गणेश पूजा का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में महाराष्ट्र आता है. बड़े पंडाल, ढोल-ताशे, गलियों में उमड़ती भीड़, गणेश चतुर्थी वहां किसी त्योहार से बढ़कर एक सामाजिक उत्सव बन चुकी है. लेकिन गणेश जी सिर्फ महाराष्ट्र के नहीं हैं. ओडिशा में भी उनकी बहुत पुरानी परंपरा चली आ रही है, बस यहां का ढंग अलग है. गांवों में, पहाड़ियों पर, छोटे-पुराने मंदिरों में गणेश जी के ऐसे अनेक रूप मिलते हैं, जिनकी चर्चा बाकी देश में कम ही होती है. कहीं वे श्रीजगन्नाथ परंपरा का अंग हैं, कहीं तंत्र साधना में सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता हैं, कहीं किसी मंदिर के पार्श्वदेवता बनकर बैठे हैं, तो कहीं अपनी स्त्री-शक्ति विनायकी के रूप में.
श्रीजगन्नाथ मंदिर और गणेश जी
श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा में गणेश जी की जड़ें काफी गहरी हैं. जगन्नाथ जी को सिर्फ वैष्णव देवता मान लेना यहां की पूरी कहानी नहीं बताता. श्रीमंदिर की पूजा-पद्धति में शैव, शाक्त, वैष्णव और तांत्रिक, सभी धाराएं आपस में घुली-मिली हैं और इसी व्यापक तस्वीर में गणेश जी की जगह भी बनती है.
स्नान पूर्णिमा के दिन जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और देवी सुभद्रा को 108 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है. स्नान के बाद परंपरा के मुताबिक़, जगन्नाथ जी खदिर गणेश बनते हैं, बलभद्र जी हरिद्रा गणेश और देवी सुभद्रा मातंगी रूप में स्नानवेदी पर विराजती हैं. इन तीनों रूपों के पीछे गणेश जी की तांत्रिक शक्ति मानी जाती है. इसी दर्शन को लोग गजानन वेश या हाथी वेश भी कहते हैं.
इस पूरी परंपरा की असली बात यह है कि यहां गणेश जी को सिर्फ एक देवता की तरह नहीं देखा जाता. उनके साथ ज्ञान, शक्ति, साधना और मंगल, ये सारी धाराएं जुड़ी हुई हैं. जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के इन रूपों में भक्तों को गणेश तत्व का एक बिलकुल अलग अनुभव होता है.

चौसठ योनिनी मंदिर में गणेश जी
विनायकी या गणेशी
ओडिशा की एक और ख़ास बात है विनायकी या गणेशी की पूजा. विनायकी को गणेश जी की स्त्री-शक्ति माना जाता है, और यह इस बात की मिसाल है कि भारतीय परंपरा में देवता की शक्ति सिर्फ़ पुरुष रूप तक बंधी नहीं रहती. हर देवता की अपनी शक्ति होती है, और वह शक्ति कई बार स्त्री रूप में भी सामने आती है.
भुवनेश्वर के हीरापुर में चौंसठ योगिनी मंदिर में विनायकी की मूर्ति स्थापित है. बलांगीर के रानीपुर-झरियाल चौंसठ योगिनी मंदिर में भी यही परंपरा दिखती है. ये दोनों मंदिर वैसे भी तंत्र साधना और शक्ति उपासना के पुराने केंद्र माने जाते हैं, तो वहां विनायकी की मौजूदगी गणेश जी की उस शक्ति को दिखाती है, जो तंत्र और देवी उपासना से जुड़ती है.
भुवनेश्वर वाली विनायकी की मूर्ति देखकर अंदाज़ा लगता है कि ओडिशा की कला और धार्मिक सोच कितनी व्यापक रही होगी. यहां गणेश जी को सिर्फ़ हाथी के सिर वाला देवता मानकर नहीं छोड़ा गया, बल्कि एक ऐसी शक्ति के रूप में भी देखा गया, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों तत्व समाए हुए हैं. देश के बाकी हिस्सों में गणेश पूजा मुख्यतः पुरुष रूप की होती है. ओडिशा में उनकी स्त्री-शक्ति के लिए भी मंदिर और मूर्ति-परंपरा मौजूद है, और यही बात इसे बाक़ी जगहों से अलग बनाती है.
तंत्र साधना में गणेश जी की जगह
ओडिशा तांत्रिक साधना के लिए शुरू से ही जाना जाता रहा है. यहां देवी मंदिरों, योगिनी पीठों और शक्ति उपासना केंद्रों की कोई कमी नहीं है. इन सारी परंपराओं में गणेश जी को एक ख़ास दर्जा मिला है. हर साधना की शुरुआत में उन्हीं को याद किया जाता है.
कोई भी तांत्रिक अनुष्ठान शुरू होने से पहले गणेश जी का स्मरण होता है. साधना में आने वाली बाधाएं दूर करने और अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए उनका आवाहन किया जाता है. इसीलिए तंत्र परंपरा में भी उन्हें अग्रपूज्य माना गया है.
पुरी जिले के चौरासी में मां वाराही का प्राचीन मंदिर है, और वहां गणेश जी पार्श्वदेवता के रूप में विराजमान हैं. चौरासी का यह मंदिर प्राची घाटी के प्रमुख शाक्त और तांत्रिक केंद्रों में गिना जाता है. इसकी स्थापत्य शैली और पूजा-पद्धति में ओडिशा की पुरानी तांत्रिक परंपरा की झलक साफ दिखती है.
वाराही माता के मंदिर में गणेश जी का पार्श्वदेवता के रूप में होना कोई मामूली बात नहीं है. यह बताता है कि पुराने समय में मंदिर बनाते वक़्त गणेश जी को मंदिर की रक्षा करने वाला और साधना का आरंभिक देवता माना जाता था. वे मुख्य देवी के साथ रहकर पूरे क्षेत्र की ऊर्जा को संतुलित करते हैं.

वाराही मंदिर में पार्श्व देवता के रूप में गणेश जी
चंडीखोल का महाविनायक मंदिर
ओडिशा में गणेश पूजा का एक और अहम केंद्र है जाजपुर जिले के चंडीखोल में स्थित महाविनायक मंदिर. यह मंदिर गणेश जी को समर्पित है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां एक साथ पांच देवताओं की पूजा होती है. इसी के साथ मान्यता है कि यहीं गणेश जी का कटा हुआ मस्तक आकर गिरा था. इसी वजह से महाविनायक मंदिर को गणेश उपासना का एक बेहद पवित्र स्थान माना जाता है.
इसी के साथ एक ही गर्भगृह में शिव, विष्णु, दुर्गा, सूर्य और गणेश, इन सबकी पूजा एक संयुक्त देवशक्ति के रूप में होती है. इसीलिए यह मंदिर सिर्फ गणेश मंदिर नहीं रह जाता, बल्कि पंचदेवता उपासना का एक अनोखा केंद्र बन जाता है.
यह परंपरा ओडिशा की धार्मिक सोच को समझने में मदद करती है. यहां भिन्न देवताओं को अलग करके नहीं देखा गया, बल्कि सबको एक ही परम शक्ति के अलग रूप माना गया. शिव में शक्ति, विष्णु में पालन, दुर्गा में सामर्थ्य, सूर्य में प्रकाश और गणेश में बुद्धि और मंगल का भाव देखा गया.
महाविनायक मंदिर से रति और कामदेव की एक कथा भी जुड़ी है. कहते हैं कि शिव जी के श्राप से जब कामदेव संकट में पड़े, तो उनकी पत्नी रति ने उन्हें छुड़ाने के लिए गणेश जी की आराधना की. पूजा के वक्त पांच हाथ एक साथ रति की तरफ बढ़े, मानो उनका चढ़ाया प्रसाद लेना चाहते हों. रति उलझन में पड़ गईं, समझ नहीं पाईं कि किसे प्रसाद दें. तब ब्रह्मा जी ने बताया कि पांचों देवता उनकी भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि एक साथ प्रसाद ग्रहण करना चाहते हैं.
ये पांच देवता थे गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और दुर्गा. इसके बाद कामदेव श्राप से मुक्त हुए. स्थानीय मान्यता के मुताबिक़, उसी वक़्त धरती से एक बड़ा पत्थर प्रकट हुआ, जिसमें इन पांचों देवताओं की शक्ति समाई हुई थी. इसीलिए इस जगह का नाम पड़ा महाविनायक.
श्रीजगन्नाथ मंदिर में उनका तांत्रिक रूप, चौंसठ योगिनी मंदिरों में विनायकी का स्वरूप, चौरासी के वाराही मंदिर में पार्श्वदेवता की उपस्थिति और चंडीखोल के महाविनायक मंदिर में पंचदेवता के रूप में पूजा, इन सबको साथ रखकर देखें तो गणेश जी की एक बहुत बड़ी तस्वीर उभरती है.
यहां गणेश जी सिर्फ गणेश चतुर्थी के भगवान नहीं हैं. वे मंदिरों की मूर्तियों में हैं, तंत्र साधना में हैं, शक्ति उपासना में हैं, लोककथाओं में हैं और श्रीजगन्नाथ की संस्कृति में भी पूरी तरह रचे-बसे हैं.
(डिस्क्लेमर: रितेश पृषेठ पत्रकार हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)