विश्व बैंक में भारत के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने बताया कि आरबीआई ने अर्थव्यवस्था की ग्रोथ का जो अनुमान लगाया है, वो असल स्थिति से थोड़ा ज्यादा अलर्ट मोड में है. जमीन पर भारत की अर्थव्यवस्था कहीं ज्यादा मजबूत दिख रही है. उन्होंने बताया कि देश की विकास दर अपने तय स्पीड से आगे बढ़ रही है. रिजर्व बैंक के फैसले विदेशी निवेश को लेकर पॉजिटिव माहौल पैदा करेंगे.
#WATCH | Delhi: When asked about his opinion on whether the government will meet its disinvestment targets with coal India, NHPC, and Central Bank FPO's oversubscribed 3-4 times and with upcoming FPO's of LIC and IDBI Bank, Neelkanth Mishra, Executive Director for India at the… pic.twitter.com/qaXggkY5Dr
— ANI (@ANI) June 5, 2026
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कैपिटल गेन में टैक्स छूट से बाजार को मिलेगा बूस्ट
नीलकंठ मिश्रा ने आगे बताया कि विदेशी निवेशकों को सरकारी बॉन्ड से मिलने वाले ब्याज और मुनाफे पर टैक्स छूट देने का फैसला काफी बड़ा है. इससे ना सिर्फ देश में विदेशी निवेश बढ़ सकता है, बल्कि बाजार में भरोसा भी मजबूत होगा. उन्होंने कहा कि इसका असर सिर्फ निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करेंसी के बाजार की चिंता को भी कम करेगा. उनके अनुसार अभी के समय में डॉलर की मांग ज्यादा बढ़ गई थी. जरूरत से ज्यादा बढ़ गई थी, जो असल में ऑफ पेमेंट)से भी ज्यादा हो गई थी.
'सरकार प्राइवेटाइजेशन को लेकर गंभीर'
जब नीलकंठ मिश्रा से पूछा गया कि क्या सरकार कोल इंडिया, एनएचपीसी और सेंट्रल बैंक के एफपीए, जो 3 से 4 गुना ज्यादा सब्सक्राइब हुए और LIC और IDBI बैंक के आने वाले FPO के जरिए अपने विनिवेश के टारगेट पूरे कर पाएगी, तो उन्होंने कहा, "सरकार जितना ज्यादा ऐसा करेगी, हमारे लिए उतना ही अच्छा होगा. इससे सरकारी खजाने को मदद मिलती है. साथ ही बाजार को एक मजबूत संकेत मिलता है कि सरकार प्राइवेटाइजेशन को लेकर गंभीर है.
सारा खेल बैलेस ऑफ पेमेंट का
नीलकंठ मिश्रा ने आगे कहा कि कच्चे तेल की कीमत घटकर करीब 80 डॉलर प्रति बैरल आ जाती है तो भारत के बैलेस ऑफ पेमेंट पर से काफी हद तक प्रेशर कम हो जाएगा. लेकिन दूसरी तरफ अगर ये कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर ही रहती हैं तो फिर रुपये पर दबाव बना रह सकता है. इसे संभालने के लिए सरकार को फिर कुछ और कदम उठाने पड़ सकते हैं.
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