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सुधीर जैन

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    कहीं ले न डूबे अर्थव्यवस्था का 'फीलगुड'

    लेकिन एक वक़्त आता है कि लोग खुद भी बहुत कुछ महसूस करते हैं. लोग जब काम पर जाने के लिए घर से निकलते हैं, तो रास्ते में उनकी नज़र भी देश के माहौल पर पड़ती है. आजकल इक्का-दुक्का बचे ऐसे अख़बारों को भी लोग देख लेते हैं, जो देश के वास्तविक हालात बताने से बाज़ नहीं आते. कुछेक TV चैनल भी माहौलबाजों के झांसे से बचाते रहते हैं. यानी ऐसा नहीं है कि हकीकत देर तक छिपी रह सके - चाहे खुद की हो, चाहे देश की, देरसबेर माली हालत खुद भी बोलने लगती है.

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    शेयर बाज़ार को भी मार डाला 'फील गुड' ने

    अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों के बाद अब निवेश बाज़ार भी बोल गया है. गुरुवार को बाज़ार इतनी जोर से बोला है कि मीडिया तक इसकी आवाज ज़रूर पहुंचनी चाहिए. आवास निर्माण, ऑटो, सूत, चाय जैसे उद्योगों के संगठन भारी बैचेनी में हैं. उनकी सुध लेने के लिए ज़्यादातर अख़बार और टीवी चैनल बिल्कुल तैयार नहीं. ख़बरों के गायब होने से वे बेचारे अपनी बात विज्ञापनों के ज़रिये कहने को मजबूर हो गए हैं...

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    सुधीर जैन का ब्लॉग: बाढ़ से ज्यादा सूखे का भय

    नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 28 जुलाई तक देश में बारिश का आलम यह है कि देश के 53 फीसदी भूभाग पर पानी बहुत कम गिरा है. देश के स्तर पर औसत से 10 फीसदी कम बारिश हो, तो सरकारी मौसम विभाग उसे डैफिशिएंट, यानी जलन्यून वर्षा मानता है. 28 जुलाई तक देश में हुई कुल वर्षा औसत से 13 फीसदी कम है, और अगर संभागीय और उपसंभागीय स्तर पर उतरकर झांकें, तो देश के कुल 36 उपसंभागों में 18 उपसंभाग 19 फीसदी से भी बड़ी जलन्यूनता से जूझ रहे हैं.

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    बजट और दृष्टिपत्र का फर्क...?

    इस बजट ने वाकई चक्कर में डाल दिया. विश्लेषक तैयार थे कि इस दस्तावेज की बारीकियां समझकर सरल भाषा में सबको बताएंगे, लेकिन बजट का रूप आमदनी खर्चे के लेखे-जोखे की बजाय दृष्टिपत्र जैसा दिखाई दिया. यह दस्तावेज इच्छापूर्ण सोच का लंबा-चौड़ा विवरण बनकर रह गया. बेशक बड़े सपनों  का भी अपना महत्व है. आर्थिक मुश्किल के दौर में 'फील गुड' की भी अहमियत होती है, लेकिन बजट में सपनों या बहुत दूर की दृष्टि का तुक बैठता नहीं है. पारंपरिक अर्थों में यह दस्तावेज देश के लिए एक साल की अवधि में आमदनी और खर्चों का लेखा-जोखा भर होता है. हां, इतनी गुंजाइश हमेशा रही है कि इस दस्तावेज में कोई यह भी बताता चले कि अगले साल फलां काम पर इसलिए ज्यादा खर्च किया जा रहा है, क्योंकि ऐसा करना आने वाले सालों में देश के लिए हितकर होगा.

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    इस बजट से पता चलेगी देश की माली हालत, लेकिन पत्रकारों को लेनी पड़ेगी ट्यूशन

    अगले हफ़्ते बजट पेश होगा. फौरन ही उसके विश्लेषण भी होने लगेंगे, लेकिन देश की माली हालत के मद्देनज़र इस साल सरकार के सामने बड़ी-बड़ी चुनौतियां हैं, इसीलिए आसार हैं कि बजट जटिल होगा. विश्लेषकों को इसे समझने में बहुत माथापच्ची करनी पड़ सकती है. बहरहाल, पेश होने से पहले बजट के कुछ नुक्तों की चर्चा.

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    दिल्ली में 50 डिग्री का अलार्म

    10 जून को दिल्ली गर्मी से झुलसने लगी. पारा ज्ञात इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़कर 48 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया. मामला मौसम का है. इस पर किसी का बस नहीं है सो करने के लिए ज्यादा बात बनती नहीं है. एक दो हफ्ते में नहीं तो दो तीन हफ्ते बाद पानी गिरेगा ही. भूल जाएंगे कि इस साल गर्मियों में क्या हुआ था. लेकिन रिकॉर्ड तोड़ तापमान की घटना आगे के लिए दिल्ली को कोई चेतावनी तो नहीं है?

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    एग्जिट पोल की अटकलभर से पूंजी बाजार बमबम...

    एग्जिट पोल में मोदी सरकार की जीत की अटकल लगते ही शेयर बाजार की बांछें खिल गईं. सोमवार को बाजार खुलते ही एक मिनट के भीतर बाजार के सांड ने दौड़ लगा दी.

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    भयावह जलसंकट की आहट

    सब कुछ छोड़ देश चुनाव में लगा रहा. भोजन पानी के इंतजाम से भी ध्यान हट गया. इस बीच पता चल रहा है कि देश में पानी को लेकर इमरजेंसी जैसे हालात बनते जा रहे हैं. सरकारी तौर पर अभी सिर्फ महाराष्ट्र और गुजरात के भयावह हालात की जानकारी है.

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    भला हो, आसनसोल और जगह फैल नहीं पाया

    चौथे दौर के मतदान शुरू होने के फौरन बाद ही यानी कोई दो घंटे बाद ही आसनसोल से खबरें आईं कि वहां एक मतदान केंद्र पर गरमागरमी हो गई है. कुछ टीवी चैनलों पर गरमागरमी के फुटेज दिखाए जरूर गए लेकिन इस फुटेज में ऐसे दृश्य उपलब्ध नहीं थे जो दूसरी जगहों पर भी उत्तेजना पैदा कर सकें.

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    ज्यादा ही बड़ा धमाका हो गया राफेल पर

    राफेल कांड छुपा जा रहा था। कम से कम चुनाव के दौरान इस कांड को लेकर मोदी सरकार निश्चिंत लग लग रही थी। सरकार ने अपने प्रचार तंत्र के जरिए बड़ी जुगत से जनता के बीच यह धारणा बनवा दी थी कि राफेल कांड पर सुप्रीमकोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल चुकी है। हालांकि यह भी एक हकीकत है कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को लेकर तरह तरह की व्याख्याएं चालू थीं।