विज्ञापन
OPINION

रज पर्व: ओडिशा का वह अनोखा त्योहार, जहां धरती के रजस्वला होने का मनाया जाता है उत्सव

ओडिशा में प्रकृति और नारीत्व का सम्मान करने वाला अनोखा तीन दिवसीय 'रज पर्व' शुरू हो गया है. इस त्योहार में धरती माता के मासिक धर्म चक्र का उत्सव मनाते हुए खेती-खुदाई रोक दी जाती है.

रज पर्व: ओडिशा का वह अनोखा त्योहार, जहां धरती के रजस्वला होने का मनाया जाता है उत्सव
ओडिशा में मनाया जा रहा रज पर्व
PTI

भारत की मिट्टी में जन्मा हर व्यक्ति इस भूमि को अपनी मातृभूमि मानता है. इसे पूजें या न पूजें, इस पर मतभेद भले हों, लेकिन इतना निर्विवाद है कि यह धरती हम सबकी मां है. हमारे वेदों ने भी भूमि को माता कहकर पुकारा है. अथर्ववेद का भूमि सूक्त घोषणा करता है 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः', अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं. हजारों वर्षों से चली आ रही भारतीय परंपरा भूमि को केवल मिट्टी नहीं, बल्कि मातृ शक्ति के रूप में देखती है, वह शक्ति जो हमें पालती है, अन्न देती है और जीवन के लिए आवश्यक हर संसाधन अपने भीतर से उपजाती है.

लेकिन क्या भूमि के इस मातृ – स्त्री रूप का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण, कोई जीवंत परंपरा हमें कहीं दिखाई देती है? पश्चिम, उत्तर या दक्षिण भारत में ऐसा कोई बड़ा उत्सव व्यापक रूप में दिखाई नहीं देता. पर देश के सुदूर पूर्व में, ओडिशा में, भूमि के स्त्रीत्व का यह भाव एक जीवंत उत्सव बनकर सामने आता है. यहां धरती माता के रजस्वला होने का पर्व पूरे चार दिन श्रद्धा, उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इसे रज पर्व कहा जाता है, धरती माता के रजस्वला होने का पर्व.

लोककथा है कि इन दिनों धरती माता रजोधर्म यानी मासिक धर्म से गुजरती हैं. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो रज पर्व का समय, जो हर साल लगभग जून महीने में आता है, वही समय है जब भारत में मानसून दस्तक देने वाला होता है और खेती किसानी की शुरुआत होने वाली होती है. माना जाता है कि यह मेघ और माटी के मिलन से ठीक पहले का समय है यानी धरती कुछ नया उपजाने, सस्य को जन्म देने की तैयारी में होती है. जैसे किसी स्त्री के मातृत्व से पहले रजोधर्म आता है, वैसे ही धरती भी इस सृजन काल से पहले रजोधर्म से गुजरती हुई मानी जाती है.

ओडिशा के कृषिप्रधान समाज के लिए इस पर्व का महत्व और भी गहरा है. इसलिए इन दिनों भूमि को विश्राम दिया जाता है, न उस पर हल चलाया जाता है, न कोई भारी बोझ रखा जाता है और न ही उसे किसी प्रकार की चोट पहुंचाई जाती है. यह केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संवेदनशीलता का प्रतीक भी है.

पर्व का पहला दिन 'पहिली रज' कहलाता है. इस दिन घर की बेटियों को कोई कष्ट नहीं दिया जाता. उन्हें स्नेह, सम्मान और उत्सव के भाव से विशेष स्थान दिया जाता है. यह पर्व बेटियों को आने वाले गृहस्थ जीवन का स्नेहपूर्ण बोध भी कराता है, ताकि वे आगे चलकर एक सुखी पारिवारिक जीवन जी सकें. यह वही काल है जब धरती की सृजन शक्ति अपने चरम की ओर बढ़ती है और इसी कारण उसकी तुलना एक रजस्वला स्त्री से की जाती है.

कई इतिहासकार और लोक मान्यताएं इस पर्व को श्री जगन्नाथ मंदिर की परंपरा से भी जोड़ती हैं. कहा जाता है कि इन दिनों मंदिर में स्थापित भूदेवी भी रजस्वला होती हैं. इसी मान्यता के साथ यह पर्व ओडिशा में और भी अधिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. रज पर्व की यही विशेषता है कि यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धार्मिक आस्था, दोनों को एक सुंदर सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ता है. एक ओर यह मानसून और कृषि-चक्र से जुड़ा प्रकृति का उत्सव है, तो दूसरी ओर यह धरती माता के स्त्रीत्व और सृजन शक्ति के प्रति श्रद्धा का पर्व भी है.

चार दिनों के इस पर्व का अपना अलग क्रम है. पहला दिन 'पहिली रज', दूसरा 'रज संक्रांति', तीसरा 'भूमि दाह' या 'बासी रज' और चौथा 'बसुमती स्नान' कहलाता है. बसुमती स्नान के दिन भूमि माता को विधिवत स्नान कराया जाता है. इन दिनों ओडिशा के घर घर में बेटियां नई साड़ियां पहनती हैं, पैरों में अलता रचाती हैं, झूलों पर झूलती हैं, पान खाती हैं और तरह तरह के पकवानों का आनंद लेती हैं. हर कुंवारी कन्या के लिए यह वर्ष का सबसे प्रिय और बड़ा उत्सव माना जाता है.

भुवनेश्वर के श्री जयदेव कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी, नहरकंटा में इतिहास विभाग के अध्यापक उमाकांत महारणा कहते हैं कि प्रागैतिहासिक काल से मानव समाज भूमि की पूजा करता आया है. भूमि ही मनुष्य को अन्न देती है, भोजन देती है. उसी के प्रति कृतज्ञता के रूप में ओडिशा में रज पर्व मनाया जाता है. यह पर्व भूमि माता के रजस्वला होने के उस अनोखे भाव को उजागर करता है, जो शायद पूरे देश में और कहीं नहीं मिलता.

ओडिशा में पत्रकारिता कर रहीं स्वाती शिखा साहू कहती हैं कि यह पर्व उनके लिए सबसे बड़ा त्योहार है. गांवों में पारंपरिक खेल खेले जाते हैं, घरों में तरह-तरह के पकवान और पीठा बनाए जाते हैं. बेटियां नई साड़ियां पहनती हैं, पैरों में अलता रचाती हैं, पान खाती हैं और पूरे चार दिन धूमधाम से रज उत्सव मनाती हैं. यह पर्व उन्हें अपनी परंपरा, अपने गांव और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है.

रज पर्व कोई साधारण उत्सव नहीं है. यह उस भूमि को, जिसे हम धरती माता, वसुधा तथा जननी कहकर पुकारते हैं, उसके वास्तविक स्त्री रूप में देखने और उस रूप को सम्मान देने का पर्व है. जो समाज धरती को मां मानता है, मातृभूमि कहकर उसके सामने शीश झुकाता है, वही समाज यहां उसके स्त्रीत्व को भी पूरी गरिमा के साथ स्वीकार करता है. शायद यही भाव रज पर्व को पूरे भारत में अनूठा बनाता है.

(डिस्क्लेमर:  रितेश पृषेठ पत्रकार हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Odhisa, Raja Parba, Raja Parba In Odisha
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com