विज्ञापन
सुधीर जैन

सुधीर जैन

कॉलमिस्ट
सुधीर जैन शुरू में मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर रहे. उन्होंने  सजायाफ्ता कैदियों पर शोध किया. विश्वविद्यालय से निकलकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक सेवाएं दीं. जल प्रबंधन विष...
और पढ़ें
  • img

    जंतर-मंतर के बाद Gen-Z के लिए अब आगे क्या है

    भारत की युवा पीढ़ी ने अपनी लड़ाई लड़ते हुए जंतर-मंतर पर बड़ी जीत हासिल की. इसे जेन-जी का आंदोलन बताया जा रहा है. इस आंदोलन की विशेषताओं के बारे में बता रहे हैं पत्रकार सुधीर जैन.

  • img

    जैन धर्म के 'णमोकार मंत्र' पर ऐतिहासिक विमर्श की तैयारी, क्या एक साथ आ पाएंगे सभी पंथ

    जैन धर्मावलंबियों में इन दिनों एक कोशिश 'णमोकार मंत्र' पर जैन धर्म के सभी मतों को एक मंच पर लाने और इस पर मंत्र पर चर्चा करने के लिए हो रही है. इस पर विस्तार से बता रहे हैं सुधीर जैन.

  • img

    पुरुष प्रधान समाज की परतें उधेड़ता 'सखाराम बाइंडर'

    विजय तेंदुलकर के मशहूर नाटक 'सखाराम बाइंडर' बीते रविवार को नई दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में खेला गया. इसकी समीक्षा कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जैन.

  • img

    कहीं ले न डूबे अर्थव्यवस्था का 'फीलगुड'

    लेकिन एक वक़्त आता है कि लोग खुद भी बहुत कुछ महसूस करते हैं. लोग जब काम पर जाने के लिए घर से निकलते हैं, तो रास्ते में उनकी नज़र भी देश के माहौल पर पड़ती है. आजकल इक्का-दुक्का बचे ऐसे अख़बारों को भी लोग देख लेते हैं, जो देश के वास्तविक हालात बताने से बाज़ नहीं आते. कुछेक TV चैनल भी माहौलबाजों के झांसे से बचाते रहते हैं. यानी ऐसा नहीं है कि हकीकत देर तक छिपी रह सके - चाहे खुद की हो, चाहे देश की, देरसबेर माली हालत खुद भी बोलने लगती है.

  • img

    शेयर बाज़ार को भी मार डाला 'फील गुड' ने

    अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों के बाद अब निवेश बाज़ार भी बोल गया है. गुरुवार को बाज़ार इतनी जोर से बोला है कि मीडिया तक इसकी आवाज ज़रूर पहुंचनी चाहिए. आवास निर्माण, ऑटो, सूत, चाय जैसे उद्योगों के संगठन भारी बैचेनी में हैं. उनकी सुध लेने के लिए ज़्यादातर अख़बार और टीवी चैनल बिल्कुल तैयार नहीं. ख़बरों के गायब होने से वे बेचारे अपनी बात विज्ञापनों के ज़रिये कहने को मजबूर हो गए हैं...

  • img

    सुधीर जैन का ब्लॉग: बाढ़ से ज्यादा सूखे का भय

    नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 28 जुलाई तक देश में बारिश का आलम यह है कि देश के 53 फीसदी भूभाग पर पानी बहुत कम गिरा है. देश के स्तर पर औसत से 10 फीसदी कम बारिश हो, तो सरकारी मौसम विभाग उसे डैफिशिएंट, यानी जलन्यून वर्षा मानता है. 28 जुलाई तक देश में हुई कुल वर्षा औसत से 13 फीसदी कम है, और अगर संभागीय और उपसंभागीय स्तर पर उतरकर झांकें, तो देश के कुल 36 उपसंभागों में 18 उपसंभाग 19 फीसदी से भी बड़ी जलन्यूनता से जूझ रहे हैं.

  • img

    बजट और दृष्टिपत्र का फर्क...?

    इस बजट ने वाकई चक्कर में डाल दिया. विश्लेषक तैयार थे कि इस दस्तावेज की बारीकियां समझकर सरल भाषा में सबको बताएंगे, लेकिन बजट का रूप आमदनी खर्चे के लेखे-जोखे की बजाय दृष्टिपत्र जैसा दिखाई दिया. यह दस्तावेज इच्छापूर्ण सोच का लंबा-चौड़ा विवरण बनकर रह गया. बेशक बड़े सपनों  का भी अपना महत्व है. आर्थिक मुश्किल के दौर में 'फील गुड' की भी अहमियत होती है, लेकिन बजट में सपनों या बहुत दूर की दृष्टि का तुक बैठता नहीं है. पारंपरिक अर्थों में यह दस्तावेज देश के लिए एक साल की अवधि में आमदनी और खर्चों का लेखा-जोखा भर होता है. हां, इतनी गुंजाइश हमेशा रही है कि इस दस्तावेज में कोई यह भी बताता चले कि अगले साल फलां काम पर इसलिए ज्यादा खर्च किया जा रहा है, क्योंकि ऐसा करना आने वाले सालों में देश के लिए हितकर होगा.

  • img

    इस बजट से पता चलेगी देश की माली हालत, लेकिन पत्रकारों को लेनी पड़ेगी ट्यूशन

    अगले हफ़्ते बजट पेश होगा. फौरन ही उसके विश्लेषण भी होने लगेंगे, लेकिन देश की माली हालत के मद्देनज़र इस साल सरकार के सामने बड़ी-बड़ी चुनौतियां हैं, इसीलिए आसार हैं कि बजट जटिल होगा. विश्लेषकों को इसे समझने में बहुत माथापच्ची करनी पड़ सकती है. बहरहाल, पेश होने से पहले बजट के कुछ नुक्तों की चर्चा.

  • img

    दिल्ली में 50 डिग्री का अलार्म

    10 जून को दिल्ली गर्मी से झुलसने लगी. पारा ज्ञात इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़कर 48 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया. मामला मौसम का है. इस पर किसी का बस नहीं है सो करने के लिए ज्यादा बात बनती नहीं है. एक दो हफ्ते में नहीं तो दो तीन हफ्ते बाद पानी गिरेगा ही. भूल जाएंगे कि इस साल गर्मियों में क्या हुआ था. लेकिन रिकॉर्ड तोड़ तापमान की घटना आगे के लिए दिल्ली को कोई चेतावनी तो नहीं है?

  • img

    एग्जिट पोल की अटकलभर से पूंजी बाजार बमबम...

    एग्जिट पोल में मोदी सरकार की जीत की अटकल लगते ही शेयर बाजार की बांछें खिल गईं. सोमवार को बाजार खुलते ही एक मिनट के भीतर बाजार के सांड ने दौड़ लगा दी.

  • img

    भयावह जलसंकट की आहट

    सब कुछ छोड़ देश चुनाव में लगा रहा. भोजन पानी के इंतजाम से भी ध्यान हट गया. इस बीच पता चल रहा है कि देश में पानी को लेकर इमरजेंसी जैसे हालात बनते जा रहे हैं. सरकारी तौर पर अभी सिर्फ महाराष्ट्र और गुजरात के भयावह हालात की जानकारी है.

  • img

    भला हो, आसनसोल और जगह फैल नहीं पाया

    चौथे दौर के मतदान शुरू होने के फौरन बाद ही यानी कोई दो घंटे बाद ही आसनसोल से खबरें आईं कि वहां एक मतदान केंद्र पर गरमागरमी हो गई है. कुछ टीवी चैनलों पर गरमागरमी के फुटेज दिखाए जरूर गए लेकिन इस फुटेज में ऐसे दृश्य उपलब्ध नहीं थे जो दूसरी जगहों पर भी उत्तेजना पैदा कर सकें.

  • img

    ज्यादा ही बड़ा धमाका हो गया राफेल पर

    राफेल कांड छुपा जा रहा था। कम से कम चुनाव के दौरान इस कांड को लेकर मोदी सरकार निश्चिंत लग लग रही थी। सरकार ने अपने प्रचार तंत्र के जरिए बड़ी जुगत से जनता के बीच यह धारणा बनवा दी थी कि राफेल कांड पर सुप्रीमकोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल चुकी है। हालांकि यह भी एक हकीकत है कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को लेकर तरह तरह की व्याख्याएं चालू थीं।

  • img

    न्यूनतम आय योजना कितनी नायाब

    न्यूनतम आय की गारंटी के वायदे ने भारी असर पैदा कर दिया. इसका सबूत यह कि वायदों के बड़े-बड़े खिलाड़ी भौंचक हैं. केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली को जल्दबाजी में इस योजना को ब्लफ, यानी झांसा कहना पड़ा. खैर, यह तो चुनावी माहौल में एक दूसरे की राजनीतिक मारकाट की बात है, लेकिन यह भी हकीकत है कि अपने अनुभवी लोकतंत्र में नागरिक अब जागरूक हो चला है.

  • img

    अब तक कहां छिपे बैठे हैं चुनावी मुद्दे

    अनुमान यह लगता है कि इस बार के चुनाव में किसानों और देश के युवावर्ग के दुख या संकट को कम करने के लिए व्यावहारिक योजना पेश करने की होड़ मचेगी. खासतौर पर मौजूदा सरकार की बेदखली की कोशिश करने वाले विपक्ष के नेताओं में यही होड़ मचेगी कि कौन सबसे ज्यादा विश्वसनीय तरीके से अपनी योजनाएं पेश कर पाता है.

सुधीर जैन

img

सुधीर जैन शुरू में मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर रहे. उन्होंने  सजायाफ्ता कैदियों पर शोध किया. विश्वविद्यालय से निकलकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक सेवाएं दीं. जल प्रबंधन विषय पर सेटर फॉर सांइस एंड एनवायरनमेंट की नेशनल मीडिया फैलोशिप उन्हें दो बार मिली है. उनके लेख एनडीटीवी, न्यूज 18 के अलावा दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.