एस्सेल ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा से जुड़े एक पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में NCLT ने करीब 6.5 करोड़ रुपये के री-पेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी है. ये मामला विवेक इन्फ्राकॉन को दिए गए लोन से जुड़ा है, जिसके लिए सुभाष चंद्रा पर्सनल गारंटर बने थे. इस मामले में इंडियबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (अब सम्मान कैपिटल) ने NCLT का रुख किया था, जिसके बाद अप्रैल 2024 में इंसॉल्वेंसी यानी दिवाला याचिका स्वीकार की गई थी. इस मामले में कहा ये जा रहा है कि कुल स्वीकृत दावे करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के थे, जिसे 6.5 करोड़ में सेटल करने की अनुमति मिल गई है. इस मामले में सुभाष चंद्रा की ओर से बताया गया है कि मामला 22,000 करोड़ का नहीं, बल्कि उससे काफी कम का है.
सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत कर्ज नहीं
सरकार से जुड़े सूत्रों ने बताया कि सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत तौर पर कभी भी 22,000 करोड़ रुपये का कर्ज नहीं लिया. जिस 22,006 करोड़ की भारी-भरकम राशि का जिक्र किया जा रहा है, वह असल में एस्सेल और जी (Zee) से जुड़ी विभिन्न कॉर्पोरेट कंपनियों की ओर से लिए गए लोन के एवज में उनके यानी सुभाष चंद्रा के 'पर्सनल गारंटर' के रूप में स्वीकार किए गए कुल दावों की राशि है.
तो फिर मूल गारंटी की वास्तविक रकम कितनी है?
बताया जा रहा है कि इन कुल दावों में से केवल लगभग 2,574 करोड़ के कर्ज ऐसे हैं, जिनके लिए सुभाष चंद्र की पर्सनल गारंटी दी गई थी. अधिकांश अन्य गारंटी बाद में अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर जोड़ी गई थीं.
पर्सनल इंसॉल्वेंसी कार्यवाही यानी ये कानूनी प्रक्रिया मुख्य कंपनियों के खिलाफ नहीं, बल्कि पर्सनल गारंटर के रूप में सुभाष चंद्र के खिलाफ है, जो इंडियाबुल्स से विवेक इन्फ्राकॉन के ऋण भुगतान में चूक के बाद शुरू हुई थी.
99.97 हेयरकट का मतलब 22,000 करोड़ का नुकसान नहीं
हालिया आदेश में जिस 99.97% के हेयरकट की चर्चा हो रही है, वो हेयरकट बैंकों के कुल 22,000 करोड़ के लोन पर नुकसान नहीं है, बल्कि ये केवल सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत क्षमता से वसूले जाने वाले एस्टेट दावों में कमी है, जहां उनके निजी एस्टेट से 6.25 करोड़ रुपये का रीपेमेंट प्लान स्वीकृत हुआ है.
मुख्य कंपनियों से वसूली और लेनदारों की भूमिका
यहां ये भी एक तथ्य बताया जा रहा है कि मूल कॉर्पोरेट कर्जदार कंपनियां कानून के तहत अलग से उत्तरदायी बनी हुई हैं. रीपेमेंट प्लान के तहत व्यक्तिगत तौर पर 6.25 करोड़ रुपये मिलने के अलावा, मुख्य कर्जदार कंपनियों से करीब 1,494 करोड़ के भुगतान का भी प्लान है.
इसके अलावा, बैंक इन कंपनियों की अन्य मौजूदा एसेट्स और बॉन्ड्स से रिकवरी के रास्ते तलाशती रहेगी. सुभाष चंद्रा के मुताबिक इन कंपनियों ने अब तक लेनदारों को 43,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया है.
कुछ बैंकिंग संस्थानों (जैसे LIC हाउसिंग फाइनेंस, HDFC बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, RBL और यूनियन बैंक) ने इसका विरोध किया था और उनके ऐतिहासिक नेट-वर्थ का हवाला देकर गहरी जांच की मांग की थी, फिर भी इस प्लान को 80.81% लेनदारों का भारी बहुमत समर्थन मिला, जिसे NCLT ने सही ठहराया.
सरकारी सूत्रों ने ये भी कहा कि सुभाष चंद्रा का ये मामला एक असाधारण पर्सनल-गांरटर का केस है, जिसे कॉर्पोरेट दिवालियापन कोड (IBC) के ओवरऑल परफॉर्मेंस का पैमाना नहीं माना जा सकता. सूत्रों ने IIM, अहमदाबाद की एक स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि IBC के तहत कंपनियों ने सेल्स में 76% की ग्रोथ, कुल एसेट्स में 50% की ग्रोथ, कर्मचारियों पर खर्च में 50% की ग्रोथ और कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी पूंजीगत खर्च में 130% की ग्रोथ दर्ज की है.
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