बच्चों के समाजीकरण की प्रक्रिया अक्सर क्रूर तरीकों के द्वारा होती रही है. यह केवल स्कूलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि घर के भीतर यह सबसे अधिक स्वीकृत तरीका है. इसका प्रभाव बच्चों के मन पर सदा के लिए रहता है. वे बचपन की इन क्रूर स्मृतियों के सहारे ही बड़े होते हैं. यह उनमें कई तरह के मनोविकार को जन्म देता है, जो उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करता रहता है. लेकिन लंबे सामाजिक संघर्षों और आंदोलनों के कारण अब बच्चों के प्रति हिंसा और दुर्व्यवहार एक चिंताजनक सामाजिक समस्या के तौर पर विचारा जाने लगा है. इससे निपटने के लिए कानूनी सजा, चिकित्सीय प्रणाली और सामाजिक सुधारों का सहारा लिया जाता है. लेकिन सदियों तक समाज और सत्ता ने वयस्कों द्वारा बच्चों के प्रति की जाने वाली हिंसा को नज़रअंदाज़ किया, यहां तक कि वैधता के साथ उनको बचाए रखने का प्रयास भी किया.
बाल अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत
19वीं सदी की शुरुआत तक बच्चों की देखभाल करने वालों द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार को रोकने के लिए कोई औपचारिक कानून नहीं था, लेकिन इस सिलसिले में नॉर्थ कैरोलिना की एक अदालत का फ़ैसला उल्लेखनीय माना जाता है. यह मामला 'स्टेट बनाम पेंडरग्रास' (1837) का था. मामले में एक स्कूल शिक्षक को स्थानीय अदालत ने आठ साल की एक बच्ची को शारीरिक दंड देने का आरोपी माना था. लेकिन, दुर्भाग्य से हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया.अदालत का कहना था कि 'इन लोको पेरेंटीस' के तहत स्कूल का शिक्षक स्कूल के भीतर एक अभिभावक होता है. इसलिए उन्हें अनुशासन बनाए रखने के लिए सजा देने का स्वाभाविक अधिकार है. न्यायालय ने पितृ सत्ता की स्थापित सामाजिक मान्यताओं के मुताबिक ही निर्णय दिया था न कि प्रगतिशील समाज के एक प्रतिनिधि के तौर पर.
दुर्भाग्य से यह प्रवृत्ति हाल के दशकों तक ब्रिटेन और अमेरिका समेत पूरी दुनिया में जारी है. पितृसत्तात्मक सोच और पारंपरिक रीति-रिवाजों के मुताबिक माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों पर लगभग असीमित अधिकार देखें जा सकते हैं. इसमें बच्चों के अधिकारों का सामान्य तौर पर अभाव रहा है. अगर उन्हें यह है भी तो उसे पूर्ण सामाजिक वैधता अबतक नहीं मिली है. जिसे अक्सर हम स्कूलों में शिक्षकों की ओर से छात्रों को अमानवीय सजा के रूप में अखबारों और अन्य माध्यमों से देखते-सुनते हैं और अक्सर माता-पिता भी स्कूलों के इन अमानवीय सख्तियों को सही मानते हैं.
बाल अधिकार के विकास के संदर्भ में 'हाउस ऑफ़ रिफ्यूज मूवमेंट' का एक अलग महत्व है. उसकी चर्चा अनिवार्य है. 1820 के दशक में शुरू हुआ यह मूवमेंट 'पैरेंस पैट्रिया' अर्थात राज्य को अंतिम अभिभावक के रूप में काम करने के कानूनी सिद्धांत पर केंद्रित था. इसे किशोर अपराधियों को वयस्क अपराधियों से अलग करने की अमेरिका की पहली बड़ी कोशिश माना जाता है, क्योंकि इससे पहले बाल-अपचारिता को एक गंभीर अपराध मानते हुए उन्हें भी सामान्य कैदियों की तरह ही सजा दी जाती थी, लेकिन इस आन्दोलन के बाद बाल अपराध को अलग श्रेणी में रखा गया.
बच्चों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली दुनिया की पहली संस्था कौन सी थी
इसी तरह 'न्यूयॉर्क सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएल्टी टू चिल्ड्रन' नामक संस्था की भूमिका बाल अधिकार के लिए प्रसिद्ध रही है. यह संस्था 1875 में मैरी एलेन नाम की नौ साल की एक बच्ची के चर्चित मामले के बाद बनी थी. मैरी एलेन की मां मैरी कॉनॉली लगातार उसका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न करती आ रही थी. इस संस्था को दुनिया की पहली समर्पित बाल सुरक्षा संस्था माना जाता है.
यह बीसवीं सदी का साठ का दशक था जब हमें बाल अधिकारों को लेकर बड़े औपचारिक प्रावधान दिखते हैं. दिलचस्प यह है कि ये कानून बच्चों के साथ मारपीट के सिंड्रोम (Child Battering Syndrome) का पता चलने के बाद बने, जिसका पता बच्चों के रेडियोलॉजिस्ट और उनके साथ काम करने वाले बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लगाया था. लेकिन, इससे पूर्व ऐसे कई कारण थे जिनकी वजह से ये विशेषज्ञ बच्चों के साथ हिंसा और दुर्व्यवहार को गंभीरता से नहीं देख या समझ पा रहे थे, जैसे डॉक्टरों के निर्णय में मदद करने के लिए कोई मेडिकल डायग्नोस्टिक कैटेगरी (चिकित्सकीय पहचान का तरीका) उपलब्ध नहीं था; इसके अलावा डॉक्टरों का समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक मान्यताओं से सहमत होना, जिससे यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता था कि माता-पिता भी अपने बच्चों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और फिर क़ानूनी सीमाएं वगैरह ऐसे कारण थे जिनके कारण इन समस्याओं को पहचानना मुश्किल था.
एक विशेष मामला 1957 का है, जब एक डॉक्टर जॉन कैफी को पता चला कि माता-पिता किस तरह अपने बच्चों को शारीरिक नुकसान पहुंचाते हैं. उन्होंने यह बात अपने कई सालों के मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कही. उनके रिपोर्ट ने इस विषय पर बनी सामाजिक चुप्पी को तोड़ा. इसके अगले 10 साल में कई पेशेवरों ने कॉन्फ्रेंस, अखबारों, मीडिया रिपोर्टों आदि के माध्यम से इस पर काम कर इसे विमर्श का विषय बनाया. अध्ययनों से अनुमान लगाया गया कि अमेरिका में 15 लाख से ज़्यादा बच्चों के साथ उनकी देखभाल करने वालों ने गंभीर दुर्व्यवहार किया. अगर पुराने आंकड़े ही देखें तो अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग (2004) की ओर से पेश आंकड़े गंभीर दुर्व्यवहार की 30 लाख कथित और 8,72,000 पुष्टि की गई घटनाओं की ओर इशारा करते हैं. इसमें देखभाल करने वालों के हाथों ही 1,490 बच्चों की मौतें भी शामिल हैं. यह आंकड़ा पश्चिमी देशों का है. भारत समेत तीसरी दुनिया के देशों में इसकी वास्तविकता डराने वाली है.
कितने तरीके से होता है बच्चों का उत्पीड़न
बच्चों के साथ हिंसा या 'चाइल्ड एब्यूज' शब्द का अर्थ उन कई तरीकों से है, जिनसे बच्चों को वयस्कों द्वारा जानबूझकर या लापरवाही भरे कार्यों के कारण शिकार बनना पड़ता है. इसमें नुकसान की कम से कम तीन श्रेणियां हो सकती है-
- देखभाल करने वालों द्वारा बच्चों के स्वास्थ्य और और कल्याण की अनदेखी करना
- वयस्कों द्वारा बच्चों के साथ शारीरिक हिंसा करना
- किसी समाज के सांस्कृतिक/कानूनी नियमों द्वारा तय की गई 'सहमति की उम्र' (Age of Consent) से पहले युवाओं के मानसिक और शारीरिक सीमाओं का उल्लंघन करना शामिल है.
अगर इन दुर्भाग्यशाली घटनाओं के पीछे की शक्तियों को देखें तो यह जटिल है फिर भी इसे भी कम से कम तीन भागों में समझा जा सकता है.
- तनावपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक स्थितियां
- परिवार की अपेक्षाकृत कमज़ोर स्थिति. इसमें गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्ग के बच्चे बाल हिंसा के आसान शिकार होते हैं.
- शक्तिशाली सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रचलन जो हिंसा के अधिकारपूर्ण इस्तेमाल को वाजिब ठहराती है.
अध्ययन बताते हैं कि यह अहम है कि बाल हिंसा और दुर्व्यवहार को बढ़ावा देने वाला सामाजिक माहौल बनाने में तनाव (स्ट्रेस) खास तौर पर भूमिका निभाता है. परिवार की कम आय, समय से पहले जन्मे या दिव्यांग बच्चों का होना, परिवार में ज़्यादा बच्चे होना और पुरुष सदस्यों की गैर-मौजूदगी में परिवार का संचालन होने जैसी स्थितियां इस तनाव को और बढ़ा देती हैं.
आज अगर भारत में देखें तो तमाम कानून हैं जैसे, पोक्सो, किशोर न्याय अधिनियम (2015), बाल श्रम निषेध कानून (2016), स्कूलों में शारीरिक दंड निषेध कानून के साथ-साथ बच्चों के लिए हेल्पलाइन नंबर (1098) तक हैं. इसके बावजूद ये तमाम प्रतिकूलताएं तेजी से फैलती जा रही हैं. इससे बाल-हिंसा में तेजी से विकास ही नहीं हो रहा है, बल्कि इसकी वैधानिकता की मांग सोशल मीडिया और समाज में देखी जा सकती है, जैसे 'शिक्षकों के हाथों में छड़ी लौटा दो वे तुम्हें एक बेहतर राष्ट्र देंगे'. बाल हिंसा और दुर्व्यवहार को केवल क़ानूनी नजरिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह सामाजिक और आर्थिक मामलों के साथ भी गहराई से जुड़ा हुआ है. बिना सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों के समाधान के इस तरह के पितृसत्तात्मक सोचों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता. बाल अधिकारों को अभिभावकों के लिए एक चुनौती के रूप में देखे जाने की मनोवृत्ति से भी निकलने की जरूरत है. अधिकारों का होना कर्तव्यों को खुद ही तय कर देता है. मुझे इस सिलिसले में विचारक और आलोचक नामवर सिंह की पंक्ति याद आती है, 'पनपते हुए पौधों को कांटा-छांटा नहीं जाता.'
(डिस्क्लेमर: लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)