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This Article is From Jul 27, 2016

‘दुखी दलित’ का सुख किसमें है...सदगति या अस्तित्व में?

Pankaj Ramendu
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 27, 2016 15:55 pm IST
    • Published On जुलाई 27, 2016 15:50 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 27, 2016 15:55 pm IST
प्रेमचंद की कहानी ‘सदगति’ में दुखी दलित नायक अपने घर में एक पूजा के लिए गांव के ब्राह्मण को बुलाने जाता है। ब्राह्मण इस शर्त पर चलने को राज़ी होता है कि बदले में दुखी दलित उसके (ब्राह्मण के) घर का वो सारा काम करेगा जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है, मसलन झाड़ू, घर लीपना, गाय को घास डालना, वगैरह वगैरह। साथ ही वह यह भी शर्त रखता है कि उसके घर के सामने पड़े हुए पेड़ की लकड़ी भी दुखी दलित को काटनी होगी। इसका मतलब ये नहीं है कि ब्राह्मण, कहानी के नायक के घर जाने के लिए कोई दक्षिणा नहीं लेगा बल्कि ये तो नायक के साथ चलने की शर्त है, फीस तो अलग से लगेगी ही।

खैर, तो जिस पेड़ को काटने के लिए दुखी को कहा जाता है उसमें एक गांठ है, जिसे मामूली कुल्हाड़ी से काटना लगभग नामुमकिन है। ये गांठ रुढ़िवादी समाज का प्रतीक है। उस गांठ पर भूखे पेट कुल्हाड़ी चलाते चलाते दुखी का समय बीतता जाता है। गांठ नहीं टूटती लेकिन दुखी चमार की जिंदगी की गांठ खुल जाती है। ब्राह्मण के घर के सामने इस दलित नायक की लाश पड़ी हुई है, जो लगातार बारिश में भीग कर सड़ रही है। बारिश में क्या किया जाए। आखिर ब्राह्मण किसी दलित को छू कैसे सकता है। इस असमंजस में समय बीतता जाता है। आखिर भेद खुल जाने के डर और लाश के सड़ांध से बचने का फैसला लिया जाता है। ब्राह्मण दुखी के पैर में एक फंदा डालकर उसे घसीटता हुआ गांव से बाहर ले जाता है और एक कचरे के ढेर में फेंक देता है। प्रेमचंद की इस कहानी पर सत्यजीत रे ने जब फिल्म बनाई तो अंत में कचरे के ढेर पर पड़े दलित नायक की लाश पर फ्रेम फिक्स हो जाती है। ये वो फिक्स फ्रेम था जो पिछले हज़ारों सालों से फिक्स ही है। प्रेमचंद की कहानी के दलित नायक को भी सदगति ब्राह्मण के हाथों घिसट कर मिलती है।

हज़ारों सालों से ये दलित नायक समाज में अपनी मौजूदगी ज़ाहिर करने के लिए घिसट ही रहा है। भले ही प्रबुद्ध वर्ग ये मानता है कि दलित ही वो समाज है जो पहले से यहां रह रहा है। अपने पैतृक काम से जुड़े रहने या काम से जाति या जाति से काम का दबाव इस समाज पर सबसे ज्यादा रहा है। क्योंकि, देश के सवर्ण समाज को इस बात का डर हमेशा से रहा है कि अगर किसी मैला साफ करने वाले का लड़का अधिकारी बन गया तो देश के गटर कौन साफ करेगा। वो डरता है कि अगर इन्होंने अपना पेशा बदल लिया तो वो काम जिन्हें करने का सोच कर ही सवर्ण समाज को उबकाई आती है वो काम कैसे हो सकेगा। लेकिन बीते दिनों देश में गाय पर उमड़े अगाध प्रेम ने एक ऐसी पहल की है जिसके बाद शायद प्रेमचंद की कहानी के किरदार की तरह गाय को भी सदगति देने के लिए सवर्ण समाज को ही फंदा डालना पड़ेगा।

जाति का जन्म सामाजिक भेदभाव से नहीं बल्कि इस सुविधा से होता है कि पिता पुत्र का सबसे पहला शिक्षक होता है। वह जिस काम में दक्ष है वह उसे ही अपने बच्चे को सिखा सकता है। काम के समय वह छोटी –मोटी सहायता भी लेता रहता है और इस क्रम में ही उनका प्रशिक्षण होता चलता है। फिर वे अपने पिता के काम में हाथ बंटाने लगते है। इसलिए इस बात की संभावना सबसे अधिक होती है कि वो अपने पिता का पेशा अपनाएं। इस तरह दक्षता वंशगत पेशा बन जाती है और जाति का रूप लेने लगती है। लेकिन रुचि और जन्मजात प्रतिभा के अनुसार कोई नया क्षेत्र चुनने या कोई नया कौशल सीखने पर प्रतिबंध न होने के कारण, ये उस तरह जाति का रूप नहीं ले सकता था, जो वर्णवाद के कठोर होने के बाद संभव हुआ। दरअसल स्थायी बस्ती, स्थायी खेती और पशुपालन के साथ, मनुजात देवों के बीच, पहली बार अंतर शुरू हुआ, संत रैदास ने इसी के लिए कहा था, जाति जाति में जाति है ज्यों केले के पात।  

काम की विशेषज्ञता और फिर उसके पारिवारिक व्यवसाय बन जाने के कारण जातियां या जन्मजात पेशे विश्व के सभी उन्नत समाजों में रहे हैं। आज जब उनकी संताने उन पेशों को छोड़ चुकी हैं तो भी अपने अभिज्ञान के लिए वे अपने उपनामों में इनका प्रयोग करती हैं। अंग्रेजी उपनामों को लें तो गोल्डस्मिथ, कार्पेंटर, मैसन, गार्डनर, कार्टर, चैपलिन, कैंडलर, कार्वर, मिलर, कूपर (बैरल बनानेवाले), फ्लैचर (तीर बनानेवाले), हूपर (बैरल पर हुक लगानेवाले), नेलर (कील बनानेवाला), प्रॉक्टर, रेडमेन, ट्रिंडर जैसे सरनेम मौजूद हैं। वहीं पारसी समाज में भी देखें तो दारूवाला सरनेम वाले ज्योतिष विज्ञान पर काम कर रहे हैं। वहीं कॉट्रेक्टर सरनेम वाला कुछ और काम कर रहा है। इसी तरह लोहिया, सोनी, जौहरी, कापड़िया भी इसी श्रेणी में आते हैं।

अगर हम विदेशों में देखें तो वहां सरनेम को अपमान सूचक शब्द की तरह नहीं देखा जाता है। लेकिन हमारे यहां शुरू से ये वर्गीकृत हो गया कि  कुछ विशेष तरह के पेशे ‘हीन’ श्रेणी में आते हैं और इनसे जुड़े उपनामों को गाली की तरह भी प्रयोग किया जाता है। लगभग पंद्रह साल पहले भोपाल में एक पुलिस अधीक्षक ने अपने नाम के साथ चमार शब्द का प्रयोग किया था। क्योंकि उन्होंने आते साथ ही सख्त रवैया अपनाते हुए शहर की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करना शुरू कर दिया था जिसके कारण लोगों ने उन्हें दबी ज़ुबान में उनकी जाति से संबोधित करना शुरू कर दिया था जिसके पीछ की मंशा उन्हें नीचा दिखाना और आरक्षण से चुने जाने के कारण उन्हें योग्य न होना बताया जाने लगा था। उन्होंने अपने नाम के साथ खुद ही चमार शब्द लगाना शुरू कर दिया था जिससे लोगों के मुंह बंद हो गये थे।

हाल ही में दिल्ली की एक दलित लड़की के आईएएस में टॉप करने के लेकर भी सवर्ण समाज ने सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें उछाली। लेकिन, आरक्षण का विरोध करने वाले समाज में किसी ने ये नहीं बताया कि इससे पहले कितने दलित छात्रों ने टॉप किया है। वो जब ये बातें लिख रहे थे, तब भी उनकी सोच और लेखन में उन जाति विशेष के लिए अपमान ही था। जो ये बताता है कि भले ही आरक्षण की बदौलत दलित समाज ने आगे बढ़ना शुरू कर दिया है लेकिन सामाजिक स्तर पर उन्हें आज भी हेय दृष्टि से ही देखा जाता है। मेरी एक परीचित ने एक बार बताया था कि वो उसे दिल्ली की एक ज्योतिष विद्या सिखाने वाली महिला ने सारी बातें सिखाने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि वो छोटी जाति से थी।

समाज में दरअसल जो इतना बड़ा अंतर मौजूद है वो आदिकाल से ही शुरू हो चुका था। लेखक भगवान सिंह अपनी किताब ‘भारतीय परंपरा की खोज’ में बताया है कि असुर का अर्थ प्राणवान, बलवान आदि लिया जाता है, परंतु इनके जो लक्षण ऋग्वेद में विविध प्रसंगों में आए हैं, उनका यही निष्कर्ष निकलता है कि जो अपना आहार उत्पादित नहीं करते थे, इसके लिए पूर्णतया प्रकृति पर निर्भर थे, वे असुर थे और जिन्होंने स्वंय अन्न उत्पादन आरंभ किया, वे सुर थे। 'सू' का अर्थ उत्पादन है। अत:  कृषि के आरंभ से दो विरोधी परंपराएं सामने आती हैं। एक को हम कृषिकर्मी या सुर परंपरा या अग्नि के माध्यम से संसाधन और प्रभाव का विस्तार करने के कारण देव परंपरा कह सकते हैं और दूसरी को प्राकृतिक उत्पादों  पर पूर्ण निर्भरता के कारण असुर परंपरा का कहा जाता है।

आगे वो बताते हैं कि राक्षस (वनसंपदा की रक्षा करने के लिए कटिबद्ध जन) और असुर (कृत्रिम उत्पादन का विरोधी) और दनु या दानव (मिल-बांटकर खाने और उदार भाव से किसी अपरिचित को भी देने वाले), इन कृषिकर्मियों की निंदा इनको देव और ब्राह्मण (दोनों का अर्थ था आग लगाने वाला) कहकर करते थे और अपने प्रयासों में बाधा डालने के कारण ये राक्षसों, असुरों दावनों से घृणा करते थे।

भगवान सिंह ने ही अपनी एक और किताब ‘अपने अपने राम’ में भी इस बात का ज़िक्र करते हुए बताया है कि किस तरह वाल्मीकि जिनके लिए हम पढ़ते हैं कि वह डाकू से ऋषि बने थे, दरअसल वह इसी असुर परंपरा के समर्थक थे और जब वे सुरों या ऋषियों को अपने आश्रम और खेतों के निर्माण के लिए जंगल जलाते हुए देखते हैं तो वह उनका विरोध करते हैं जिसे पुस्तकों में डाकू की तरह प्रस्तुत किया गया। यहां तक कि वो मारीच जो सोने का मृग बना था उसे भी बहुरुपिया जनजाति से संबंधित होना बताया था।

इस बात से ज़ाहिर होता है कि ये लड़ाई जो आज हमारे सामने है वो दरअसल एक अस्तित्व की लड़ाई है। दक्षिण भारतीय सिनेमा में एक फिल्म बनी थी (नाम भूल रहा हूं) जिसमें होली पर एक दिन के लिए दलित को ब्राह्मण मान लिया जाता है। एक दलित इसी त्यौहार के बीच में मर जाता है। अब विवाद इस बात का है कि मरने वाला ब्राह्मण है या दलित। किस तरह उसका संस्कार किया जाए किस तरह उसे सदगति मिले।

पंकज रामेंदु टिप्पणीकार, चर्चित किताब 'दर दर गंगे' के सह-लेखक हैं।

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