे सकता है.लेकिन अगर लंबे समय तक महंगाई ज्यादा रही, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यानी अगली कटौती पूरी तरह से महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर करेगी.
जॉब मार्केट की चिंता
जब जेरोम पॉवेल से पूछा गया कि क्या अमेरिका 1970 जैसी स्टैगफ्लेशन यानी महंगाई और मंदी का एक साथ होने की स्थिति में है, तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया.उन्होंने माना कि प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां पैदा होने की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है, लेकिन बेरोजगारी दर अभी भी स्थिर है.प्राइवेट सेक्टर में जॉब क्रिएशन काफी कम हुआ है साथ ही, कम इमिग्रेशन और कम लेबर पार्टिसिपेशन से भी डेटा की तस्वीर बदल रही है. उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति मुश्किल जरूर है, लेकिन 1970 के दशक की स्टैगफ्लेशन जैसी गंभीर नहीं है.
अमेरिकी इकोनॉमी की मजबूती
जेरोम पॉवेल ने कहा कि पिछले कुछ सालों में कई झटकों के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है और अच्छी तरह संभली है.फेड पहले ही सितंबर से दिसंबर के बीच 0.75% तक दरें घटा चुका है. इसके बाद अब यह देखा जा रहा है कि महंगाई वाकई कंट्रोल में आ रही है या नहीं.फेड का टारगेट दो चीजें हैं. ज्यादा से ज्यादा रोजगार और महंगाई कंट्रोल लेकिन महामारी, टैरिफ और अब तेल के झटके ने इस संतुलन को और मुश्किल बना दिया है.
भारतीय बाजार और निवेशकों के लिए इसका मतलब
अमेरिकी फेड का यह फैसला भारतीय शेयर बाजार के लिए मिला-जुला है. दरों में कटौती न होने से विदेशी निवेशकों (FIIs) की वापसी में थोड़ा वक्त लग सकता है, लेकिन स्थिरता का संकेत बाजार को पैनिक से बचाएगा. पॉवेल ने साफ कर दिया है कि उनका पूरा फोकस महंगाई को 2% पर वापस लाने पर है, चाहे इसके लिए उन्हें दरों को लंबे समय तक ऊंचा ही क्यों न रखना पड़े.
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