- उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित शहीद मंदिर में देश के 41 शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी जाती है.
- दानसिंह चौधरी ने अपनी सेवानिवृत्ति की पूरी पूंजी इस मंदिर के निर्माण के लिए समर्पित की थी.
- मंदिर में 21 परमवीर चक्र विजेताओं सहित महान सैन्य अधिकारियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं.
देशभक्ति केवल किताबों के पन्नों में नहीं बसती, वह उन भावनाओं में भी जीवित रहती है जो हर पीढ़ी को अपने वीर सपूतों की याद दिलाती हैं. महाकाल की नगरी उज्जैन में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां भगवान की पूजा के साथ-साथ देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले 41 शहीद जवानों को भी श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु सिर्फ दर्शन करके नहीं लौटते, बल्कि अपने साथ देशप्रेम और शहीदों के सम्मान का संदेश भी लेकर जाते हैं. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह मंदिर लोगों को याद दिलाता है कि आजादी की कीमत उन वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर चुकाई थी, जिनकी बदौलत हम खुले आसमान में सांस ले पा रहे हैं.
शिप्रा किनारे बना देशभक्ति का अनोखा मंदिर
उज्जैन में पवित्र शिप्रा नदी के किनारे स्थित यह शहीद मंदिर अपनी तरह का अनूठा स्थान है. यहां प्रतिदिन भगवान के साथ देश की रक्षा में शहीद हुए जवानों को भी सम्मान दिया जाता है. विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग मंदिर पहुंचते हैं और शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ‘भारत माता की जय' के जयघोष से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठता है.
रिटायरमेंट की पूरी पूंजी से रखी गई नींव
इस मंदिर के निर्माण की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है. वर्ष 2008 में दानसिंह चौधरी ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद मिली पूरी राशि इस मंदिर के निर्माण के लिए समर्पित कर दी. अलीराजपुर के गुरु नरसिंहानंद महाराज से प्रेरणा मिलने के बाद उन्होंने शहीदों के सम्मान में एक ऐसा स्थान बनाने का संकल्प लिया, जहां उनके बलिदान को हमेशा याद किया जा सके.
बाद में परमानंद महाराज ने इस संकल्प को आगे बढ़ाया और इसे मंदिर का स्वरूप दिया. उनका उद्देश्य साफ था कि देश के लिए जान न्योछावर करने वाले वीर जवानों का सम्मान केवल विशेष दिनों तक सीमित न रहे, बल्कि हर दिन उनकी स्मृतियों को जीवित रखा जाए.

इस मंदिर में मौजूद है महात्मा गांधी और रविंद्र नाथ टेगौर की मूर्ति.
आज भी निभाई जा रही सेवा की परंपरा
समय के साथ यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं रहा, बल्कि देशभक्ति का केंद्र बन गया. दानसिंह चौधरी और उनके परिवार द्वारा शुरू की गई इस पहल को अब जामोद परिवार आगे बढ़ा रहा है. माता-पिता के निधन के बाद भी परिवार लगातार मंदिर की देखरेख और सेवा में लगा हुआ है.
21 परमवीर चक्र विजेताओं को मिला सम्मान
मंदिर परिसर में देश के उन महान योद्धाओं और सैन्य अधिकारियों को विशेष स्थान दिया गया है, जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा में अमूल्य योगदान दिया. यहां भारत के प्रथम थलसेना प्रमुख जनरल के.एम. करियप्पा, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और पूर्व वायुसेना प्रमुख अर्जुन सिंह सहित 21 परमवीर चक्र विजेताओं को सम्मानित किया गया है. मंदिर में स्थापित प्रतिमाएं और स्मारक देश के गौरवशाली सैन्य इतिहास की याद दिलाते हैं और युवाओं को देशसेवा के लिए प्रेरित करते हैं.

बाहर से ऐसा दिखता है ये मंदिर.
41 वीर सपूतों और नारी शक्ति को समर्पित
इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि यहां केवल पुरुष सैनिकों को ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाली नारी शक्ति को भी सम्मान दिया है. मंदिर परिसर में करीब 41 वीर सपूतों और महिला शक्ति की प्रतिमाएं स्थापित हैं. इन प्रतिमाओं के माध्यम से देशभक्ति, साहस और समर्पण की भावना को जीवित रखा है.
अमर जवान, अमर किसान और अमर विज्ञान का संदेश
मंदिर केवल सैनिकों के शौर्य की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले अन्य क्षेत्रों को भी सम्मान देता है. यहां 'अमर जवान', 'अमर किसान' और 'अमर विज्ञान' के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि देश की मजबूती केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों से नहीं, बल्कि खेतों में मेहनत करने वाले किसानों और विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से भी जुड़ी है.

छोटे से कमरे से शुरू हुई बड़ी पहल
मंदिर से जुड़े संजय कुमार चौधरी बताते हैं कि यहां स्थापित सभी प्रतिमाएं फाइबर से तैयार की गई हैं. प्रत्येक प्रतिमा को बनाने में करीब 45 हजार रुपये की लागत आई है. आज जो मंदिर देशभक्ति का प्रतीक बन चुका है, उसकी शुरुआत एक छोटे से कमरे से हुई थी. धीरे-धीरे लोगों का सहयोग मिला और यह स्थान शहीदों के सम्मान का एक अनूठा केंद्र बन गया. आज यहां आने वाला हर व्यक्ति गर्व और सम्मान की भावना के साथ लौटता है.
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