- ओडिशा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के विधायकों को क्रॉस वोटिंग से बचाने के लिए रिजोर्ट में रखा गया
- भाजपा के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद तीसरे उम्मीदवार की जीत के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत है
- चौथी राज्यसभा सीट पर भाजपा समर्थित दिलीप रे और विपक्ष के उम्मीदवार दत्तेश्वर होता के बीच कड़ा मुकाबला
ओडिशा में राज्यसभा के लिए कांग्रेस को अब रिजोर्ट पॉलिटिक्स का सहारा लेना पड़ रहा है. जब भी कांग्रेस अपने विधायकों को पाला बदलने से रोकने के लिए रिजोर्ट भेजती है तो संकट मोचक के तौर पर डी के शिवकुमार ही सामने आते हैं. पिछले कई बार ऐसा देखने को मिला है. जब 2017 में अहमद पटेल राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे थे तब गुजरात के कांग्रेस विधायकों को बेंगलुरु के रिजोर्ट में रखने की जिम्मेदारी भी डी के शिवकुमार को ही दी गई थी. उस चुनाव में अहमद पटेल जीते थे. यही नहीं 2002 में भी विलास राव देशमुख की सरकार को बचाने के लिए महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायकों को भी डी के शिवकुमार ने रिसोर्ट में रखा था. सबसे ताजा मौका ओडिशा के 14 कांग्रेस विधायकों का है जिसे क्रॉस वोटिंग से बचाने के लिए बेंगलुरु भेजा गया है और इन विधायकों की रामनगर के बिदादी रिसोर्ट में अच्छी ख़ातिरदारी की जा रही है.
ओडिशा में इस बार राज्यसभा चुनाव बेहद कांटे का होने जा रहे हैं. बिहार की तरह ही यहां भी चार राज्यसभा सीटों के लिए पांच उम्मीदवारों ने नामांकन किया है. यहां पर चौथी सीट जीतने के लिए लिए किसी भी पार्टी के पास संख्याबल नहीं है. अब दो निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होने जा रहा है, जिनमें जीत एक के ही हाथ लगेगी. मुकाबला भाजपा समर्थित पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप राय और बीजेडी-कांग्रेस-सीपीआई (एम) के संयुक्त उम्मीदवार दत्तेश्वर होता के बीच है.
ओडिशा में तीन सीटों के लिए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल, भाजपा के निवर्तमान राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार और कॉरपोरेट जगत के दिग्गज से बीजेडी नेता बने संतृप्त मिश्रा निर्विरोध चुने जाएंगे,मगर चौथी सीट पर मामला फंस गया है जिसके चलते वहां वोटिंग होगी क्योंकि चौथी सीट के लिए दो उम्मीदवार हैं.
ओडिशा विधानसभा के आंकड़ों के अनुसार 147 की विधानसभा में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 30 वोट चाहिए. बीजेपी के पास 79 विधायक हैं और 3 निर्दलीय विधायकों का उन्हें समर्थन है यानी 82 वोट. इस तरह बीजेपी के दो उम्मीदवार आसानी से जीत रहे है और उसके पास 22 वोट बच रहे हैं मगर तीसरा उम्मीदवार जीतवाने के लिए बीजेपी को 8 वोटों का जुगाड़ करना पड़ेगा.
वहीं बीजेडी के पास 48 विधायक हैं यानी बीजेडी का भी एक उम्मीदवार आसानी से जीतेगा मगर इसमें कांग्रेस के 14 और सीपीएम के 1 विधायक को जोड़ दें तो संख्या हो जाती है 33 यानी जीत से 3 विधायक अधिक.
बीजेपी के समर्थन वाले दिलीप रे को यह सीट जीतनी है तो उन्हें 8 विधायकों को क्रॉस वोट करवाना पड़ेगा और उनकी निगाहें कांग्रेस के 14 और बीजेडी के कुछ विधायकों पर हैं इसलिए कांग्रेस ने अपने विधायकों को बेंगलुरु के रिजोर्ट में डी के शिवकुमार के संरक्षण में भेज दिया ताकि इन विधायकों का किसी से संपर्क ना हो और वोटिंग के एक रात पहले ही उन्हें भुवनेश्वर ले जाया जाएगा.
कौन हैं दिलीप रे और डॉ दतेश्वर होता?
दिलीप रे लंबे समय से राजनीति में हैं और बड़े सफल उद्योगपति भी हैं. दिलीप रे तीन बार ओडिशा विधानसभा से सदस्य रहे फिर बीजेडी से ही दो बार 1996 से 2008 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. दिलीप रे केन्द्र में मंत्री भी रहे. 2009 में दिलीप रे बीजेपी के सदस्य बने और 2014 में फिर से विधायक बने. दिलीप रे मेयफेयर ग्रुप ऑफ होट्लस के मालिक है. मेयफेयर रिजोर्ट दार्जिलिंग और ओडिशा में कई जगहों पर है. दिलीप रे अपने एफिडेविट में 435 करोड़ की संपत्ति की घोषणा की है. दिलीप रे ने 2018 में राजनीति छोड़ने की घोषणा की थी.
जबकि दत्तेश्वर होता ओडिशा के जाने माने यूरोलॉजिस्ट हैं. डॉ. होता का चार दशकों से अधिक का करियर है, जिसमें उन्होंने मुख्य रूप से ओडिशा में अपनी सेवाएं दी हैं. उन्होंने यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख और कटक स्थित एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के डीन एवं प्रिंसिपल सहित कई उच्च पदों पर कार्य किया है.
2023 में, डॉ. होता को भुवनेश्वर में ओडिशा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के पहले कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया था. कहने का मतलब है कि ओडिशा में राज्यसभा का चुनाव दिलचस्प हो गया है ,चौथी सीट की यह लड़ाई एक मंझे हुए नेता और बहुत ही सफल उद्योगपति और ओडिशा के एक मशहूर डॉक्टर के बीच के रूप में याद किया जाएगा,जहां एक को जीतने के लिए क्रॉस वोटिंग करवानी ही पड़ेगी.
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