- म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना, जिससे क्षेत्रीय कूटनीति सक्रिय हुई
- ह्लाइंग ने चीन का दौरा कर म्यांमार के लिए चीन के साथ मजबूत सहयोग और सैन्य सहायता को भी मजबूत किया
- बांग्लादेश में अब चीन के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत करते हुए भारत के साथ सहयोग सक्रिय करने की सलाह दी जा रही है
म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने अपनी पहली राष्ट्रपति यात्रा के लिए भारत को चुना, तो पूरे क्षेत्र का ध्यान इस ओर गया. दो हफ्ते के भीतर ही वे बीजिंग में थे और 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हाथ मिला रहे थे. पश्चिमी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना कर रहे एक पूर्व सैन्य अधिकारी और अब राष्ट्राध्यक्ष की यह एक अद्भुत कूटनीतिक उपलब्धि थी. अब इस पर बांग्लादेश में जोरदार चिंतन चल रहा है. भारत-चीन के पास के देशों में भी इस घटना को बहुत ध्यान से देखा गया.
भारत दौरे पर क्या हुआ
राष्ट्राध्यक्षों की यात्रा के पीछे की रणनीतिक सोच को समझना जरूरी होता है. भारत ने बातचीत का रास्ता चुना, क्योंकि म्यांमार उसका एकमात्र आसियान पड़ोसी है और वह नई दिल्ली की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत एक अहम जमीनी कड़ी है. गृहयुद्ध के कारण सालों से अटके दो बड़े कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग इस बार मोदी-ह्लाइंग की बातचीत के मुख्य एजेंडे में शामिल थे. भारत ने म्यांमार के विशाल 'रेयर अर्थ' के भंडार तक पहुंच बनाने पर भी जोर दिया और यह वादा लिया कि म्यांमार अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ नहीं होने देगा. ह्लाइंग का राष्ट्रपति के तौर पर भारत में जोरदार स्वागत करना इस रिश्ते को आगे बढ़ाने की एक कीमत थी.

चीन दौरे पर दिखा बैलेंस
ह्लाइंग ने चीन का हिसाब-किताब भी बहुत सोच-समझकर किया था. तख्तापलट के बाद से ही चीन म्यांमार का सबसे करीबी मददगार रहा है. उसने हथियार और निवेश दिए. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कूटनीतिक सुरक्षा दी और जातीय सशस्त्र समूहों पर दबाव बनाया. ह्लाइंग की चीन यात्रा इसी मदद को और मजबूत करने के लिए था. इन यात्राओं की खास बात यह है कि मिन आंग ह्लाइंग ने जान-बूझकर दोनों ताकतों का इस्तेमाल किया. पहले भारत का दौरा करके बीजिंग को यह संकेत दिया कि म्यांमार के पास दूसरे विकल्प भी हैं, और फिर चीन जाकर उस जरूरी रिश्ते को फिर से पक्का किया. यह बड़ी ताकतों के बीच संतुलन बनाने का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसे एक ऐसे सैन्य नेता-से-राजनेता बने व्यक्ति ने बहुत कुशलता से अंजाम दिया.
बांग्लादेश अब क्यों चिंतित
बांग्लादेश के लिए, ये ऐसी घटनाएं नहीं हैं जिन्हें आराम से दूर बैठकर देखा जाए. ये उसके दरवाजे पर हो रहे बड़े बदलाव हैं, और इनके सीधे और मापे जा सकने वाले नतीजे होंगे. सबसे जरूरी मुद्दा रोहिंग्या संकट है. जनवरी 2026 तक, बांग्लादेश 11.8 लाख से ज्यादा रोहिंग्या लोगों को शरण दे रहा था, जिनमें 1,43,327 नए आए लोग भी शामिल थे. इस मानवीय काम का बोझ देश अब लंबे समय तक नहीं उठा सकता. 2025–26 के जॉइंट रिस्पॉन्स प्लान के लिए 934.5 मिलियन डॉलर की जरूरत थी, लेकिन इसे हमेशा कम फंड मिला है क्योंकि दुनिया भर के दान देने वालों का ध्यान यूक्रेन, गाजा और दूसरी आपातकालीन स्थितियों की ओर चला गया है. इनकी स्वदेश वापसी पर म्यांमार ने लगातार अपने वादों को पूरा करने से इन्कार किया है. जिस सरकार को अब एशिया की दो क्षेत्रीय ताकतें सक्रिय रूप से अपने पाले में करने की कोशिश कर रही हैं, उस पर ऐसे वादे करने के लिए बाहरी दबाव और भी कम हो गया है. इससे भी बुरी बात यह है कि बांग्लादेश से सटे इलाके पर अब म्यांमार की सेना का कोई नियंत्रण नहीं है. दिसंबर 2024 से, अराकान आर्मी का उत्तरी रखाइन के ज्यादातर हिस्सों, जिसमें मौंगडॉ भी शामिल है, पर कब्जा है. स्वदेश वापसी की कोई भी ऐसी व्यवस्था जो इस जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करती है, वह कोई योजना नहीं है—बल्कि एक कल्पना है.

बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा खतरा
इससे भी ज्यादा गंभीर रणनीतिक खतरा टकराव का नहीं, बल्कि नजरअंदाज किए जाने का है. अगर कालादान कॉरिडोर और त्रिपक्षीय हाईवे म्यांमार के जरिए भारत को सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ते हैं, तो एक क्षेत्रीय ट्रांजिट हब के तौर पर बांग्लादेश की अहमियत कम हो जाएगी. अगर चीन का नया म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर आकार लेता है, तो कनेक्टिविटी का एक और बड़ा ढांचा बनेगा जिसमें ढाका कोई अहम कड़ी नहीं होगा. बांग्लादेश दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के रणनीतिक केंद्र में, बंगाल की खाड़ी पर स्थित है और दोनों बड़ी ताकतों के प्रभाव वाले क्षेत्रों से घिरा हुआ है. खतरा यह है कि नई क्षेत्रीय व्यवस्था बांग्लादेश के साथ मिलकर नहीं, बल्कि उसे दरकिनार करके बनाई जा रही है. बांग्लादेश के लिए खतरा टकराव का नहीं, बल्कि नजरअंदाज किए जाने का है.
ढाका में किस बात की चर्चा
- बांग्लादेश के एक्सपर्ट ढाका को तीन सुझाव दे रहे हैं. पहली बात, म्यांमार के साथ बांग्लादेश का जुड़ाव सिर्फ कहने-सुनने तक सीमित न रहकर सक्रिय होना चाहिए. म्यांमार की सरकार के साथ लोगों की वापसी की शर्तों, बॉर्डर प्रोटोकॉल और हिरासत में लिए गए नागरिकों के मुद्दों पर सीधी बातचीत बहुत पहले हो जानी चाहिए थी. साथ ही, अराकान आर्मी के साथ संपर्क बनाना भी जरूरी है—चाहे यह संपर्क UN एजेंसियों या सिविल सोसाइटी के जरिए हो—क्योंकि लोगों की वापसी की किसी भी ऐसी योजना के लिए यह जरूरी है जिसके असल में सफल होने की उम्मीद हो. जमीन पर जिसका कंट्रोल है, उसे बातचीत का हिस्सा बनाना होगा, चाहे राजनीतिक मुश्किलें कितनी भी क्यों न हों.
- दूसरा, बांग्लादेश को रोहिंग्या मुद्दे पर चीन के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों का इस्तेमाल एक खास कूटनीतिक हथियार के तौर पर करना चाहिए. चीन ही एकमात्र बाहरी देश है, जिसका म्यांमार पर वास्तविक प्रभाव है. जून 2026 के आखिर में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग यात्रा के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा पर एक व्यापक संयुक्त बयान जारी किया गया था. भविष्य की बातचीत में रोहिंग्याओं की वापसी के लिए स्पष्ट और जांचने योग्य पैमाने शामिल होने चाहिए—सिर्फ समर्थन की अस्पष्ट बातें नहीं, बल्कि तय समय-सीमा और स्वतंत्र निगरानी वाली पायलट वापसी योजनाएं होनी चाहिए.
- तीसरा, भारत के साथ रिश्तों को तुरंत ठीक करके फिर से सक्रिय करना जरूरी है. नई दिल्ली और ढाका के हित सीमा पर स्थिरता, नशीली दवाओं के खिलाफ कार्रवाई और रखाइन-चटगांव पहाड़ी इलाकों के कॉरिडोर में गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के फैलाव को रोकने जैसे मामलों में एक जैसे हैं—ये हित इतने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं कि इन्हें आपसी मतभेदों की वजह से दांव पर नहीं लगाया जा सकता. म्यांमार पर एक व्यवस्थित बातचीत, जिसमें दोनों राजधानियों के सुरक्षा विशेषज्ञ शामिल हों, एक समन्वित दृष्टिकोण विकसित करने में मदद कर सकती है; इससे नेपीडॉ को अपने दो सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसियों के बीच किसी भी मतभेद का फायदा उठाने से रोका जा सकेगा.
अब देखना ये है बांग्लादेश की सरकार इस पर क्या फैसला लेती है. हालांकि, तारिक रहमान ने भले ही अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चीन को चुना लेकिन कूटनीतिक स्तर पर वो लगातार भारत से संपर्क बनाए हुए हैं. दोनों देशों के बीच हर स्तर पर वार्ता लगातार चल रही है और हाल के दिनों में किसी बात पर तनाव भी नहीं दिखा है. इसके विपरीत दोनों देश तनाव को कम करने और बिजनेस और पीपल टू पीपल कॉन्टैक्ट को लगातार बढ़ा रहे हैं. जाहिर है अगर तारिक रहमान सरकार म्यांमार के रास्ते पर चलती है तो एक बार फिर से भारत-बांग्लादेश संबंध फिर से नई ऊंचाई पर होंगे.
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