देश में कपड़ा उद्योग के एक्सपोर्ट को बढ़ाने के लिए नया लक्ष्य तया किया गया है. भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को दुनिया भर में एक नई पहचान दिलाने के लिए नीति आयोग और CRISIL ने अहम रिपोर्ट जारी किया है. जिसमें वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने को लेकर कपड़ा उद्योग सेक्टर के लिए अहम सुझाव दिए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षो में देश का कपड़ा उद्योग नई ऊंचाईयों को छू सकता है और निवेशकों और कारोबारियों के लिए अवसर पैदा कर सकता है.
नीति आयोग और CRISIL की रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइनेंसियल ईयर 2030 तक कपड़ा उद्योग का एक्सपोर्ट लक्ष्य 100 अरब डॉलर (100 Billion USD) रखा गया है. हालांकि यह भी कहा गया है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए उद्योग में रचनात्मक बदलाव करने होंगे. यानी यह बड़े बदलाव का संकेत हैं. बता दे भारत का मौजूदा कपड़ा उद्योग का एक्सपोर्ट करीब 30 से 40 अरब डॉलर है.
मैन मेड फाइबर (MMF) पर जोर
भारत का कपड़ा उद्योग अब तक कपास पर निर्भर रहा है. लेकिन रिपोर्ट में कॉटन के साथ मैन मेड फाइबर (MMF) और टेक्निकल टेक्सटाइल्स पर फोकस होने का सुझाव दिया गया है. कहा गया है कि MMF वैल्यू चेन में आने वाली रुकावटों को दूर कर देश को वैश्विक मांग के अनुरूप ढालना होगा. रिपोर्ट में पुरानी तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कहा गया है कि आज भी पावरलूम सेक्टर में पुरानी बुनाई और प्रोसेसिंग तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. जो वैश्विक कंपटीशन में बड़ी रुकावट है.
जबकि इसके समाधान के लिए आधुनिक शटल-लेस लूम (Shuttle-less Looms) अपनाने, औद्योगिक क्लस्टर को अपग्रेड करने और उन्हें सीधे बाजार की मांग से जोड़ने की सिफारिश की गई है.
रिसर्च और डेवलपमेंट पर कम खर्च हो रहा
रिपोर्ट के मुताबकि कपड़ा कंपनियां अपनी बिक्री का केवल 0.21 प्रतिशत ही रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च करते हैं, जो काफी कम है. वहीं चीन के नीति को लेकर कहा गया है कि चीन की बड़ी कंपनियां रिसर्च और डेवलपमेंट पर 2.25 प्रतिशत अपने बिक्री का खर्च करती है. सुझाव दिया गया कि डिजाइन विकास और इनोवेशन के लिए प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा दिया जाए ताकि कम वैल्यू वाले प्रोडक्ट पर निर्भरता कम हो सके.
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से जोड़ने का सुझाव
रिपोर्ट में बताया गया है कि कपास का सप्लाई नेटवर्क राज्यों से लेकर स्पिनिंग, वीविंग और गारमेंट हब तक फैला है. चेन नेटवर्क काफी बिखरा हुआ है, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है. इसे कम करने के लिए कपड़ा क्लस्टरों को कम दरों पर 'डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर' (Dedicated Freight Corridors) से जोड़ने का सुझाव दिया गया है.
प्रीमियम और लग्जरी ब्रांड के रूप में पेश करना जरूरी
खादी, हैंडलूम और पारंपरिक बुनाई को केवल रोजगार और संरक्षण के नजरिए से देखने के बजाय एक 'प्रीमियम और लग्जरी' ब्रांड के रूप में पेश करने की जरूरत है. इंटनेशनल मार्केट में इनकी पहुंच को बढ़ाने के लिए डिजाइनर कोलैबोरेशन और सस्टेनेबिलिटी पोजिशनिंग पर जोर दिया गया है.
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