दीवाली रोशनी, उल्लास और उम्मीदों का पर्व है, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के लिए यह त्योहार हर साल सांसों पर भारी पड़ते स्मॉग और दमघोंटू आबोहवा की चिंता लेकर आता है. इस बार भी दीवाली से ठीक पहले दिल्ली-एनसीआर की हवा जहरीली हो चुकी है, जिसे देखते हुए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू कर दिया गया है. Urban Climate शोध पत्रिका में प्रकाशित एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, दिल्ली का यह दमघोंटू माहौल और बढ़ती तपिश शहर के अंदर 'हरियाली के बिखराव' और कंक्रीट के अनियोजित विस्तार से भी जुड़ी हुई है.
पेड़ हैं, फिर भी तप रही दिल्ली, हरियाली का बिखराव कितना जिम्मेदार?
“Role of urban green space structure and configuration in regulating land surface temperature in NCT Delhi using explainable artificial intelligence” शीर्षक वाला यह शोधपत्र फरवरी 2026 में Urban Climate शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. इसके लेखक डॉ. मनीष कुमार, डॉ. सौरव भड़वाल और डॉ. नेत्रानंद साहू हैं. इसमें 1991 से 2021 के बीच दिल्ली के हरित क्षेत्रों में आए बदलावों और जमीन की सतह के तापमान से उनके संबंध का अध्ययन किया गया है.
शोधकर्ताओं ने 1991, 2001, 2011 और 2021 के उपग्रह चित्रों का विश्लेषण किया. सभी चित्र मार्च और अप्रैल के थे. इस अवधि को चुनने का उद्देश्य अलग-अलग वर्षों में मानसून से पहले के मौसम के दौरान हरियाली और सतह के तापमान की तुलना करना था.

अध्ययन के मुताबिक, उपग्रह चित्रों में दर्ज अधिकतम सतही तापमान 1991 में 30 डिग्री सेल्सियस था, जो 2021 में बढ़कर 35.14 डिग्री हो गया. कंक्रीट वाले इलाकों और शहर के औसत सतही तापमान के बीच का अंतर भी करीब 1.3 डिग्री से बढ़कर 2.1 डिग्री हो गया.
अध्ययन में हरियाली की मात्रा के साथ उसके फैलाव और आपसी जुड़ाव को भी महत्वपूर्ण पाया गया. जिन इलाकों में हरियाली ज्यादा बिखरी हुई थी, वहां सतही तापमान अधिक रहा. इसके विपरीत, बड़े और आपस में जुड़े हरित क्षेत्रों में तापमान कम पाया गया.
कहां ज्यादा गर्मी, कहां मिल रही है ठंडक
शाहदरा, सीलमपुर, नरेला, बवाना और रोहिणी एक्सटेंशन में हरियाली ज्यादा बिखरी हुई मिली. इन इलाकों में जमीन की सतह का तापमान भी अधिक पाया गया. दूसरी तरफ, मध्य और दक्षिण दिल्ली के जुड़े हुए हरित क्षेत्रों में सतही तापमान कम रहा. शोधपत्र का मुख्य निष्कर्ष है कि हरियाली के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने से उसकी ठंडक पहुंचाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. बड़े और आपस में जुड़े हरित क्षेत्र पेड़ों की छाया और पत्तियों से निकलने वाली नमी के जरिए आसपास के तापमान को कम रखने में मदद करते हैं.
शोध में मध्य और दक्षिण दिल्ली के हरित क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ाने और हरित गलियारों को विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया गया है. इसी तरह शाहदरा, सीलमपुर, नरेला और बवाना जैसे इलाकों में हरियाली के बिखराव को कम करने के उपायों पर ध्यान देने की जरूरत बताई गई है.
सुझावों को जमीन पर उतारने की चुनौती
अध्ययन में शामिल डॉ. मनीष कुमार और डॉ. सौरव भड़वाल हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़ के भूगोल विभाग से जुड़े हैं. डॉ. सौरव भड़वाल का कहना है, "दिल्ली को ज्यादा पेड़ों के साथ सही जगह पर और आपस में जुड़ी हरियाली की जरूरत है. शाहदरा, सीलमपुर, नरेला और बवाना जैसे गर्म इलाकों को वार्ड स्तर पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए. यहां बड़े पार्कों के लिए जमीन मिलना कठिन है, इसलिए सड़क किनारे छायादार पेड़ों की कतारें, हरे डिवाइडर और छतों व दीवारों पर हरियाली विकसित करनी होगी.
उनका कहना है कि लोधी गार्डन, नेहरू पार्क और रिज के साथ संजय वन तथा हौज खास जैसे मौजूदा हरित क्षेत्रों को हरित गलियारों से जोड़ा जाए. यमुना के बाढ़ क्षेत्र, औद्योगिक इलाकों और एनएच-44 व आउटर रिंग रोड के किनारे लगातार हरित पट्टियां बनाई जाएं. सबसे जरूरी है कि मास्टर प्लान 2041 और स्मार्ट सिटी जैसे कार्यक्रमों में हरियाली के जुड़ाव को स्वैच्छिक पहल के बजाय जरूरी नियम बनाया जाए. उपग्रह आंकड़ों से हर साल इसकी निगरानी भी हो, जिससे पता चल सके कि इन प्रयासों का तापमान पर वास्तविक असर पड़ रहा है या नहीं."
हरियाली के साथ दूसरे उपाय भी जरूरी
दिल्ली विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में सह-प्राध्यापक डॉ. नेत्रानंद साहू का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ती आबादी, शहरी घनत्व और चरम गर्मी की घटनाएं शहरी लोगों की सेहत के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर रही हैं. उनके मुताबिक, शहरी हरित क्षेत्र तापमान को नियंत्रित करने और गर्मी के असर को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं.
डॉ. साहू कहते हैं कि शहरों को रहने योग्य बनाए रखने के लिए हरियाली के साथ जलवायु को ध्यान में रखकर शहरी नियोजन, गर्मी से बचाव करने वाले मकानों का डिजाइन, बेहतर परिवहन व्यवस्था और हवा के आवागमन की उचित व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा.
क्यों चुनी गई दिल्ली
शोध के विचार और दिल्ली के चयन पर डॉ. मनीष कुमार बताते हैं, "सौरव के साथ पीएचडी शोध के दौरान हमने 1991 से 2021 तक दिल्ली की हरित संरचना में आए बदलावों का अध्ययन किया. तभी यह सवाल उठा कि क्या हरियाली की मात्रा ही मायने रखती है या उसका स्वरूप भी जरूरी है. इसी सवाल ने इस शोध की नींव रखी.
दिल्ली दुनिया के सबसे बड़े शहरी समूहों में शामिल है और पिछले तीन दशकों में यहां कंक्रीट का तेजी से विस्तार हुआ है. साथ ही, यहां रिज वन, संजय वन और लोधी गार्डन जैसे बड़े हरित क्षेत्रों के साथ घनी बस्तियों में बिखरे छोटे हरित टुकड़े भी हैं. यही विविधता दिल्ली को इस अध्ययन के लिए उपयुक्त बनाती है और यहां से मिले निष्कर्ष देश के दूसरे तेजी से बढ़ते महानगरों को भी दिशा दिखा सकते हैं."
यह भी पढ़ें - Delhi-NCR में प्रदूषण का विस्फोट, AQI 324 पहुंचते पर GRAP2 लागू; जानें किन चीजों पर लगी पाबंदी और क्या हैं नए नियम