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सेना के मूवमेंट पर सवाल उठाना गलत या सही, वायरल वीडियो में दिखी लड़की से खफा क्यों हैं लोग

वन्दना यादव
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 24, 2026 17:55 pm IST
    • Published On अगस्त 24, 2026 17:55 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 24, 2026 17:55 pm IST
सेना के मूवमेंट पर सवाल उठाना गलत या सही, वायरल वीडियो में दिखी लड़की से खफा क्यों हैं लोग

अभी हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ.इसमें कुछ लोगों की अगुवाई करती हुई एक महिला पहाड़ों के बीच (संभवत: कश्मीर में) मौजूद है. वह फौजी कॉन्वॉय की मूवमेंट के विरोध में लगभग चीखते हुए अपनी बात कह रही है. इस वीडियो पर ध्यान जाने का कारण महिला की भाषा, उसकी बॉडी लैंग्वेज और उसके आपत्तिनजक शब्द थे. भारतीय सेना के प्रति उसकी अभद्र भाषा के पीछे का कारण जानने का मैंने प्रयास किया. मालूम हुआ कि उस समय रक्षा मंत्री घाटी में पहुंच रहे थे. रक्षा मंत्री की सुरक्षा के लिए और सेना के प्रोटोकॉल के तहत यातायात रोका गया था. इससे पर्यटकों की आवाजाही बाधित हुई. संभव है कि उक्त महिला पर्यटक भी पहाड़ों की सैर के लिए पहुंची थी और उसे भी अन्य सभी के समान आगे जाने से रोक दिया गया था. इस कारण उसे असुविधाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा. 

आज कैसे हैं कश्मीर के हालात

छुट्टियों में आनंद उठाने के मकसद से पहाड़ों में पहुंचे पर्यटकों को असुविधा हुई होगी, इस बात को समझा जा सकता है. मगर यह समझना होगा कि कश्मीर में हालात आज भी सामान्य नहीं हैं अन्यथा वहां से सेना की तैनाती हटा दी जाती. वहां सेना की मूवमेंट के समय आम नागरिकों की आवाजाही पर रोक लगाना,नई बात नहीं है. इसी तरह की मूवमेंट में शायद उक्त महिला भी कुछ समय रूके रहने को बाध्य रही. इस बात से चिढ़कर वह अपना आपा खो बैठी. उसका बोलना अपनी बात कहना नहीं था, बल्कि चिल्ला-चिल्लाकर वह अपने भीतर की भावनाएं अन्य लोगों पर थोप रही थी.परिणाम वही हुआ जो आमतौर पर भीड़ की मनोवृत्ति का होता है.

महिला स्वंय को जेन-जी बताते हुए कहती है,''हमारे टैक्स से इनको (फौजियों को) तनख्वाह मिलती है.'' यह कहते हुए महिला के तेवर देखने लायक थे. अक्सर देखा है कि इस तरह के वीडियो कुछ लोग वायरल होने की गरज से बनाते हैं. मेरा मानना है कि ऐसे लोगों को इग्नोर करना चाहिए. लेकिन यह मसला सेना से जुड़ा है और मैं सेना परिवार का हिस्सा हूं इसीलिए कुछ बातों को रखना आवश्यक है.

उक्त महिला और उनके जैसे अन्य लोग जब कहते हैं, ''हमारे टैक्स से इनको (फौजियों को) तनख्वाह मिलती है.'' कहने वालों को मालूम होना चाहिए केवल आपके टैक्स से फौजियों की तनख्वाह नहीं बनती. हर फौजी भी अपनी तनख्वाह से टैक्स देता है. जिस आवाजाही को रोकने से महिला भड़क गई थी, उसे समझने की जरूरत है कि सेना का मूवमेंट देश की सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक होता है. सुरक्षा देश की आवश्यकता है, इसके साथ कोताही नहीं बरती जा सकती. इसीलिए सेना कब, कहां और किस रूट से जाने वाली है, इसकी जानकारी सबके पास नहीं होती. सेना की मूवमेंट ऑपरेशन के तहत, ऑर्डर का पालन करने के लिए होती है. वह अपने मिशन के लिए शहरी सड़कों पर अथवा प्राकृतिक रूप से सबसे जटिल मार्ग पर भी आवाजाही करते हैं. जबकि पर्यटन मर्जी की चीज है. घूमने के लिए इंसान अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार जाता है. यह महिला वहां खड़े अन्य लोगों (जिनमें पर्यटक भी दिखाई दे रहे हैं) को उकसाते हुए कहती है, ''चलो गाड़ी स्टार्ट करो. सब आगे जाएंगे.'' 

कब हुई थी पुलवामा की घटना

इस बात ने मुझे 14 फरवरी 2019 की याद दिला दी. उस मनहूस दिन पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले में एक कार घुस आई थी. विस्फोटकों से भरी कार ने कॉन्वॉय की एक गाड़ी में टक्कर मार कर विस्फोट कर दिया था. एक झटके में देश ने 40 सैनिक खो दिए थे. वीडियो में दिखाई दे रही महिला हमारे सैनिकों की जान की क़ीमत पर इतनी बड़ा जुआ लगाने के लिए लोगों को उकसा रही थी. उसे अपनी छुट्टियों का आनंद सैनिकों की सुरक्षा से ऊपर लग रहा था. उसकी इस हरक़त पर किसी को भी गुस्सा आ सकता था, लेकिन एक वरिष्ठ सेना अधिकारी और अन्य सैनिक उक्त महिला से बात करने के लिए, उसे समझाने, शांत करने के लिए आगे आते हैं. समझाइश से महिला और भड़क गई और फौजियों को 'यह मामला संसद तक जाएगा' कह कर धमकाती है. अपने-आप को जेन-जी बताने वाली इस महिला के हौसला देखकर अपने देश की स्वाधीनता के दुरुपयोग पर तकलीफ हुई. स्वतंत्र देश के नागरिक के हौसले हमेशा बुलंद होने चाहिए. लेकिन अपनी सुविधा और देश की सुरक्षा के बीच यदि बुलंद हौसले, सुविधा को चुनते हैं तब परेशान होने की बात है. मुझे लगता है कि यह मामला संसद तक जाना भी चाहिए. इससे कुछ जरूरी कार्यवाही हो सकेगी. संभव है कि कश्मीर से सेना हटा दी जाए और शांतिकाल में भी वनवास झेलने को मजबूर सैनिक और उनके परिवारों को एकसाथ रहने का सुख मिल जाए. यदि ऐसा नहीं होता है तब संसद में मामला उठाए जाने पर संभव है कि यह निर्णय लिया जा सके कि अवांछित लोगों को ऐसे सेंसिटिव इलाक़ों में जाना बंद हो. जिन लोगों को ऐसे इलाकों में जाना है, उन्हें परमिट के आधार पर सीमित संख्या में आवाजाही की इजाज़त मिले.

सेना अधिकारी जब यह कहता है कि आप इन सबको भड़का रही हैं, वह महिला और अधिक असंयमित भाषा का प्रयोग करने लगती है. मैं हैरान हूं कि महिला की तमाम बदतमीजी के बावजूद सेना की ओर से ना सिर्फ विनम्रतापूर्वक उसकी बात सुनी जा रही थी, बल्कि उसे समझाने का प्रयास भी किया जा रहा था. सैनिक अपने मिशन पर थे, उनकी जवाबदेही डिपार्टमेंट की ओर थी, मर्जी से घूमने निकले पर्यटकों की ओर नहीं. सेना को डिप्लोमैटिक होने की जरूरत नहीं होती इसके बावजूद सैनिक विनम्र थे लेकिन वह महिला निहायत बदतमीजी से पेश आ रही थी.

पहाड़ों में घूमने जाएं तो किस चीज के लिए तैयार रहें

एक विचार यह भी मेरे जहन में कौंध रहा था कि जिन पहाड़ों में उक्त महिला छुट्टियां बिताने आई थी, जब मजबूरीवश उसे बीच रास्ते में कुछ देर रुकना पड़ा. वह जहां खड़ी थी, वहां से भी पहाड़ों की सुंदरता का आनंद ले सकती थी. हर स्थिति मानसिकता पर निर्भर करती है. जिन नजारों के लिए वह पहाड़ों पर जा रही थी, उन्हीं के बीच कुछ देर रूकना नागवार कैसे हो सकता है?

अब एक बात पर्यटकों से कहना चाहती हूं. घर के सुख-सुविधा से आजिज आ कर आप घूमने, देशाटन के लिए निकलते हैं. ऐसे में रास्ते में यदि किसी असामान्य स्थिति से दो-चार होना पड़े तो उसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. खासतौर पर कश्मीर में, लेह-लद्दाख में और पूर्वोत्तर क्षेत्र में जहां सेना की तैनाती शांति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, ऐसे स्थानों पर जाने से पहले आपको मानसिक रूप से तैयारी करनी होती है. यदि आप ऐसी स्थितियों के लिए तैयार नहीं हैं तब सेंसिटिव क्षेत्रों में घूमने जाने से पहले आपको विचार करना चाहिए. पहलगाम हमले को देश अब तक भूला नहीं है. ईश्वर ऐसा किसी के साथ न करे. कुछ साल पहले ऐसे ही पर्यटक भूस्खलन (लैंड स्लाइड) की चपेट में आ गए थे. रास्ते बंद हो गए थे. पास स्थित सैनिक चौकी ने पर्यटकों को ठिठुरती रात में ना सिर्फ पनाह दी बल्कि अपने अलॉटेड राशन से भोजन भी करवाया. असुविधा दोनों ओर के लोगों को हुई, मगर यह तो मानसिकता की बात है ना यदि आपको थोड़ी भी तकलीफ बर्दाश्त नहीं होती है तब घर से बाहर निकलने से पहले विचार करें. आपके कारण किसी ओर को परेशानी हो, यह नहीं होना चाहिए. याद रखने की बात यह है कि हमारे देश के कुछ हिस्से आज भी सुरक्षित नहीं माने जाते. वहां अमन-चैन के लिए प्रयास करने पड़ रहे हैं. इसमें आम नागरिकों को सहायक बनना होगा.

अधिकार और जिम्मेदारी के बीच कहां खड़ा है नागरिक

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हर बार आवाज़ उठाना जिंदा होने की शर्त नहीं है. संवेदनशील होना, अपने अधिकारों से अधिक अपने कर्तव्यों का बोध होना, जीवित होना है. देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होना आपको जिम्मेदार नागरिक बनाता है. उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह महिला अधिकार और जिम्मेदारी के बीच पसंद चुनने का मामला खड़ा कर रही थी. यह दुखद स्थिती है. शर्म आती है ऐसे तथाकथित पर्यटकों पर जो सिर्फ अपना आराम सोचते हैं. सेंसिटिव इलाके में होने का मतलब नहीं समझते. हर बार अपने अधिकारों का झंडा बुलंद करने वालों को देश की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी का भाव समझना होगा.

कहीं बाढ़ आ जाए तब रेस्क्यू के लिए सबसे पहले फौज पहुंचती है. भयानक उफनती नदी के ऊपर रस्सियों पर लेटकर फौजी अपने शरीर से ह्यूमन ब्रिज बनाते हैं. उनकी पीठ पर चलकर आम लोग अपनी जान बचाते हैं. इस बार ऐसी स्थिती से सामना हो या ऐसी कोई तस्वीर आपके सामने आ जाए तब सोचना कि आखिर फौजी भी तो इंसान होते हैं. वह कौन सी भावना है जो इनसे अपनी जान के ऊपर आम नागरिकों की जान बचाने के लिए प्रयास करवा लेती है.कहीं भूकंप आ जाए या अन्य कोई प्राकृतिक आपदा आ घेरे और तो और बोरवेल में कोई दुर्घटना हो जाए तब भी यही फौजी अपना खून-पसीना बहाकर नागरिकों की रक्षा करते हैं. जब शांतिकाल में सैनिकों के कार्य इतने चुनौतीपूर्ण हैं तब युद्ध की स्थिती की तो कल्पना करना भी आसान नहीं है. ऐसी हर स्थिती में फौजियों के लिए देश दुआएं देता है लेकिन जब फौज के कारण थोड़ी भी असुविधा उठानी पड़ जाए तब उन्हें गाली देने, धमकाने, संसद में मुद्दा उठाने की बात कहकर धमकाते हुए दोबारा सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई.

मुझे उक्त महिला का आचरण अशोभनीय, संस्कारहीन और असंवेदनशील लगा. मगर अब देखती हूं कि उसी महिला का वीडियो फिर से सोशल मीडिया पर घूम रहा है जिसमें वह रोते हुए कह रही है, लोग मुझे नहीं जानते. मैं सड़क पर आवारा घूमने वाले कुत्तों-बिल्लियों की मदद करती हूं. मैं किसी को ऐसा नहीं बोल सकती, जैसा उस दिन बोल रही थी. मुझे लोगों ने प्रवोक किया इसीलिए मैंने ऐसा कहा, आदि आदि.रोते हुए भी महिला जो कह रही है, उससे उसकी भाषा और संवेदनशीलता का पता लगता है. हमारे देश के नागरिकों के मन में सेना के प्रति जो सम्मान का भाव है, उसी के वशीभूत होकर संभव है कि लोगों ने उसे ट्रोल किया. महिला रोते हुए कह रही है, मेरा परिवार, मेरे रिश्तेदार और पड़ोसी भी परेशान हो रहे हैं. मेरा मानना है कि किसी के घर तक धमकाने पहुंच जाना ठीक नहीं है. देश में क़ानून व्यवस्था है. पुलिस तंत्र है. यदि किसी को कोई शिकायत है तो कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करनी चाहिए. सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने से भी लोग चूके नहीं हैं फिर किसी के घर पहुंच जाना किसी भी तरह व्यवहारिक नहीं है.महिला का व्यवहार अनुचित था लेकिन उसे प्रताड़ित करने, धमकाने उसके घर तक पहुंच जाना भी गलत कदम है. उम्मीद है कि देश के रखवालों के प्रति सोचते हुए लोग अधिक संवेदनशील रहेंगे. स्मरण रहे कि हमारे घरों में होली, दीवाली, ईद और क्रिसमस इसलिए खुशियों का पैग़ाम लेकर आती है क्योंकि कोई है जो त्योहार पर भी अपने घर नहीं आया. कोई है जो ठिठुरती रातों में घुटनों तक बर्फ में खड़ा, देश की सीमा की सुरक्षा के लिए जाग रहा है. कितनी ही महिलाओ की करवाचौथ पति के बिना गुजर जाती है. कितने रक्षाबंधन भाई की कलाई पर राखी बांधने के इंतज़ार में बीतते हैं. सीमाओ पर डटे फौजी भी बहन की राखी के बिना सूनी कलाई लिए, पत्नी, बच्चों और माता-पिता की याद में बिता देते हैं. आम नागरिकों से वह सिर्फ सम्मान चाहते हैं. आप यही उन्हें दे सकते हैं.

(डिस्क्लेमर: लेखिका साहित्यकार, मोटिवेशनल स्पीकर और समाजसेवी हैं. उनके अब तक तीन उपन्यास समेत 25 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. लेखन और साहित्य में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया, मराठी, हरियाणवी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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