आतंकवाद के संदर्भ में मुंबई की तुलना तेल अवीव से करना कुछ लोगों को अजीब लग सकता है. याद दिला दूं कि तेल अवीव वाली घटना इजरायल पर हुआ सबसे बड़ा आतंकी हमला था. हवा, समुद्र और जमीन, सभी मोर्चों से अटैक किया गया था. इजरायल में इमारतों को निशाना बनाने के लिए 5,000 से अधिक रॉकेट दागे गए थे और आतंकवादियों ने पैराग्लाइडर के जरिए सार्वजनिक स्थानों पर उतरकर लोगों का नरसंहार किया था. सैकड़ों इजरायली नागरिकों को बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया गया था. हालांकि मुंबई भी भारत के सबसे बड़े आतंकी हमलों का सामना कर चुकी है, लेकिन उनमें से कोई भी इस स्तर और पैमाने का नहीं था.
11 मार्च 1993 से 11 जुलाई 2011 के बीच मुंबई 10 से अधिक आतंकी घटनाओं का सामना कर चुकी है, जिनमें लगभग 700 लोगों की मौत हुई और 2,000 से अधिक लोग घायल हुए. 26 नवंबर 2008 का हमला मुंबई पर हुआ आखिरी बड़ा आतंकी हमला था. यह मृतकों की संख्या के कारण नहीं, बल्कि कई स्थानों को एक साथ निशाना बनाए जाने और लंबे समय तक चले ऑपरेशन के कारण सबसे अलग था. इजरायल पर हुए हमले और मुंबई पर हुए हमले के बीच कुछ समानताएं भी दिखाई देती हैं.

26/11 Mumbai Attack 2008
14 सितंबर 1946 को कलबादेवी में हुए आतंकी हमले के बाद यह पहला ऐसा हमला था, जिसमें हथियारबंद हमलावर सार्वजनिक स्थानों पर उतरे और अंधाधुंध गोलीबारी की.
ताज महल होटल, ट्राइडेंट होटल और नरीमन हाउस में बंधक जैसी स्थिति बन गई थी. ट्राइडेंट और नरीमन हाउस में अधिकांश बंधकों की मौत हो गई थी. सभी स्थानों को आतंकवादियों से मुक्त कराने में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) को 59 घंटे लगे थे. इस अभियान के दौरान एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड के प्रमुख, दो कमांडो और कई पुलिसकर्मी शहीद हुए थे.

निस्संदेह वह युद्ध जैसी स्थिति थी और न तो खुफिया एजेंसियां और न ही मुंबई पुलिस उस स्तर के हमले की कल्पना कर पाई थी. लेकिन आज चिंता इस बात की है कि क्या सुरक्षा तंत्र एक और 26/11 जैसे हमले या इजरायल पर हमास द्वारा किए गए उससे कहीं बड़े हमले का सामना करने के लिए तैयार है? मैंने इन हमलों को जमीनी स्तर पर कवर किया है और उनके बाद की परिस्थितियों को भी करीब से देखा है. पिछले 15 वर्षों में मैंने कई बार मुंबई की आतंकवादी हमलों के प्रति संवेदनशीलता पर रिपोर्टिंग की है.
कुछ वर्ष पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने मुंबई की तटीय सुरक्षा पर एक बेहद कड़ी रिपोर्ट प्रकाशित की थी. 26/11 के बाद तत्काल प्रतिक्रिया के रूप में राज्य सरकार ने तटीय सुरक्षा के लिए स्पीड बोट, जेट स्की और उभयचर वाहनों की खरीद पर करोड़ों रुपये खर्च किए. लेकिन कुछ ही वर्षों में रखरखाव की कमी और खराब पुर्जों के विकल्प उपलब्ध नहीं होने के कारण इनमें से अधिकांश उपकरण अनुपयोगी हो गए. डीजल की पर्याप्त उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या थी.
हालांकि आतंकवादी खतरे को देखते हुए गेटवे ऑफ इंडिया पर शाम के समय होने वाली बोट पार्टियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया. आज अधिकांश रेलवे स्टेशनों पर सामान की जांच के लिए डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर और एक्स-रे मशीनें लगी हुई हैं, लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी मौजूद नहीं हैं.
एक सकारात्मक बदलाव जरूर दिखाई देता है कि अब मुंबई में तीन प्रकार की कमांडो इकाइयां तैनात हैं. पहली मुंबई पुलिस की क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT), दूसरी राज्य पुलिस की फोर्स वन और तीसरी राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG), जिसने मुंबई में अपना क्षेत्रीय मुख्यालय भी स्थापित किया है.
स्वाभाविक रूप से सुरक्षा व्यवस्थाओं की सारी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती. फिर भी मुझे उम्मीद है कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने अतीत से सबक लिया होगा और मुंबई को बुरी नजरों तथा संभावित आतंकवादी खतरों से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त तैयारी की होगी.
(जीतेंद्र दीक्षित पत्रकार तथा लेखक हैं...)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.