युवाओं को नशे से दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा अभियान शुरू किया है. रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'नशा मुक्त युवा' अभियान की शुरुआत की और बताया कि अगले 100 रविवार नशा मुक्त भारत की दिशा में 100 मजबूत कदम उठाने होंगे.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नशा सिर्फ शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि इससे राष्ट्र की शक्ति भी कमजोर पड़ती है. उन्होंने कहा कि इसलिए दुश्मन देश भी षड़्यंत्र करके हमारे देश के युवाओं को इस नशे की लत में खींचने की कोई कोशिश बाकी नहीं रखते हैं. उन्होंने कहा कि ड्रग्स सप्लाई करके कमाई करना और देश को तबाह करना, यह भी उनकी आतंकी साजिश का हिस्सा होता है और इसलिए हमें हर एक युवा को नशे के चंगुल में फंसने से बचाना है.
इस अभियान का मकसद यही है कि युवाओं को नशे से बचाना है और विकसित भारत बनाना है. यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि नशा सिर्फ एक व्यक्ति को ही बर्बाद नहीं करता, बल्कि उसके परिवार, समाज और यहां तक कि देश को भी बर्बाद कर सकता है.
इतिहास में एक ऐसा बहुत बड़ा उदाहरण है, जिससे पता चलता है कि नशा किसी भी अच्छे-खासे साम्राज्य को बर्बाद कर सकता है. ये उदाहरण चीन के किंग राजवंश का है, जो कभी बहुत ताकतवर हुआ करता था लेकिन नशे के कारण घुटनों पर आ गया था. क्या हुआ था? सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं.
ब्रिटेन और चीन का साम्राज्य
19वीं सदी की शुरुआत में एक तरफ ब्रिटेन था, जहां औद्योगिकरण बढ़ रहा था, जिसके पास ताकतवर नौसेना था और भारत पर भी उसका कब्जा था, जिसने उसे ग्लोबल ट्रेड में बहुत ज्यादा असरदार बना दिया था. और दूसरी तरफ चीन था, जो बहुत पुराना साम्राज्य था.
इतिहास में चीन के राजवंश दुनिया के सबसे ताकतवर राज्यों में गिने जाते थे. 19वीं सदी में भी चीनी इंडस्ट्री ही दुनिया की इकनॉमी का इंजन होती ती. चीन से सिल्क रोड और हिंद महासागर के जरिए कारोबार होता था. 19वीं सदी की शुरुआत में चीन ही दुनिया की सबसे मजबूत इकनॉमी थी, न कि ब्रिटेन.
ये वो वक्त था जब चाय की इंडस्ट्री पर चीन का कंट्रोल था और ब्रिटेन वालों को ज्यादा से ज्यादा चाय चाहिए थी. चाय के लिए ब्रिटेन की दीवानगी ने चीन के साथ व्यापार में भारी असंतुलन पैदा कर दिया. रिपोर्ट्स बताती हैं कि उस वक्त लंदन में एक आम आदमी अपने बजट का 5% सिर्फ चाय पर खर्च कर रहा था. 1821 से 1830 के बीच ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने चीनी सामान पर 1.9 करोड़ पाउंड से ज्यादा खर्च किए. इसमें से 90 फीसदी से ज्यादा चाय पर खर्च हुआ.
ब्रिटेन को तो चीन की चाय पसंद थी लेकिन चीन वालों को ब्रिटेन से किसी चीज की खास जरूरत नहीं था. चीनियों की दिलचस्पी सिर्फ चांदी में थी. धीरे-धीरे ब्रिटेन का चांदी का खजाना खाली होने लगा, क्योंकि ब्रिटिश चाय और बाकी चीजों के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे थे.
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फिर आया- अफीम
उसी दौर में ब्रिटेन की नजर एक ऐसी चीज पर पड़ी, जो भारत में मिलती थी और उसका नाम था- अफीम.
अफीम, पोस्ता के पौधे के बीजों से बनने वाला एक नशीला पदार्थ है, जिसे ब्रिटिशर्स भारत में उगाते थे. इसकी लत बहुत तेजी से लगती है. अफीम का इस्तेमाल हेरोइन और मॉर्फिन बनाने में भी किया जाता है.
19वीं सदी में अफीम ने चीनी समाज को बर्बाद करना शुरू कर दिया. चीन की लगभग 10% आबादी अफीम ले रही थी. चीनी सरकार ने अफीम पर कई बार रोक लगाई, लेकिन अंग्रेजों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. गैर-कानूनी होने और लोगों को बर्बाद करने के बावजूद अंग्रेजों ने चीनियों को अफीम बेची. अफीम के बदले चीनी लोग अंग्रेजों को चांदी दे रहे थे.
जब चीनी सरकार ने अफीम के व्यापार पर रोक लगाई, तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने चीनी तस्करों को काम पर रखा ताकि वे अफीम को चुपके से चीन में ला सकें और उसे चांदी के बदले बेच सकें. कंपनी इस चांदी का इस्तेमाल चाय, रेशम और अन्य सामान खरीदने के लिए करती थी, जिन्हें वे ब्रिटिश ग्राहकों को बेचते थे.
इसका नतीजा यह हुआ कि चीन और ब्रिटेन के बीच व्यापार का असंतुलन तेजी से पलट गया. 1820 के दशक तक, जैसे-जैसे अंग्रेज ज्यादा अफीम की तस्करी करने लगे, चीन से चांदी बाहर जाने लगी. 1730 और 1830 के बीच की सदी में, चीन में आने वाली अफीम की मात्रा में 20,000% बढ़ गई.

अफीम को लेकर युद्ध
1838 तक चीन के राजा को एहसास हो गया था कि अब तो कुछ करना पड़ेगा. उन्होंने अफीम के व्यापार को खत्म करने के लिए अपने सबसे काबिल अधिकारियों में से एक को ग्वांगझू भेजा. उसका नाम लिन जेक्सू था. उन्होंने नशे के आदी लोगों और ड्रग डीलरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की. सजाएं बहुत कड़ी थीं और कई अफीम डीलरों को मौत की सजा दी गई. विदेशी व्यापारियों के साथ बातचीत ज्यादा मुश्किल साबित हुई.
लिन जेक्सू ने ब्रिटिश अफीम के 20,000 बक्से नष्ट कर दिए. उन्होंने ड्रग्स को जला दिया या समुद्र में फेंक दिया. तनाव तब और बढ़ गया जब ब्रिटिश नाविकों के एक समूह ने एक चीनी व्यक्ति की हत्या कर दी और ब्रिटिश अधिकारियों ने हत्यारों को चीनी अधिकारियों को सौंपने से इनकार कर दिया.
लिन जेक्सू ने चीनी व्यापारियों को अंग्रेजों को खाना बेचने से रोक दिया और नष्ट की गई अफीम के लिए ब्रिटिश व्यापारियों को भुगतान करने से इनकार कर दिया. सितंबर 1839 में लड़ाई शुरू हो गई. 1840 में, लंदन में ब्रिटिश सरकार ने चीन के लिए जहाजों का एक बेड़ा भेजने का आदेश दिया.
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पहला अफीम युद्ध...
पहला अफीम युद्ध 1839 से 1842 तक चला. जब ब्रिटिश बेड़ा पहुंचा, तो जल्द ही यह साफ हो गया कि चीनी सेना हथियारों के मामले में कमजोर थी. औद्योगीकरण ने ब्रिटेन को शक्तिशाली नए हथियार और भाप से चलने वाले जहाज दिए थे. चीनी जहाज उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे, और कई चीनी सैनिक तीर-धनुष और पुरानी फ्लिंटलॉक मस्कट (बंदूकें) से लैस थे.
ब्रिटिश बेड़े ने एक के बाद एक जीत हासिल की और चीनी बंदरगाह शहरों पर बमबारी करके उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. 1842 की गर्मियों तक, ब्रिटिश बेड़ा नानजिंग शहर के पास पहुंच गया था, और चीन को युद्ध खत्म करने के लिए एक संधि स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा.

इस संधि ने चीन को ब्रिटिश व्यापारियों के लिए पांच नए बंदरगाह खोलने पर मजबूर किया. इसमें चीन को युद्ध की लागत और नष्ट की गई अफीम का हर्जाना ब्रिटेन को देने की शर्त थी, और यह भी कहा गया था कि ब्रिटिश नागरिकों को चीनी कानूनों का पालन करने की जरूरत नहीं है. इसके बजाय, चीन में रहने के दौरान वे केवल ब्रिटिश कानूनों के अधीन थे.
अंग्रेजों ने हांगकांग द्वीप पर भी कब्जा कर लिया, जिस पर उन्होंने 1997 तक शासन किया. युद्ध के कारण, ब्रिटिश जहाजों को चीनी प्रवासी मजदूरों को ब्रिटिश उपनिवेशों और अमेरिका ले जाने की अनुमति मिल गई. ब्रिटिश उपनिवेशों में गुलामी प्रथा खत्म होने के बाद, चीनी प्रवासी मजदूर अक्सर वही काम करते थे जो पहले गुलाम लोग करते थे.
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फिर दूसरा अफीम युद्ध...
संधि होने के कुछ साल बाद ही फिर तनाव बढ़ा. इस बार लड़ाई में ब्रिटेन के साथ कुछ यूरोपीय देश, जापान और अमेरिका भी थे.
साल 1856 से 1860 तक, ब्रिटेन-फ्रांस और उनके साथियों ने चीन के खिलाफ दूसरा अफीम युद्ध लड़ा. चीन फिर हार गया और उसके और भी बंदरगाह खोल दिए गए. इस संघर्ष के बाद, अमेरिका, रूस और जापान ने चीन में अपना प्रभाव और सैन्य उपस्थिति बढ़ाई.

और 100 साल की बेइज्जती
अफीम का व्यापार और उसके बाद हुए युद्ध विश्व इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुए. यह पहली बार था जब कोई यूरोपीय साम्राज्य चीन और बाकी दुनिया के बीच व्यापार के असंतुलन को पलटने में कामयाब रहा. यूरोपीय लोग 15वीं सदी के आखिर में हिंद महासागर में आने के बाद से ही ऐसा करने की कोशिश कर रहे थे.
अफीम युद्ध के कारण चीन को काफी कुछ गंवाना पड़ा. उसके बंदरगाह चले गए. हांगकांग भी अंग्रेजों के पास आ गया. चीन में रहने के बावजूद अंग्रेजों पर उसके कानून नहीं चलते थे. चीन जो कभी साम्राज्य हुआ करता था, वह एक तरह से ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गया. चीन के लिए ये बेइज्जती थी और चीनी नेता इसे 'अपमान की सदी' कहा करते थे.
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