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फ्लाईदुबई हाईजैक की कोशिश से उठे सवाल, क्या सीरिया से उठी चिंगारी ओमान तक पहुंच गई है

अदिति भादुड़ी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 07, 2026 17:00 pm IST
    • Published On अक्टूबर 07, 2026 17:00 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 07, 2026 17:00 pm IST
फ्लाईदुबई हाईजैक की कोशिश से उठे सवाल, क्या सीरिया से उठी चिंगारी ओमान तक पहुंच गई है

हाल ही में फ्लाईदुबई के एक विमान को हाईजैक करने की कोशिश की गई थी. यह  विमान दुबई से इजरायल के तेल अबीब जा रहा था. हाईजैक करने का आरोप ओमान के एक नागरिक पर है. वह विमान का को पायलट है. इस खबर ने दुनिया के बहुत से लोगों को हैरान कर दिया है. इसकी वजह भी है. ओमान जिस अशांत क्षेत्र में स्थित है, वहां उसने खुद को एक आदर्श अरब देश और अलग-अलग पक्षों के बीच पुल बनाने वाले देश के रूप में स्थापित किया है. ओमान किसी भी तरह के कट्टरवाद को पसंद नहीं करता. उसने सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच, ईरान और खाड़ी देशों के बीच, अरब देशों और इजरायल के बीच और ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने और बातचीत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

हमेशा शांति की बात क्यों करता रहता है ओमान

शायद ओमान की भौगोलिक स्थिति ही उसे अरब दुनिया और ईरान के बीच स्वाभाविक पुल बनाती है. अरब प्रायद्वीप के बड़े हिस्से से ओमान एक ऊंची पर्वत श्रृंखला के कारण अलग है, जबकि संकरे होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी तरफ ईरान है. इस तरह ओमान शिया और सुन्नी दुनिया के बीच एक पुल बन जाता है. इसमें ओमान के ज्यादातर मुसलमानों का इबादी संप्रदाय को मानना भी महत्वपूर्ण है. ओमान के दिवंगत सुल्तान काबूस बिन सईद अल सईद भी इबादी संप्रदाय के अनुयायी थे. यह संप्रदाय सुन्नी और शिया संप्रदायों से भी पुराना माना जाता है. शायद यही वजह है कि ओमान ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और मध्यस्थ की भूमिका की वजह से अलग पहचान बनाई है.

ओमान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक 2014 में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में उसकी भूमिका थी. इसी बातचीत से परमाणु समझौते का रास्ता खुला था. लेकिन ओमान की भूमिका इससे कहीं ज्यादा बड़ी रही है.

दिवंगत सुल्तान काबूस के नेतृत्व में ओमान ने खाड़ी देशों के बीच सुरक्षा सहयोग की ऐसी व्यवस्था तैयार करने में भूमिका निभाई, जो बाद में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के रूप में सामने आई.साल 1970 के दशक में ओमान ने इजरायल के साथ शांति स्थापित करने के मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात के प्रयासों का खुले तौर पर समर्थन किया. इजरायल को मान्यता देने के बाद भी ओमान उन केवल तीन अरब देशों में शामिल था, जिन्होंने इजरायल के साथ राजनयिक संबंध बनाए रखे.

इसके बाद ओमान ने इजरायल के प्रधानमंत्री इत्जाक राबिन की मेजबानी की. यह किसी इजरायली नेता की किसी अरब देश की पहली सार्वजनिक यात्रा थी. इसके बाद ओमान ने 2018 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, उनकी पत्नी और कई मंत्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल की मस्कट में मेजबानी की.

ईरान-इराक युद्ध के दौरान ओमान ने दोनों देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे और दोनों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश की, हालांकि उसे सफलता नहीं मिली. साल 2014 में ओमान पहला अरब देश बना, जिसकी आधिकारिक यात्रा ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने की.

क्या धर्मनिरपेक्ष देश हैं ओमान

जब भी ईरान के साथ तनाव बढ़ा, ओमान ने बातचीत और शांति की कोशिश की. उसने अलग-अलग पक्षों के बीच बातचीत और मध्यस्थता कराई. इस साल फरवरी में भी अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले शुरू करने से पहले ओमान की मध्यस्थता में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत के कई दौर हो चुके थे. इसके बाद ओमान ने क्षेत्र में अपनी कूटनीतिक गतिविधियां और तेज कर दी हैं.

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ओमान के मूल कानून में देश के अंदर अलग-अलग धर्मों और धार्मिक तरीकों से पूजा करने के अधिकार को मान्यता दी गई है. हिंदू, सिख और ईसाई समुदाय भी यहां कई दशकों से स्थानीय इबादी मुसलमानों के साथ शांतिपूर्वक रहते आए हैं. लेकिन फ्लाईदुबई की घटना की जांच में जैसे-जैसे नई बातें सामने आईं और संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल में सुरक्षा से जुड़ी बड़ी चूक सामने आई, यह भी पता चला कि ओमानी नागरिकता वाला सह-पायलट हमाम अल-हमीमी मिश्रित पारिवारिक पृष्ठभूमि का था. उसके पिता ओमानी थे और मां सीरियाई.उसे कट्टरपंथ विचारधारा की सीख सीरिया में ही मिली. 

यह स्थिति दुखद है. क्योंकि कभी सीरिया भी कई मायनों में ओमान जैसा ही था.

सीरिया पर असद परिवार का लंबे समय तक कठोर शासन रहा है. पहले हाफिज अल-असद और फिर उनके बेटे बशर अल-असद ने सीरिया पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखा. लेकिन इसके बाद भी वे देश को शांतिपूर्ण, सहनशील, बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने में सफल रहे.

सीरिया में ज्यादातर लोग सुन्नी मुसलमान हैं, जबकि असद परिवार अलावी समुदाय से आता था. अलावी समुदाय तुर्की, सीरिया और लेबनान में फैला हुआ है और इस क्षेत्र में कई लोग इसे इस्लाम से अलग या विवादित संप्रदाय मानते हैं. इसलिए असद परिवार के लिए यह जरूरी था कि देश में धार्मिक कट्टरता न बढ़े और सीरिया धर्मनिरपेक्ष बना रहे.

क्या सीरिया में साक्षरता की दर 100 फीसद थी

असद शासन के दौरान सीरिया पहले सोवियत संघ और बाद में रूस के करीब रहा. इस दौरान सीरिया में साक्षरता की दर करीब 100 फीसद हो गई. महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार हासिल थे. अलावी, द्रूज, सीरियाई ईसाई और शिया जैसे अलग-अलग अल्पसंख्यक समुदायों की मौजूदगी ने देश को बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष बनाए रखा.

सीरिया अरब राष्ट्रवाद यानी पैन-अरबिज्म का भी प्रमुख समर्थक रहा, हालांकि उसके ईरान के साथ करीबी संबंध थे. साल 2011 में सीरियाई गृहयुद्ध शुरू होने तक सीरिया फिलस्तीनी मुद्दे का मजबूत समर्थक था. उसने हजारों फिलस्तीनी शरणार्थियों को अपने यहां जगह दी थी. सीरिया ने इजरायल के साथ तब तक शांति समझौता करने से इनकार किया, जब तक इजरायल 1967 के युद्ध के बाद कब्जे में लिए गए गोलान हाइट्स को वापस नहीं कर देता है.

इसके बावजूद सीरिया और इजरायल की सीमा लंबे समय तक काफी शांत और सुरक्षित रही. हालांकि कई फिलस्तीनियों का आरोप था कि सीरिया ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया था और वास्तव में इजरायल से लड़ने का उसका कोई इरादा नहीं था.

सीरिया ने सुन्नी कट्टरवाद को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1980 के दशक में इस्लामवादियों द्वारा शुरू किए गए विद्रोह को असद सरकार ने बेहद कठोर तरीके से दबा दिया. इसके बाद सीरिया में सुन्नी कट्टरपंथी ताकतें काफी कमजोर हो गईं. लेकिन 2012 में शुरू हुए गृहयुद्ध ने पूरी स्थिति बदल दी. इस गृहयुद्ध में लाखों सीरियाई मारे गए और करीब 1.4 करोड़ लोग विस्थापित हुए. यह संख्या युद्ध से पहले की सीरिया की आबादी के आधे से ज्यादा थी.

इससे सीरिया एक गरीब और विभाजित देश बन गया. सीरिया के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग शक्तियों के समर्थक हथियारबंद गुटों का कब्जा हो गया. ईरान, इजरायल, तुर्की, रूस और अमेरिका इस संघर्ष में सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे. 

असद सरकार का विरोध करने वाले कुछ राजनीतिक गुटों पर बाद में जिहादी और कट्टरपंथी संगठनों का कब्जा हो गया. इन संगठनों को अमेरिका की CIA और कुछ स्वतंत्र खाड़ी देशों से बड़ी आर्थिक मदद मिली. तुर्की और जॉर्डन जैसे देशों ने भी उन्हें मदद पहुंचाई. सीरिया का बहुलतावादी ढांचा टूट गया. देश के पूर्वी और दक्षिणी बड़े हिस्सों में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया यानी ISIS जैसी चरमपंथी ताकतें उभर आईं.

सीरिया में आईएसआईएस ने कैसे जमाए पैर

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से जिहादी और कट्टरपंथी लोग ISIS में शामिल होने के लिए सीरिया पहुंचने लगे. तुर्की के रास्ते उनके सीरिया पहुंचने में मदद मिली. ISIS और दूसरे कट्टरपंथी गुटों ने विरोधियों को जिंदा जला दिया, महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग रखने के नियम लागू किए और महिलाओं के लिए सिर से पैर तक शरीर ढकना जरूरी कर दिया. महिलाओं को घरों तक में सीमित कर दिया गया.

1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीन तक हथियार, लड़ाके और प्रशिक्षण पहुंचाने में पाकिस्तान ने जिस तरह की भूमिका निभाई थी, उसी तरह सीरिया में असद सरकार के खिलाफ जिहादी ताकतों को तुर्की, जॉर्डन और कुछ अरब खाड़ी देशों ने समर्थन दिया.

PBS Frontline की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि सीरियाई विद्रोही लड़ाके प्रशिक्षण और दूसरे सहयोग के लिए तुर्की और कतर जाते थे. तुर्की में उनकी मुलाकात अमेरिकी अधिकारियों से होती थी और फिर वे सैन्य प्रशिक्षण के लिए कतर जाते थे. साल 2014-15 में जब सीरिया का संघर्ष अपने चरम पर था, तब सीआईए जैसी खुफिया एजेंसियों के अनुमान के मुताबिक ISIS के पास करीब 80 हजार लड़ाके थे. इनमें सीरिया और इराक के स्थानीय लोगों के साथ दूसरे देशों से आए लड़ाके भी शामिल थे.

जिहादी संगठनों के संबंध अमेरिका से कैसे रहे हैं

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, 110 देशों से 40 हजार से ज्यादा विदेशी लड़ाके सीरिया और इराक पहुंचे थे. वे आतंकवादी संगठनों में शामिल होने के लिए वहां गए थे. जैसे-जैसे इराक ने ISIS के खिलाफ लड़ाई तेज की, उसके कई सदस्य और लड़ाके सीरिया की ओर चले गए. बाद में सार्वजनिक किए गए कुछ दस्तावेजों से पता चला कि ओबामा प्रशासन के समय से सीआईए ने कई जिहादी संगठनों को आर्थिक मदद, प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराने में मदद की थी.

अफगानिस्तान में जिहादी आंदोलन 21वीं सदी में तालिबान की सरकार बनाने में सफल रहा. सीरिया में भी इसी तरह की ताकतों के उभार ने अंततः अल-कायदा से जुड़े एक लड़ाके को देश का राष्ट्रपति बनने तक पहुंचा दिया. आज भी सीरिया अस्थिरता, गुटबाजी और हिंसा से जूझ रहा है. नई ताकतें देश पर अपना नियंत्रण मजबूत करने और उसे जिहादी विचारधारा से निकालकर राष्ट्र निर्माण की दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही हैं. इसी बीच अलग-अलग गुट फिर से सत्ता और नियंत्रण के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

अमेरिका ने राष्ट्रपति अहमद अल-शरा और उनके संगठन हयात तहरीर अल-शाम (HTS) को मान्यता दी है. इसके साथ ही सीरिया पर दशकों से लगे प्रतिबंधों में राहत दी गई है और अल-शरा को अमेरिका आने की अनुमति मिली है. वहीं दूसरी ओर, तुर्की उत्तरी सीरिया के कुछ हिस्सों पर अपना नियंत्रण बनाए हुए है. सीरिया के दक्षिणी हिस्से में इजरायल आगे बढ़ रहा है और वहां द्रूज समुदाय के साथ मिलकर एक सुरक्षा क्षेत्र बनाने की कोशिश कर रहा है.

द्रूज, अलावी और ईसाई समुदायों के लोगों की हत्याएं भी हुई हैं. अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं, जिनमें गैर-मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं, उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए सिर ढकना शुरू कर दिया है. सीरिया का नेतृत्व जिहादी और विदेशी लड़ाकों को देश की सेना में शामिल करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन इनमें से कुछ असंतुष्ट लड़ाके सीरिया के दुर्गम इलाकों में जाकर छिप गए हैं. इस बीच ISIS के स्लीपर सेल भी मजबूत हो रहे हैं.

इस तरह अल-हमीमी को सीरिया के सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ की ओर बढ़ने का एक उदाहरण माना जा सकता है. लेकिन इसके प्रभाव केवल सीरिया तक सीमित नहीं रहेंगे, क्योंकि अगर कोई अपने पड़ोसी के घर में आग लगाता है, तो उसकी लपटों के अपने घर तक पहुंचने का खतरा भी हमेशा बना रहता है.

(डिस्क्लेमर: अदिति भादुड़ी एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वो मध्य-पूर्व मामलों की जानकार हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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