भारत की आजादी से 15-20 साल पहले तक इस बात की चर्चाएं होने लगी थीं कि हिंदू और मुस्लिम साथ-साथ नहीं रह सकते. साल 1930 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन में कवि मुहम्मद इकबाल ने 'टू-नेशन थ्योरी' का जिक्र किया था और कहा था कि अगर इसे कबूल कर लिया जाता है तो भारत की सांप्रदायिक समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है. मुहम्मद इकबाल वही कवि थे, जिन्होंने 'सारे जहां से अच्छा' लिखा था.
डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस अपनी किताब 'फ्रीडम एट द मिडनाइट' में लिखते हैं कि 'आजादी के लिए कांग्रेस का आंदोलन हिंदुओं का आंदोलन बनता जा रहा था और इससे मुसलमानों के मन में आशंकाएं जगीं. मुसलमानों के मन में ये बात बैठ गई कि आजाद भारत में वे हिंदुओं की बहुसंख्या के बीच एकदम खो जाएंगे. एक ऐसी जमीन पर उनकी शक्तियां गुम हो जाएंगी, जहां कभी खुद मुसलमानों ने शासन किया था. केवल एक संभावना थी जो उन्हें इस खतरे से बचा सकती थी और वह थी भारत का कोई हिस्सा मुसलमानों के लिए अलग कर दिया जाए.'
आजादी के आंदोलन में जब सांप्रदायिकता का रंग घुल रहा था, तब कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में वकालत की पढ़ाई कर रहे चौधरी रहमत अली ने पहली बार 'पाकिस्तान' का जिक्र किया.
'फ्रीडम एट मिडनाइट' में इस घटना का जिक्र करते हुए डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस लिखते हैं, 'भारतीय मुसलमानों को अपना मुल्क हिंदुओं से अलग कर लेना चाहिए. यह परिकल्पना पहली बार साढ़े चार पन्नों के पैंफलेट में कैंब्रिज की हम्बरस्टोन रोड के कॉटेज नंबर 3 में लिखी गई. इसे रहमत अली ने लिखा था, जो 40 साल का विद्यार्थी था. रहमत अली के प्रस्ताव पर 28 जनवरी 1933 तारीख लिखी थी.'

28 जनवरी 1933... यही वह तारीख थी जब पहली बार 'पाकिस्तान' का ख्याल आया. किताब के मुताबिक, 'अपने प्रस्ताव में रहमत अली ने साफ-साफ लिखा था कि भारत को अखंड रखने की बात हास्यास्पद और फूहड़ है. उसने सुझाव दिया कि भारत के जिन उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में मुसलमानों की बहुसंख्या है, उन्हें अलग करके मिला दिया जाए. इस नए मुल्क का नाम भी रहमत अली ने ही सुझाया- पाकिस्तान.'
यह भी पढ़ेंः 7 जून 1893... वो तारीख जब पोरबंदर के मोहनदास 'गांधीगीरी' की राह पर चल पड़े
पाकिस्तानी-अमेरिकी इतिहासकार आयशा जलाल अपनी किताब 'द सोल स्पोक्समैनः जिन्ना, द मुस्लिम लीग एंड द डिमांड फॉर पाकिस्तान' में लिखती हैं कि 'रहमत अली के पाकिस्तान में P से पंजाब, A से अफगानिस्तान, K से कश्मीर, S से सिंध और Tan से बलूचिस्तान था. पाकिस्तान मतलब पाक लोगों की सरजमीं.'
दिलचस्प बात यह है कि जिस मोहम्मद अली जिन्ना के कारण पाकिस्तान बना, उसी जिन्ना को रहमत अली का प्रस्ताव पसंद नहीं आया था.
'फ्रीडम एट मिडनाइट' में रहमत अली के प्रस्ताव और जिन्ना के बारे में विस्तार से बताया गया. इसमें लिखा है, 'रहमत अली लंदन में रहता था और अपना प्रस्ताव जिन्ना के सामने पेश करने के लिए उसने वाल्डोर्फ होटल में डिनर पार्टी दी थी. भारतीय मुस्लिम राजनीतिज्ञों के बीच जिन्ना की स्थिति तब अच्छी-खासी हो चुकी थी. रहमत अली अपने प्रस्ताव की बागडोर जिन्ना को सौंप देना चाहता था.'

Photo Credit: AFP
किताब के मुताबिक, 'जिस व्यक्ति को एक दिन 'पाकिस्तान का पिता' कहा जाने वाला था, उसी मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को 'एक नामुमकिन सपना' कह कर 1933 में रहमत अली का प्रस्ताव खारिज कर दिया था.'
जिन्ना ने रहमत अली के इस प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया था, क्योंकि उस वक्त तक वह हिंदू-मुस्लिम एकता के हिमायती थे. वह उस समय भारत के भीतर ही मुस्लिमों के हक के लिए लड़ रहे थे. उन्होंने रहमत अली के प्रस्ताव को पूरी तरह से मुसलमानों के लिए ही 'नुकसानदेह' माना था.
यह भी पढ़ेंः 23 जून 1757... कहानी उस दिन की, जब अपनों की गद्दारी से गुलामी की जंजीर में जकड़ गया भारत
जिन्ना के बारे में 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लिखा है कि 'भारतीय मुसलमानों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उनका नेता कोई ऐसा व्यक्ति बनेगा, जिसमें केवल इतना मुसलमानपना होगा कि वह एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ.'
जिन्ना शराब पीते थे. सुअर का मांस खाते थे. हर दिन दाढ़ी बनाते थे और हर शुक्रवार को मस्जिद से दूर रहते थे. जिन्ना की दुनिया में खुदा और कुरान के लिए शायद ही कोई जगह थी.

Photo Credit: AFP
फिर ऐसा क्या हुआ कि जिन्ना कुछ सालों बाद ही अलग मुल्क के लिए लड़ने लगे? इसकी वजह 1937 का चुनाव है. 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के मुताबिक, 'जिन्ना को तब सबे बड़ा झटका लगा, जब 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने उन राज्यों में जिन्ना और मुस्लिम लीग का सहयोग लेने से इनकार कर दिया, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक थे. बेहद स्वाभिमानी जिन्ना को कांग्रेस का यह कदम व्यक्तिगत अपमान जैसा लगा. उन्हें उसी दिन से हमेशा के लिए यकीन हो गया कि कांग्रेस के भारत में उनके साथ और उनकी मुस्लिम लीग के साथ कभी न्याय नहीं किया जाएगा.'
इसी अपमान ने जिन्ना को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बदल दिया कि आखिर में उसकी जिद वही अपना अलग 'पाकिस्तान' की रह गई, जिसे उसने कभी 'नामुमकिन सपना' कह कर खारिज कर दिया था. जिन्ना इस जिद पर तब तक अड़े रहे, जब भारत का बंटवारा नहीं हो गया और उन्हें पाकिस्तान नहीं मिल गया.
यह भी पढ़ेंः चीन तिब्बत का नाम लेकर अरुणाचल पर दावा करता है, पर तिब्बत भी तो उसका नहीं... पूरे विवाद की कहानी समझिए
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं