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भारत में महिलाओं के लिए CEO बनना मुश्किल? आंकड़े बताते हैं अलग कहानी, कमाई में भी पुरुषों से आगे

इंदिरा नूई ने हाल ही में कहा कि वह भारत में कभी CEO नहीं बन सकती थीं. उनके इस बयान पर हंगामा मचा हुआ है. ऐसे में जानते हैं कि क्या भारत में वाकई महिलाएं CEO नहीं बन पाती?

भारत में महिलाओं के लिए CEO बनना मुश्किल? आंकड़े बताते हैं अलग कहानी, कमाई में भी पुरुषों से आगे
बीते सालों में कॉर्पोरेट में टॉप लीडरशिप में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है.
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  • पेप्सिको की पूर्व CEO इंदिरा नूई का कहना है कि वह भारत में कभी CEO नहीं बन पातीं
  • इंदिरा नूई के इस बयान पर सोशल मीडिया पर तीखा विरोध देखने को मिला है
  • भारत में महिला CEO की संख्या तेजी से बढ़ रही है, कई बड़ी कंपनियों में महिलाएं शीर्ष पद संभाल रही हैं
नई दिल्ली:

अमेरिकी कंपनी पेप्सिको की पूर्व चेयरमैन और CEO इंदिरा नूई के एक बयान से भारत में बवाल मच गया है. उन्होंने अमेरिका और भारत की तुलना करते हुए कहा कि अमेरिकी व्यवस्था में 'मेरिट' का ध्यान रखा जाता है. उन्होंने दावा किया कि वह भारत में कभी किसी कंपनी की CEO नहीं बन सकती थीं. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका 'सबसे बेहतरीन देश' है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां ऐसे मौके मिलते हैं जो कहीं और नहीं मिल सकते, खासकर बाहर से आकर बसने वालों को.इंदिरा नूई के इस बयान के बाद भारत में बहस खड़ी हो गई है. कई लोग उनके इस बयान का समर्थन कर रहे हैं तो कई ऐसे भी हैं जो उनका विरोध कर रहे हैं.

क्या कहा था इंदिरा नूई ने?

पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस के साथ इंटरव्यू के दौरान इंदिरा नूई ने कहा, 'अमेरिका वह जगह है, जहां कोई इमिग्रेंट बिना कुछ लिए आ सकता है और एक मशहूर कंनी का CEO बन सकता है. मैं भारत समेत दुनिया के किसी भी दूसरे देश में CEO नहीं बन सकती थी.'

उन्होंने आगे कहा, 'ऐसा इसलिए है, क्योंकि अमेरिका का सिस्टम मेरिट पर आधारित है. यहां इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप पुरुष हैं या महिला. वे बस यही चाहते हैं कि सबसे काबिल लोग टॉप पर पहुंचे.'

इंदिरा नूई का यह बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उनका विरोध करना शुरू कर दिया. एक यूजर ने कहा, 'मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं लेकिन मेरिट-बेस्ड सिस्टम से भारत को बाहर रखना या तो उनका पक्षपात है या फिर उन्हें भारत के बारे में कम जानकारी है.'

बीजेपी महिला मोर्चा से जुड़ीं नीतू गर्ग ने X पर लिखा, 'यह कहना कि वह भारत में कभी CEO नहीं बन सकती थीं, यह पूरी तरह से नहीं दिखाता कि भारत कितना आगे बढ़ चुका है. आज भारतीय टैलेंट ग्लोबल कंपनियों को लीड कर रहा है और भारतीय कंपनियों में लीडरशिप के लिए काबिलियत को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है.'

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एक और यूजर ने कहा, 'इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका ने आपको शानदार मौके दिए, लेकिन यह दावा करना कि आप भारत में कभी CEO नहीं बन सकती थीं, एक गलत धारणा है जो कई भारतीय महिला CEO की कामयाबी को नजरअंदाज करता है.'

बिजनेसमैन और कॉलमिस्ट सुहेल सेठ ने भी इंदिरा नूई की बातों की आलोचना की और सवाल उठाया कि कामयाब भारतीय अक्सर अपने देश की बुराई क्यों करते हैं?

उन्होंने कहा, 'इंदिरा नूई का यह कहना अजीब लगता है कि वह भारत में CEO नहीं बन सकती थीं, जबकि रिटायरमेंट के बाद वह भारत में हर तरह की बोर्ड पोजिशन पाने की कोशिश करती रहीं. इतने कामयाब और होशियार लोग हमेशा अपने ही देश की बुराई क्यों करते हैं? क्यों?'

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भारत में महिलाओं का CEO बनना मुश्किल है?

इंदिरा नूई का कहना है कि वह भारत में कभी CEO नहीं बन सकती थीं. लेकिन इसी भारत में किरण मजूमदार शॉ बायोकॉन को संभाल रही हैं. नायका की CEO फाल्गुनी नायर हैं. चंदा कोचर देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक ICICI की CEO रही हैं. विभा पाडलकर HDFC बैंक की CEO हैं. और भी ऐसे कई उदाहरण हैं.

भारत में अब महिलाएं टॉप सीनियर पोजिशन पर पहुंचकर कंपनियों को संभाल रही हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ सालों में कंपनियों में टॉप पोजिशन पर इतनी तेजी से पुरुषों की संख्या नहीं बढ़ी है, जितनी तेजी से महिलाओं की संख्या बढ़ी है.

केंद्र सरकार की 'Women & Men In India 2025' की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय कंपनियों में सीनियर पोजिशन पर महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से 2025 के बीच कंपनियों में टॉप पोजिशन पर पहुंचने वालीं महिलाओं की संख्या में लगभग 103% की बढ़ोतरी हुई है. जबकि, इसी दौरान पुरुषों की संख्या 74% ही बढ़ी है. 

ये आंकड़े दिखाते हैं कि कंपनियां अब महिला लीडरशिप पर न सिर्फ भरोसा कर रही हैं, बल्कि उन्हें मौका भी दे रही हैं.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 तक भारतीय कंपनियों में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में 24.56 लाख पुरुष और 10.08 लाख महिलाएं थीं. जबकि, 2017 तक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में 12.90 लाख पुरुष और 4.47 लाख महिलाएं थीं.

इसी तरह कंपनियों में सीनियर मैनेजमेंट पोस्ट पर 2017 तक 1.50 लाख पुरुष और 23,685 महिलाएं थीं. दिसंबर 2025 तक 2.06 लाख पुरुष और 42,436 महिलाएं सीनियर मैनेजमेंट पोस्ट पर थीं. सीनियर मैनेजमेंट पोस्ट में CEO, CFO, कंपनी सेक्रेटरी, मैनेजिंग डायरेक्टर, मैनेजर और होल-टाइम डायरेक्टर आते हैं.

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वहीं, कंपनियों में दूसरी मैनेजमेंट पोस्ट में 31 दिसंबर 2025 तक 23.34 लाख पुरुष और 9.80 लाख महिलाएं थीं. 

इतना ही नहीं, टॉप पोजिशन पर महिलाएं, पुरुषों से ज्यादा कमा रही हैं. शहरी महिला अगर सीनियर पोजिशन पर है, तो वह हर एक घंटे में औसतन 234 रुपये कमा रही है, जबकि शहरी पुरुष हर घंटे 217 रुपये ही कमा रहा है.

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राजनीति और अदालतों में कम महिलाएं कम

भले ही कंपनियों में महिलाओं की संख्या बढ़ रही हो लेकिन राजनीति और अदालतों में अभी भी महिलाओं की बहुत कमी है. आधी आबादी होने के बावजूद राजनीति और अदालतों में महिलाएं बहुत कम हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक संसद में 14% से भी कम महिला सांसद हैं. वहीं, सरकार में 10% से भी कम महिला मंत्री हैं. हालांकि, पंचायतों में महिलाएं ठीक-ठाक हैं. देशभर की पंचायतों में महिलाओं की हिस्सेदारी 49.75% है, जबकि 16 राज्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा है.

वहीं, देशभर की अदालतों में जजों के लिए 1,122 पद हैं, जिनमें से सिर्फ 118 पद यानी 14.30% पर ही महिलाएं हैं. सुप्रीम कोर्ट के 33 जजों में से सिर्फ 3% ही महिलाएं हैं.

डिफेंस और पुलिस फोर्स में भी महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है. डिफेंस फोर्स में 8% तो पुलिस फोर्स में सिर्फ 10% ही महिलाएं हैं. 

हालांकि, घरों में लिए जाने वाले अहम फैसलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. 2015-16 की तुलना में 2019-21 में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 90 फीसदी से ज्यादा महिलाएं घर के अहम फैसलों में शामिल हैं. इसका मतलब हुआ कि घर कैसे चलेगा और घर में रहने वाले क्या-कुछ करेंगे? ये सारे फैसले महिलाओं से पूछकर लिए जा रहे हैं.

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