विज्ञापन

आजादी के सपने ने बनाया 'मार्गो' साबुन, अंग्रेजों से नफरत के कारण ब्रिटेन पढ़ने नहीं गए इसके संस्थापक केसी दास

केसी दास के पिता अंग्रेज सरकार में जज और मां गांधीवादी कार्यकर्ता थीं और आजादी के आंदोलन में सक्रिय थीं. दास पर उनकी मां का काफी प्रभाव था. इस वजह से उनके अंदर स्वदेशी की भावना काफी तेज हुई.

आजादी के सपने ने बनाया 'मार्गो' साबुन, अंग्रेजों से नफरत के कारण ब्रिटेन पढ़ने नहीं गए इसके संस्थापक केसी दास
नई दिल्ली:


मैं जब छोटा था तो टीवी पर एक विज्ञापन आया करता था. यह नीम के पत्तों से बने नहाने के साबुन 'मार्गो' का विज्ञापन था. इसमें 'मार्गो' साबुन को रंग-रूप निखारने वाला बताया जाता था. यह विज्ञापन लोगों को काफी पंसद आता था. हम भी एक-दो बार खरीदकर लाए थे. नीम की महक अच्छी लगती थी. पिछले दिनों इंटरनेट पर अचानक से 'मार्गो' साबुन के एक पुराने विज्ञापन की एक फोटो दिख गई. इसके बाद मैंने इस पर खोजबीन की. इस दौरान इस साबुन और उसे बनाने वाली कंपनी का दिलचस्प इतिहास सामने आया. पता चला कि 1920 में लॉन्च हुआ यह साबुन आज भी बाजार में उपलब्ध है. आइए हम आपको बताते हैं कि कैसे बनना शुरू हुआ था 'मार्गो' साबुन. 

स्वदेशी का 'मार्गो' से क्या संबंध है

आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी का जोर स्वदेशी पर था. स्वदेशी का विचार आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक था. गुलाम भारत और अविभाजित बंगाल में भी स्वदेशी आंदोलन का जोर था. यह अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ भारतीयों का एक मजबूत और वैचारिक हथियार था. इसने भारत में कई कंपनियों और ब्रांड्स को जन्म दिया. इन्हीं कंपनियों में से एक थी, मार्गो साबुन बनाने वाली कलकत्ता केमिकल कंपनी. 

मार्गो को बाजार में उतारने पर कलत्ता केमिकल कंपनी ने इस बात का घ्यान रखा था कि इसकी कीमतें सबकी पहुंच में हों.

SOCIAL MEDIA
Photo Credit: Social Media

कलकत्ता केमिकल कंपनी की नीव रखी थी खगेंद्र चंद्र दास ने. वो केसी दास के नाम से मशहूर हुए. स्वदेशी का विचार और अंग्रेजी राज से आजादी की सोच उन्हें उनके परिवार से ही मिली थी. एक तरफ उनके पिता राय बहादुर तारक चंद्र दास जहां अंग्रेज शासन में जज थे, वहीं उनकी गांधीवादी मां मोहिनी देवी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहती थीं. केसी दास अपनी मां से अधिक प्रभावित थे. इसलिए गांधीवाद की ओर अग्रसर हुए. इसका असर यह हुआ कि अपने सरनेम दासगुप्ता में से उन्होंने गुप्ता हटा दिया था और केवल दास सरनेम रखा. ऐसा उन्होंने जाति प्रथा का विरोधी होने की वजह से किया. दासगुप्ता वैद्य समुदाय का सरनेम था.  केसी दास खादी प्रेमी भी थे.

केसी दास अंग्रेजों से विरोध की वजह से नहीं गए ब्रिटेन

कोलकाता में पढ़ाई-लिखाई करने के बाद उन्हें शिबपुर के एक कॉलेज में प्रवक्ता की नौकरी मिल गई. इसके बाद भी उनका मन आजादी की लड़ाई में लगा रहता था. उनके पिता को सूचना मिली की अगर केसी दास को संभाला नहीं गया तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. इसके बाद उनके पिता ने उन्हें पढ़ने के लिए विदेश जाने के लिए कहा. उन दिनों उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाने का जोर था. लेकिन अंग्रेजों से नफरत करने वाले केसी दास ने पढ़ने के लिए वहां जाने से मना कर दिया. उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाना चुना. 

उन्हें पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप मिली. उन्होंने अमेरिका के यूसी बर्कले में दाखिला लिया. बाद में वो अपने दोस्त एसएम बोस के साथ केमेस्ट्री की पढ़ाई करने के लिए स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय पढ़ने चले गए. अंग्रेजों से आजादी का सपना उन्होंने अमेरिका में भी जिंदा रखा. अमेरिका के कैलिफोर्नियां में उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की और आजादी की लड़ाई के आंदोलन को आगे बढ़ाया. अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद केसी दास ने जापान में भी पढ़ाई की.

किन लोगों ने की थी कलकत्ता केमिकल कंपनी की स्थापना

भारत लौटने के बाद केसी दास ने बीएन मित्रा और आरएन सेन के साथ मिलकर 1916 में कलकत्ता केमिकल कंपनी की स्थापना की. इस कंपनी की स्थापना में भी स्वदेशी की भावना थी. इसका मकसद दवा उद्योग में अंग्रेजों के आधिपत्य को चुनौती देना था. कंपनी नीम के अर्क से साबुन और टूथपेस्ट बनाने लगी. साल 1920 में मार्गो साबुन बाजार में आया. इसकी कीमत आम लोगों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए रखी गई थीं.इस वजह से देखते ही देखते यह साबुन मशहूर हो गया. इसके अलावा कलकत्ता केमिकल कंपनी ने 'नीम' टूथपेस्ट और 'लैवेंडर ड्यू' नाम का टैल्कम पाउडर भी बाजार में उतारा. एक समय 'मार्गो' का बाजार शेयर करीब नौ फीसद था.

कलकत्ता केमिकल कंपनी ने 1920 में मार्गो साबुन को बाजार में उतारा था.

कलकत्ता केमिकल कंपनी ने 1920 में मार्गो साबुन को बाजार में उतारा था.
Photo Credit: Social Media

केसी दास की मौते के बाद कलकत्ता केमिकल कंपनी को उनकी पत्नी ने संभाला. उसके बाद कंपनी का कामकाज ठीक-ठाक चलता रहा. लेकिन बाद में यह कलकत्ता केमिकल कंपनी का अधिग्रहण शॉ वैलेस नाम की एक शराब कंपनी ने कर लिया. उसने इसे जर्मनी की कंपनी हेनकेल को बेच दिया. केरल की ज्योति लैबोरेटरीज ने 2011 में हेनकेल इंडिया का अधिकांश शेयर खरीद लिया. इससे 'मार्गो' साबुन अब ज्योति लैबोरेटरीज ही बनाती है. 

राजनीति केसी दास के परिवार में आज भी जा रही है. उनके पोते स्वपन दास गुप्ता पत्रकारिता का करियर छोड़कर राजनीति में आए. बीजेपी ने उन्हें राज्य सभा का सदस्य बनाया था. इस साल मई में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वो विधायक चुने गए. इस समय वो शुवेंदू अधिकारी की कैबिनेट में वित्त मंत्री के रूप में काम कर रहे हैं. 

ये भी पढ़ें: लोकतांत्रिक प्रदर्शन करिए, सुप्रीम कोर्ट को मत घसीटिए... CJI सूर्यकांत ने प्रोटेस्ट को लेकर की बड़ी टिप्पणी

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Success Story, Indian Brand, Margo Soap
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com