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अगर अमेरिका-इजरायल और ईरान का युद्ध नहीं रुका तो क्या होगा, भारत की अर्थव्यवस्था का क्या होगा

समीर शेखर और नरगिस मोहापात्रा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 12, 2026 16:51 pm IST
    • Published On मार्च 12, 2026 16:37 pm IST
    • Last Updated On मार्च 12, 2026 16:51 pm IST
अगर अमेरिका-इजरायल और ईरान का युद्ध नहीं रुका तो क्या होगा, भारत की अर्थव्यवस्था का क्या होगा

पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती है. यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का प्रश्न नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार, वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों, वित्तीय बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तंत्र पर भी व्यापक रूप से पड़ रहा है. इस संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बढ़ोतरी और समुद्री व्यापार मार्गों पर अनिश्चितता ने विश्व बाजार को झकझोर दिया है. उदाहरण के लिए कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं, कुछ विश्लेषक इसे 185 डॉलर तक जाने की आशंका भी जता रहे हैं. भारत अपनी कुल तेल जरूरत का 80 फीसदी से अधिक आयात करता है. इसलिए कीमतों में हर वृद्धि हमारे आयात बिल को बढ़ाएगी. अगर कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होती है, तो भारत का आयात बिल 12–13 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. इससे चालू खाते का घाटा और व्यापार असंतुलन भी बढ़ सकता है. 

भारत जैसे ऊर्जा-आयात पर निर्भर और निर्यात-उन्मुख उभरते हुए आर्थिक शक्ति के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात, समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भर है. भारत जैसे ऊर्जा-आयात पर निर्भर और निर्यात-उन्मुख अर्थतंत्र के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है. पश्चिम एशिया केवल भारत का ऊर्जा स्रोत ही नहीं है, बल्कि वह भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक साझेदारी, प्रवासी भारतीयों की आय, व्यापार, निवेश प्रवाह और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसलिए यदि इस क्षेत्र में व्यापक सैन्य संघर्ष होता है, तो उसके आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भारत के वैश्विक व्यापार तंत्र पर गहरे, बहुआयामी और दीर्घकालिक हो सकते हैं.

पश्चिम एशिया इतना महत्वपूर्ण क्यों है 

पश्चिम एशिया लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय शक्ति-राजनीति का केंद्र रहा है. इस क्षेत्र में ऊर्जा संसाधनों की प्रचुरता, सामरिक समुद्री मार्गों का नियंत्रण और धार्मिक-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इसे वैश्विक राजनीति का एक संवेदनशील क्षेत्र बनाती है. इजरायल और ईरान के बीच वैचारिक, सामरिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लंबे समय से चली आ रही है. ईरान का परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव इजरायल के लिए सुरक्षा चिंता का विषय रहा है, जबकि अमेरिका पारंपरिक रूप से इजरायल का प्रमुख रणनीतिक सहयोगी रहा है. इन परिस्थितियों में यदि अमेरिका सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से इस संघर्ष में शामिल होता है, तो यह संकट एक क्षेत्रीय युद्ध से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले सकता है.

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भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे संवेदनशील पहलू ऊर्जा आयात है. भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का 80 फीसद से अधिक कच्चे तेल आयात से पूरा करता है. पश्चिम एशिया से आने वाला तेल भारत की ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख आधार है. इस आपूर्ति का बड़ा भाग होरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. यदि ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष के कारण इस समुद्री मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है, तो इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं, हालांकि भारत ने इस समस्या को सुलझा लिया है. वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत के व्यापार संतुलन पर पड़ता है. तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ता है. इससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है. हाल ही में बढ़ते तनाव के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है. इसके चलते भारत की तेल कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट आई. यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो परिणामस्वरूप आयात बिल में तेज वृद्धि, मुद्रास्फीति में उछाल, परिवहन और उत्पादन लागत में वृद्धि और औद्योगिक उत्पादन पर दबाव जैसी भयावह आर्थिक-व्यापारिक संकट पैदा हो सकता है. इस प्रकार ऊर्जा संकट भारत के वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित कर सकता है.

समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट

पश्चिम एशिया का संघर्ष केवल ऊर्जा आपूर्ति तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक समुद्री व्यापार के प्रमुख मार्गों को भी प्रभावित करता है. भारत का लगभग 95 फीसद अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्गों से होता है. ऐसे समय में, जब भारत अपने निर्यात को 900 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखता है, यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है. इसलिए समुद्री सुरक्षा भारत के व्यापारिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. भारत का यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के साथ होने वाला बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों पर निर्भर है. बाब-अल-मंदेब और होरमुज़ जैसे समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए 'चोक-पॉइंट' माने जाते हैं. पश्चिम एशिया में स्थित हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वैश्विक तेल व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है.इसके जरिए दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल परिवहन होता है. यदि इस मार्ग में व्यवधान आता है तो इसका महत्वपूर्ण प्रभाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर पड़ सकता है.

भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के कारण तेल आपूर्ति के साथ-साथ अन्य व्यापारिक वस्तुओं की आवाजाही भी प्रभावित होती है. यह निश्चित तौर पर भारत के व्यापार तंत्र पर भी गहरा असर डालेगा. अगर इन मार्गों पर युद्ध या सुरक्षा संकट उत्पन्न होता है तो जहाजों को लंबा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ सकता है, इससे परिवहन समय और लागत दोनों बढ़ जाएगा.ऐसे में माल ढुलाई की लागत में वृद्धि, जहाजों के बीमा प्रीमियम में वृद्धि, परिवहन समय में देरी और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में बाधा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. हाल में देखा गया है कि समुद्री मार्गों में अस्थिरता के कारण जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते से जाना पड़ रहा है. इससे करीब 20-25 दिनों की अतिरिक्त देरी हो रही है और परिवहन लागत बढ़ रही है. इससे भी बीमा प्रीमियम बढ़ जाता है और माल ढुलाई महंगी हो जाती है. इन परिस्थितियों में भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ सकती है.

भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व क्या है

पश्चिम एशिया भारत के लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार भी है. भारत का इजरायल और ईरान दोनों देशों के साथ व्यापार अलग-अलग स्तर पर है. दोनों की संरचना भी अलग है. भारत से ईरान और इजरायल को कृषि उत्पाद,मशीनरी,रसायन, दवाइयां और खाद्य पदार्थों का निर्यात होता है. भारत और इजरायल  के बीच द्विपक्षीय व्यापार 3.7–3.9 अरब डॉलर के आसपास है. इसमें भारत का निर्यात लगभग 2.1 अरब डॉलर और आयात लगभग 1.6 अरब डॉलर है. वहीं भारत और ईरान के बीच व्यापार हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण काफी घट गया है. वर्तमान में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 1.6–1.8 अरब डॉलर के आसपास है. युद्ध की स्थिति में भारत के कई प्रमुख आर्थिक क्षेत्र को व्यापारिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जैसे कृषि निर्यात जिसके तहत बासमती चावल, चाय, फल और दाल जैसे उत्पादों का बड़ा बाजार पश्चिम एशिया में है.

इसके अतिरिक्त युद्ध का प्रभाव भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. युद्ध के कारण मांग घटने या भुगतान प्रणाली में बाधा आने से निर्यातकों को नुकसान हो सकता है. तेल की कीमतों में वृद्धि और वैश्विक अनिश्चितता के कारण शेयर बाजार में गिरावट देखी गई. इससे निवेशकों ने जोखिम से बचने के लिए पूंजी निकालना शुरू कर दिया. हाल की घटनाओं में भारतीय शेयर सूचकांक भी गिरावट के दबाव में रहे, जबकि तेल कंपनियों के शेयरों में अस्थिरता देखी गई. यही नहीं भारत के वस्त्र उद्योग की बात करें तो  पॉलीएस्टर फाइबर और अन्य कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि पहले ही देखी जा चुकी है. इससे भारत के वस्त्र उद्योग की लागत बढ़ सकती है और निर्यात में गिरावट आ सकती है.

विश्व-पटल पर एक प्रभावशाली अर्थव्यवस्था और निर्यातक के रूप में पहचान दिलाने में रासायनिक और पेट्रोकेमिकल उद्योग की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है. अप्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो कई रासायनिक उत्पाद कच्चे तेल के उप-उत्पादों पर आधारित होते हैं. तेल महंगा होने से इन उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है. हाल के वर्षों में लॉजिस्टिक्स और वस्तुओं का स्थानांतरण की प्रक्रिया और उसकी लागत से अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की वस्तुओं का मूल्य और मांग काफी हद तक प्रभावित होते हैं. युद्ध के परिणामस्वरूप उच्च बीमा लागत, मार्ग परिवर्तन और सुरक्षा जोखिम आदि जैसी अवस्थाएं निश्चित रूप से व्यापारिक गतिविधियों को धीमा कर सकती हैं. इस युद्ध का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और 'स्टैगफ्लेशन' अर्थात् धीमी आर्थिक वृद्धि और उच्च मुद्रास्फीति का खतरा भी बढ़ रहा है. तेल कीमतों में तेजी से वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ती है. इससे वैश्विक व्यापार मंद पड़ सकता है. यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है तो भारत के निर्यात पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारत के कई प्रमुख निर्यात बाजार यूरोप और अमेरिका में हैं.

भारत की विदेश नीति और रणनीतिक संतुलन

भारत की विदेश नीति लंबे समय से पश्चिम एशिया में संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है. इसी सिद्धांत के तहत भारत ने एक ओर इजरायल  के साथ रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत किया है तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं को भी आगे बढ़ाया है. ईरान के चाबहार पोर्ट परियोजना भारत की 'कनेक्टिविटी कूटनीति' का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है. इससे क्षेत्रीय व्यापार और रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा मिलता है. यदि संघर्ष बढ़ता है तो यह परियोजना भी प्रभावित हो सकती है. भारत को इस संकट में तीन प्रकार की कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, इनमें ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना, दोनों पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना. इसलिए भारत की विदेश नीति को अत्यंत सावधानी और संतुलन के साथ आगे बढ़ना होगा.

इस संकट के बीच भारत के लिए कुछ अवसर भी मौजूद हैं. भारत ने पिछले कुछ सालों में तेल आयात के स्रोतों का विविधीकरण किया है. रूस जैसे देशों से रियायती दरों पर तेल खरीदकर कुछ हद तक दबाव कम किया है. इसके अलावा भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी मौजूद हैं जो अल्पकालिक संकट से निपटने में मदद कर सकते हैं. इसके बाद भी दीर्घकालिक समाधान के लिए भारत को ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और वैकल्पिक व्यापार मार्ग विकसित करने की आवश्यकता है. 

क्या 1970 जैसा तेल संकट आ सकता है

इस संघर्ष के भविष्य को तीन संभावित परिदृश्यों में समझा जा सकता है. एक तो यह कि अगर यदि युद्ध सीमित स्तर पर ही रहता है और समुद्री मार्ग खुले रहते हैं, तो आर्थिक प्रभाव अस्थायी होंगे. दूसरा यह कि यदि संघर्ष में खाड़ी देशों की भागीदारी बढ़ती है, तो तेल आपूर्ति और व्यापार मार्गों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है. तीसरा वैश्विक आर्थिक संकट जैसी परिस्थिति पैदा होने की तरफ इशारा है, यदि तेल कीमतें अत्यधिक बढ़ती हैं और वैश्विक व्यापार बाधित होता है, तो यह 1970 के दशक के तेल संकट जैसी स्थिति पैदा कर सकता है.

अमेरिका, इजरायल  और ईरान के बीच उभरता संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय सैन्य टकराव नहीं है; यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी गंभीर चुनौती है.  भारत जैसे उभरते आर्थिक शक्ति के लिए यह संकट ऊर्जा सुरक्षा,समुद्री व्यापार मार्गों, निर्यात बाजार और आर्थिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव डाल सकता है. फिर भी यह संकट भारत के लिए आत्मनिर्भरता, ऊर्जा विविधीकरण और रणनीतिक कूटनीति को मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करता है. यदि भारत दूरदर्शी आर्थिक नीति, संतुलित विदेश नीति और मजबूत समुद्री सुरक्षा रणनीति अपनाता है, तो वह न केवल इस संकट के प्रभावों को कम कर सकता है, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अपनी भूमिका को और अधिक सुदृढ़ भी बना सकता है. अंततः वैश्विक राजनीति में बदलते शक्ति संतुलन के बीच भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक लचीलापन, रणनीतिक दूरदर्शिता और बहुपक्षीय कूटनीति में निहित होगी. यदि भारत इन तीनों को संतुलित रूप से आगे बढ़ाता है, तो वह न केवल इस संकट से उबर सकेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अपनी भूमिका को और अधिक सुदृढ़ भी कर सकेगा. 

(समीर शेखर ओडिशा के भुवनेश्वर के कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं विपणन पढ़ाते हैं.नरगिस मोहापात्रा उसी संस्थान के शोध छात्रा हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं,उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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