- बिहार टेंडर घोटाले की जांच में पांच वरिष्ठ IAS अधिकारियों को प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ के लिए समन भेजा है
- रिशु रंजन सिन्हा और उसकी कंपनी पर सरकारी टेंडर में मिलीभगत और गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप लगे हैं
- मोबाइल रिकॉर्ड और दस्तावेजों के आधार पर अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच कथित बातचीत की पुष्टि कर रही है
बिहार के कथित टेंडर घोटाले की जांच अब वरिष्ठ IAS अधिकारियों तक पहुंच गई है. प्रवर्तन निदेशालय सरकारी ठेकों में गड़बड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच कर रहा है. 28 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक, इस मामले में 5 IAS अधिकारियों को पूछताछ के लिए समन भेजे गए हैं. इनमें आनंद किशोर, संतोष कुमार मल्ल, योगेश कुमार सागर, अभिलाषा कुमारी शर्मा और सुनील यादव के नाम शामिल हैं. एजेंसी इन अधिकारियों से अलग-अलग तारीखों पर पूछताछ कर रही है. हालांकि, समन मिलने का मतलब यह नहीं है कि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप साबित हो गए हैं.
क्या है बिहार टेंडर घोटाला?
यह मामला ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशु श्री और उसकी कंपनी रिलायबल इन्फ्रा सर्विस प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है. आरोप है कि सरकारी टेंडर हासिल करने के लिए अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच कथित मिलीभगत हुई. जांच एजेंसियों को शक है कि कुछ टेंडरों की शर्तें चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के हिसाब से तैयार की गईं. यह भी आरोप है कि टेंडर से जुड़ी गोपनीय जानकारी बोली लगाने से पहले कुछ लोगों तक पहुंचाई गई. ED यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या किसी तरह का अवैध लेन-देन हुआ था.
मोबाइल रिकॉर्ड और दस्तावेज जांच के केंद्र में
जांच में रिशु श्री के मोबाइल फोन, डिजिटल रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेज अहम माने जा रहे हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, फोन के रिकॉर्ड में कुछ अधिकारियों के साथ कथित बातचीत और चैट की जानकारी मिली है. अब एजेंसी इन जानकारियों का मिलान सरकारी टेंडर से जुड़े दस्तावेजों और फैसलों से कर रही है. जांच का मकसद यह समझना है कि अधिकारियों और ठेकेदार के बीच संपर्क किस सिलसिले में था. क्या ये बातचीत सामान्य प्रशासनिक काम से जुड़ी थीं या किसी टेंडर में फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई? क्या किसी अधिकारी ने नियमों से हटकर फैसला लिया? इन सवालों के जवाब दस्तावेजों और पूछताछ से ही मिल सकते हैं.
पटना हाईकोर्ट ने भी उठाए थे सवाल
15 अक्टूबर को पटना हाईकोर्ट ने रिशु श्री से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे. अदालत ने आशंका जताई थी कि रिशु श्री इस पूरे मामले में मुख्य साजिशकर्ता के बजाय एक मोहरा हो सकता है और असली भूमिका निभाने वाले कुछ लोग पर्दे के पीछे हो सकते हैं. अदालत ने वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और जांच की दिशा पर भी सवाल किए थे. इसके बाद मामले में ED की कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हुई. हालांकि, अदालत की टिप्पणी को किसी व्यक्ति के दोषी होने का फैसला नहीं माना जा सकता.
SVU की चार्जशीट में कई अधिकारियों के नाम
इस मामले की जांच बिहार पुलिस की विशेष निगरानी इकाई भी कर रही है. जून 2026 में SVU ने रिशु श्री समेत सात लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था. इसमें IAS अधिकारी संजीव हंस, संतोष कुमार, पवन कुमार, मुमुक्षु चौधरी, तारिणी दास और उमेश सिंह के नाम भी शामिल हैं. ये नाम SVU की चार्जशीट से जुड़े हैं. इस मामले में राज्य सरकार पहले ही अभिलाषा कुमारी शर्मा और योगेश कुमार सागर को निलंबित कर चुकी है. कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई है. लेकिन अब जांच का बड़ा सवाल यह है कि कथित टेंडर गड़बड़ी में किसने क्या भूमिका निभाई और क्या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क था. ED की पूछताछ से इन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं. लेकिन इस मामले में किसी भी अधिकारी या ठेकेदार की जिम्मेदारी तय करने के लिए ठोस सबूत जरूरी होंगे. फिलहाल जांच जारी है और अंतिम नतीजा सामने आने तक सभी आरोपों को आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.
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