भारत CNG कारों का भी काफी क्रेज है. लेकिन, लगभग सभी CNG कारों के साथ आपको पेट्रोल का ऑप्शन देखने को मिलेगा. ऐसे में सवाल उठता है कि CNG कार के साथ डीजल का ऑप्शन क्यों नहीं मिलता है. आज हम इसी के बारे में बात करने जा रहे हैं. आपको बता दें कि CNG को पेट्रोल की तुलना में पर्यावरण के लिए अधिक फ्रेंडली और क्लीन फ्यूल माना जाता है.
जब साल 2000 की शुरुआत में CNG को भारत में लॉन्च किया गया था, तब ये पेट्रोल से काफी सस्ती थी और बहुत ज्यादा माइलेज देती थी. ये सौदा ग्राहकों के लिए बिल्कुल सही था. लेकिन सड़कों पर केवल आपको पेट्रोल-CNG कारें खूब दिखेंगी, डीजल-CNG कारें नहीं दिखती हैं. अगर ध्यान से सोचें, तो डीजल और CNG का कॉम्बिनेशन तो पेट्रोल से भी कहीं ज्यादा माइलेज दे सकता है. फिर पैसेंजर कारों में ये तकनीक क्यों नहीं देखने को मिलती हैं? आइए इसके पीछे के कारणों को समझते हैं.
डीजल-CNG टेक्नोलॉजी है उपलब्ध
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इस तकनीक के बारे में पहले किसी ने सोचा ही नहीं है. आपको भारी कमर्शियल व्हीकल्स, बड़ी बसों, ट्रकों और कुछ बाहर से किट लगवाने वाले वाहनों में CNG-डीजल डुअल-फ्यूल सिस्टम देखने को मिल जाएगा. चूंकि इन बड़े कमर्शियल वाहनों का सालाना सफर बहुत ज्यादा होता है. इस वजह से फ्यूल की बचत से होने वाला फाइनेंशियल फायदा इसमें लगने वाले अतिरिक्त हार्डवेयर के भारी खर्च को आसानी से वसूल कर देता है. भारत के कई बड़े कमर्शियल वाहन ब्रांड्स बाजार में डीजल-CNG बाई-फ्यूल मॉडल्स बेचते हैं.
डीजल + CNG संभव लेकिन ये हैं दिक्कतें
पेट्रोल इंजन के विपरीत, एक साधारण डीजल इंजन में फ्यूल को जलाने के लिए किसी स्पार्क प्लग का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. डीजल इंजन असल में बहुत ज्यादा प्रेशर और हाई टेंपरेचर के जरिए फ्यूल को जलाते हैं. CNG की ऑक्टेन रेटिंग बहुत अधिक होती है. जिसकी वजह से इसे केवल दबाव जरिए सीधे जलाना बेहद मुश्किल होता है. CNG पेट्रोल इंजन में आसानी से काम कर जाती है क्योंकि वहां लगा स्पार्क प्लग जरूरत पड़ने पर कंप्रेस्ड गैस को तुरंत सुलगा देता है.
एक डीजल-CNG इंजन को चलाने के लिए आमतौर पर 'पायलट फ्यूल' के रूप में थोड़ी मात्रा में डीजल की आवश्यकता होती है. इस वजह से तकनीकी रूप से देखें तो एक CNG-डीजल इंजन कभी भी केवल CNG के दम पर अकेले नहीं चल सकता है. इसका मतलब है कि आप वास्तव में कोई ट्रेडिशनल "डीजल-CNG" कार नहीं बनाते हैं, बल्कि आप एक 'डुअल-फ्यूल' इंजन तैयार करते हैं.
डीजल-CNG कारों के साथ दिक्कत
एक डीजल-CNG पैसेंजर कार को प्रैक्टिकल और सफल बनाने के लिए कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनी को गाड़ी में कई अतिरिक्त चीजें जोड़नी होंगी. इनसके लिए एक भारी CNG स्टोरेज टैंक, हाई-प्रेशर फ्यूल लाइनें और रेगुलेटर्स, एक कंपलेक्स डुअल-फ्यूल इंजेक्शन/कंट्रोल सिस्टम चाहिए होगा. साथ ही इनमें एक डीजल इंजेक्शन सिस्टम, दोनों फ्यूलों के लिए स्पेशल सेंसर्स और कैलिब्रेशन, इमिशन कंट्रोल के लिए कंपलेक्स हार्डवेयर और अतिरिक्त सुरक्षा इंजीनियरिंग शामिल हैं.
इसका सीधा मतलब है कि गाड़ी में बहुत ज्यादा भारी हार्डवेयर की जरूरत होगी, जिसे एक छोटी पैसेंजर कार के लिमिट साइज के भीतर फिट करना नामुमकिन है. इसके अलावा, चूंकि CNG की एनर्जी डेंसिटी वॉल्यूम के हिसाब से काफी कम होती है. इस वजह से एक पैसेंजर कार को अच्छी रेंज देने के लिए काफी बड़े और भारी टैंक की जरूरत होगी. यही वजह है कि यह सिस्टम केवल बड़े आकार के कमर्शियल वाहनों के लिए ही प्रैक्टिकल और सफल साबित होता है.
ये है बड़ी परेशानी
सबसे बड़ी समस्या है इसकी कीमत. पेट्रोल के मुकाबले डीजल इंजनों को बनाना पहले से ही काफी महंगा होता है. BS6 नियमों के कड़े मानकों को पूरा करने के लिए इनमें DEF टैंक और डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर (DPF) जैसे कंपलेक्स और महंगे हार्डवेयर का इस्तेमाल करना पड़ता है. पहले से ही इतने महंगे डीजल इंजन के ऊपर CNG के भारी-भरकम हार्डवेयर का अतिरिक्त खर्च जोड़ देना एक छोटी पैसेंजर कार के लिए किसी भी लिहाज से फायदे का सौदा नहीं रह जाता है.
कंपनियों के लिए नहीं है फायदे का सौदा
कड़े सरकारी नियमों और इमिशन स्टैंडर्ड के कारण मॉडर्न डीजल पैसेंजर कारों में पहले से ही बेहद महंगे एमिशन-कंट्रोल सिस्टम्स दिए जा रहे हैं. गाड़ी में CNG जोड़ने के बाद भी ये कंपलेक्स और महंगी जरूरतें खत्म नहीं होंगी, क्योंकि गाड़ी को स्टार्ट करने और चलाने के लिए पायलट फ्यूल के रूप में डीजल को जलाना ही पड़ेगा. यही वजह है कि कार बनाने वाली कंपनियां एक बहुत छोटे संभावित बाजार के लिए इस तकनीक को डेवलप करने और उसे सरकारी मंजूरी दिलाने के लिए भारी-भरकम पैसा खर्च करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती हैं.
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