नेहा बोरा और अभिजीत दीपके सुर्खियों में हैं. ढाई महीने से वे नई पीढ़ी के आंदोलनकारियों के साथ नायाब तरीकों से सड़क पर हैं. माना जा सकता है कि मुहिम की अघोषित अगुआई ये दोनों नायक ही कर रहे हैं. युवाओं की गूंज इतनी बढ़ गई है कि कुछ विशेषज्ञ मीडिया रिपोर्ट में छात्र आंदोलनों का पिछले सौ साल का इतिहास याद दिलाया जाने लगा है. ये अलग बात है कि उन आंदोलनों का व्यवस्थित विश्लेषण उसी मौके पर कभी नहीं हो पाया. लेकिन प्रबंधन प्रौद्योगिकी के आज के युग में ऐसे आंदोलनों और उनके नेताओं के तथ्यपरक विश्लेषण करने के आसान तरीके उपलब्ध हैं. इस विशेषज्ञ तरीके का अंग्रेजी में नाम है स्वॉट एनालिसिस. इस तरीके में किसी उद्यम या मुहिम या उसके अगुआ व्यक्तियों का तथ्यपरक विश्लेषण किया जाता है. इससे पता चलता है कि उस उद्यम या व्यक्ति की ताकत क्या है, उसकी कमजोरी क्या है, उसके सामने अवसर या मौके क्या हैं और उसके सामने जोखिम क्या हैं.
प्रबंधन प्रौद्यौगिकी में इस वैज्ञानिक तरकीब को अंग्रेजी के चार अक्षरों एस डब्ल्यू ओ टी यानी संक्षेप में स्वॉट (SWOT) एनालिसिस कहते हैं. इस आलेख में नेहा बोरा और अभिजीत के इसी विश्लेषण के जरिए भारत के मौजूदा आंदोलन का आगा-पीछा देखने या दिखाने की कोशिश है.
नेहा और दीपके के बहाने नई पीढ़ी को समझना
जेन ज़ी नाम की इस पीढ़ी का व्यवहार समाज विज्ञानियों के लिए भी एक पहेली बन गया है. दरअसल पीढ़ीगत व्यवहार का व्यवस्थित इतिहास सर्वसुलभ नहीं है. दुनियाभर के समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी और नृतत्वशास्त्री नई पीढ़ियों खासतौर पर जनरेशन ज़ी के विलक्षण व्यवहार को जानने-समझने में लगे हैं. परिस्थितिवश जेन ज़ी के मौजूदा आंदोलन के अगुआ ये दो प्रमुख युवा इस समय दुनियाभर में चर्चित हो उठे हैं. लिहाज़ा नई पीढ़ी के प्रतीक के तौर अभिजीत दीपके और नेहा बोरा की सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक समझ और दूसरी क्षमताओं का आकलन देश दुनिया के राजनीतिक भविष्य के लिए काम का हो सकता है.
Strength: दोनों की ताक़त क्या है
नई पीढ़ी के व्यवहार को देखकर पता चल रहा है कि यह पीढ़ी अपने नेताओं में ज्ञान-विज्ञान की समझ को जरूरी मानती है. वे दिन भी लदते जा रहे हैं कि राजनीति के उद्यम में नैतिकता की बात फिजूल है. इतना ही नहीं, मौजूदा युवा पीढ़ी के लिए नैतिकता महज आदर्श नहीं बल्कि एक आकर्षण बनती जा रही है. उससे भी ज्यादा गौरतलब ये है कि नई पीढ़ी ज्यादा करुणामयी है. अब वह फिल्मी पर्दे पर भी अनैतिक दबंगई और वीभत्स दृश्यों को देखकर रोमांचित नहीं होती बल्कि दुखी और बेचैन हो जाती है. इन पैमानों पर परखा जाए तो सबसे पहले इस बात पर गौर कराया जा सकता है कि नेहा बोरा देश के एक प्रतिष्ठित विश्वाविद्यालय में मेधावी शोधछात्र हैं. उधर अभिजीत दीपके विदेशी विश्वविद्यालय से जनसंपर्क विषय में डिग्रीधारी हैं. दीपके के पास अपने छात्र जीवन के दौरान ही आम आदमी पार्टी के लिए संचार संबधी रणनीतिक उद्यम करने का अनुभव है. यानी दीपके प्रौद्योगिकी पटु युवा हैं. रही बात नैतिक संवेदनाशीलता की तो नेहा बोरा की उच्चशिक्षा कथासाहित्य और रंगकर्म के विषयों में है. नायकत्व के गुणों को शिद्दत से जानने का मौका उन्हें अपनी कोर्स की किताबों में ही मिल चुका है. इन गुणों को नेहा के हाल ही में यानी पांच अक्तूबर को जाधवपुर विवि के मेधावी छात्र समूह के बीच दिए भाषण में देखा जा सकता है.
वहीं दीपके की ताकत का आकलन करें तो आम आदमी पार्टी के लिए राजनीतिक काम करते समय उन्होंने यह जरूर जाना होगा कि देश के आम आदमी के प्रमुख मुददे क्या हैं और जनता के बीच किस किस्म का प्रचार जरूरी है. रही बात राजनीतिक कर्म में करुणा के तत्व की तो इस मामले में नेहा बोरा के पास साहित्यिक ज्ञान और संवेदना होने के कुछ ज्य़ादा प्रमाणपत्र है. भारतीय साहित्यशास्त्र खासतौर पर भारतीय नाट्यशास्त्र के पाठ में शामिल रस-व्यवस्था उनके पाठयक्रम में रही है. पूरी संभावना है कि उन्हें करुण रस का बोध और प्रत्यक्षीकरण हो चुका होगा. उच्चकोटि के अध्ययन का अवसर मिलेने के कारण वो नायकसुलभ तार्किकता में भी पटु हैं. तेजी से बदल रहे राजनीतिक दौर या माहौल में ये ज्ञानार्जित गुण नेहा बोरा की बहुत बड़ी ताकत साबित हो सकती है. उधर दीपके संचार, संप्रेषण और जन संपर्क की आधुनिक प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित हैं.
डिजिटल मीडिया की नई दुनिया में कॉकरोच के नाम से एक सेटायरिकल पेज के जरिए वे नई पीढ़ी के बीच अचानक लोकप्रिय हो उठे थे. भले ही उनकी तरफ से ये सारा कुछ अचानक और परिस्थितिवश हुआ हो लेकिन मीडिया प्रौद्योगिकी का उनका यह हुनर उनकी बहुत बड़ी ताकत साबित हो सकता है. यह आधुनिक विद्या नई प्रकार की राजनीति में एक बड़े सहायक के रूप में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है.
Weakness: दोनों की कमियां क्या हैं
आमतौर पर किसी की कमियां निकालना बड़ा आसान काम है. लेकिन स्वॉट एनालिसिस जैसे उद्देश्यपूर्ण कार्य के लिए किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की कमियों को पहचानना उतना ही कठिन और बड़ा काम माना जाता है. चाहे नेहा हों या अभिजीत दोनों जिस मुकाम पर हैं, उन्हें अपने परिवार और हितैषियों से लगातार अनिमंत्रित सुझाव मिल रहे होंगे. लेकिन अंदेशा है कि लक्ष्य प्रबंधन के लिहाज से उनके पास सुझावों का अभाव होगा. बहरहाल दोनों की कमियों का आकलन करने के पहले इस बात को लेखे में लेना जरूरी है कि दोनों ही युवा नेता औसत आर्थिक पृष्ठभूमि के हैं. हालांकि छात्र जीवन में दोनों को मिले मौकों में बड़ा फर्क है. छात्रजीवन में नेहा बोरा जिस राजनीतिक अभिवावक संगठन के लिए काम करती आई हैं, वह वामपंथी विचारधारा का संगठन है. आजादी के बाद अब तक ऐसे वैचारिक संगठन हमेशा ही संसाधनों के लिए जूझते दिखते रहे हैं. अपनी विचारधारा के कारण वे आर्थिक निर्बल ही रहते हैं. जबकि दुनियाभर में आज की राजनीतिक उद्यमिता खर्चीले प्रबंधन की मांग करती है. लिहाजा नेहा को अपनी इस कमी पर कदम-कदम पर ध्यान देने की जरूरत पड़ेगी. उधर दीपके के पास आम आदमी पार्टी जैसे प्रबंधन पटु राजनीतिक संगठन के लिए काम करने का अनुभव है. बेशक वे अपने प्रौद्योगिकीय कौशल से संसाधन जुटाने का काम आसानी से कर सकते हैं. एक दार्शनिक तथ्य है कि आमतौर पर ऐसे वित्तीय प्रबंधन के कारण नैतिकता से समझौता एक कमी का रूप धारण कर लेती है. लेकिन जेन ज़ी का एक बड़ा वर्ग उनका मुरीद है. गौरतलब यह भी है कि नई पीढ़ी नैतिक मूल्यों के साथ विकसित हो रही है. वह नैतिकता की कीमत पर कामयाबी हासिल करने के पक्ष में नहीं है. किसी भी युवा नेता के लिए इस कमी की भरपाई अपनी पीढ़ी के नैतिक समर्थन से संभव है.

नेहा बोरा वामपंथी छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
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Opportunity: दोनों के पास मौके कितने हैं
दोनों युवा नेता Gen ज़़ी जैसी एक विलक्षण पीढ़ी के उदय काल में उभरे हैं. इस पीढ़ी की विलक्षण प्रवृत्तियों पर शोधपरक अध्ययन शुरू हो चुके हैं. ये पीढ़ी सफलताओं की प्रचलित परिभाषाओं को बदलती हुई नज़र आ रही है. आज की स्थिति यह है कि इन दोनों नेताओं को नई पीढ़ी का अनोखा समर्थन हासिल है. लेकिन स्वॉट एनालिसिस के नजरिए से जरूरत यह देखने की है कि दोनों नेताओं के सामने भविष्य में किस प्रकार के मौके होंगे.
दोनों के लिए अपार अवसर इस कारण से उपलब्ध हैं, क्योंकि न्यायपूर्ण और समावेशी विकास की धारणा से वैश्विक समाज सहमत होता दिखाई दे रहा है. चाहे मन से हो या मजबूरी में हो लेकिन दिखाई देने लगा है कि दुनियाभर की राजसत्ताएं अब जनआकांक्षाओं की अनदेखी नहीं कर पा रही हैं. पूरी दुनिया में नए दौर के नेताओं को न्यायपूर्ण समाज की रचना के तौर तरीके समझने पड़ रहे हैं. इस लिहाज से दोनों नेताओं के पास राजनीतिक उद्यम यानी पॉलिटिकल उद्यम का प्रशिक्षणार्थी बन जाने का बेहद उपयोगी और सुनहरा मौका है. अपनी अब तक की शैक्षणिक उपलब्धियों के कारण वे इस नैतिक उद्यम के लिए योग्य और समर्थ हैं. इस बात पर गौर किया जा सकता है कि पिछले हफ्ते जंतर-मंतर को भेदने की मुहिम में नेहा बोरा ने एक निडर छात्र नेता की छवि बना ली है. पुलिस की हर दबिश का उन्होंने बड़े साहस और हुनर से मुकाबला किया है. उनके मुरीद छात्र और युवा उन्हें देखकर मुदित होने लगे हैं. इस तथ्य के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि इन छात्र नेताओं के पास अपना दायरा बढ़ाने की कितनी ज्यादा गुंजाइश है.

सीजेआई की एक टिप्पणी के बाद अभिजीत दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना की थी.
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Threat: दोनों के जोखिम क्या हैं
कथा साहित्य का यह एक समय सिद्ध सत्य है कि हर नायक खलनायकों के निशाने पर रहता है. दुनिया में कोई भी भूखंड हो, नायक और प्रतिनायक के द्वंद्व से कोई मुक्त नहीं रह पाता. इस द्वंद्व की वर्तमान स्थिति यहां तक है कि दुनिया में जहां एक दलीय राजव्यवस्था भी है, वहां दल के भीतर ही नायक को प्रतिनायकत्व का सामना करना पड़ता है. ऐसे में नेहा बोरा और अभिजीत दीपके के सामने भी हित संघर्ष (Conflict of Interes) वाले प्रतिनायक जरूर आएंगे. इसके अलावा वैचारिक संघर्ष वाले प्रतिद्वंद्वियों से भी उन्हें जूझना पड़ेगा. इस मामले में ये दोनों नेता आसानी से अपवाद नहीं बन सकते. विश्व पटल से लेकर गली मोहल्लों के मंचों पर उभरते हुए नायकों को घेरकर शून्य बना देने की कोशिशें हमेंशा से रही हैं. विद्वान लोग बताते हैं कि ऐसे मुश्किल हालात में नायक वही बना रह सकता है जिसके पास समझ या बुद्धिमत्ता हो, प्रतिबद्ध ईमानदारी यानी निशंक नैतिकता हो और नायकोचित करुणा हो. राजनीतिक चिंतक बता गए हैं कि ये गुण हों तो कोई भी राजनेता बड़े से बड़े जोखिमों से निपट लेता है.
इस पूरे विमर्श में काम की बात ये निकाली जा सकती है कि नए नेताओं को राजनीतिक उद्यमिता के जोखिमों का सम्यक ज्ञान होना चाहिए ताकि अचानक आए संकट उन्हें विचलित न कर सकें.
(डिस्क्लेमर:लेखक ने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक काम किया है. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)