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एक हिंदू रानी ने पति की याद में बनवाया था 7 मंजिला 'उल्टा मंदिर', सरस्वती नदी के कीचड़ ने 700 साल तक की इसकी रक्षा; अब रात में बोलती हैं दीवारें!

Rani Ki Vav: 100 रुपये के नोट के पीछे बावड़ी का जो चित्र दिखाई देता है, वह इसी रानी की वाव के उत्तरी हिस्सा है. इसमें सीढ़ियों और कलाकृतियों की भव्य गहराई साफ नजर आती है.

एक हिंदू रानी ने पति की याद में बनवाया था 7 मंजिला 'उल्टा मंदिर', सरस्वती नदी के कीचड़ ने 700 साल तक की इसकी रक्षा; अब रात में बोलती हैं दीवारें!
100 रुपये के नोट पर छपी है ताज महल से 300 साल पुरानी इस धरोहर की तस्वीर, हिंदू रानी ने पति की याद में बनवाई थी
Gujarat Tourism

100 Rupee Note Rani Ki Vav: क्या आपने कभी कोई ऐसी इमारत देखी है जो आसमान की ओर उठने के बजाय जमीन के नीचे गहराई में जाती हो? गुजरात के पाटन में सरस्वती नदी के बाएं तट पर एक ऐसा ही अजूबा मौजूद है. 'रानी की वाव' नाम की यह इमारत कोई साधारण सीढ़ीदार कुआं नहीं है, बल्कि एक भव्य 'उल्टा मंदिर' है. सदियों तक दुनिया की नजरों से ओझल रहने के बाद, 11वीं सदी का यह स्मारक अब एक हाई-टेक अनुभव के साथ पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है. आइए, जानतें हैं इस बेजोड़ धरोहर की कहानी के बारे में...

इस प्रेम के प्रतीक को बनाने में लगे पूरे 20 साल

UNESCO और ASI के मुताबिक, चालुक्य वंश के राजा भीमदेव प्रथम के निधन के बाद, उनकी पत्नी रानी उदयमती (नरवरह खंगारा की पुत्री) ने साल 1063 में इस बावड़ी का निर्माण शुरू करवाया था. 1304 में जैन भिक्षु मेरुतुंगा द्वारा लिखी गई एक रचना के मुताबिक, इस भव्य कुएं को बनकर तैयार होने में पूरे 20 साल लग गए. लेकिन 13वीं सदी में आए एक भूगर्भीय बदलाव ने सबकुछ बदल दिया. सरस्वती नदी ने अपना रास्ता बदला और भयंकर बाढ़ की वजह से यह पूरी की पूरी सात मंजिला बावड़ी गाद और कीचड़ के नीचे दफन हो गई. हालांकि, यह प्राकृतिक आपदा इसके लिए एक वरदान साबित हुई. इसी कीचड़ ने अगले 700 से अधिक सालों तक इस अनमोल धरोहर को किसी महफूज तिजोरी की तरह सुरक्षित रखा.

Rani Ki Vav

प्रेम की प्रतीक रानी की वाव को बनाने में करीब 20 साल का समय लगा था.

65 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा और 27 मीटर गहरी संरचना

गुजरात टूरिज्म के मुताबिक, 'मारू-गुर्जर' स्थापत्य शैली में बनी यह बावड़ी पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर फैली है. करीब 64-65 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी यह संरचना अपने आप में इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है. इसका प्रवेश द्वार पूर्व में है, जबकि सुरंगनुमा मुख्य कुआं एकदम पश्चिम में है, जो 10 मीटर चौड़ा और 30 मीटर गहरा है. इसे एक 'उल्टे मंदिर' के रूप में डिजाइन किया गया था, जिसका उद्देश्य पानी की पवित्रता का जश्न मनाना था. ईंटों और तराशे गए पत्थरों से बनी इस बावड़ी में सीढ़ियों वाले कई गलियारे और बहुमंजिला खंभों वाले मंडप हैं. इसकी गहराई में जाते हुए चौथा स्तर सबसे गहरा है, जो 23 मीटर नीचे एक बड़े आयताकार टैंक तक ले जाता है.

Rani Ki Vav

रानी की वाव में 800 से ज्यादा मूर्तियां थीं, जिसमें से अब करीब 400 मूर्तियां ही बची हैं.
Photo Credit: Gujarat Tourism

दीवारों पर 800 मूर्तियां और शेषनाग पर लेटे भगवान विष्णु

इस बावड़ी की दीवारें, गलियारे और खंभे किसी प्राचीन आर्ट गैलरी की तरह हैं. इसके खंभों के चौकोर बेस पर कलश और पत्तियां की सजावट है और ऊपरी हिस्से पर चार हाथों वाले 'कीचक' बने हैं. माना जाता है कि शुरुआत में यहां 800 से ज्यादा मूर्तियां थीं. आज भी यहां करीब 400 मूर्तियां बेहतरीन हालत में मौजूद हैं. इनमें लगभग सभी हिंदू देवी-देवता, अप्सराएं, पौराणिक कथाएं, साहित्यिक रचनाओं के दृश्य और कामुक दृश्यों सहित शामिल हैं. सबसे प्रमुख आकर्षण कुएं के पास तीन हिस्सों में उकेरी गई भगवान विष्णु की मूर्ति है, जिसमें वे शेषनाग पर लेटे हुए नजर आते हैं. इसकी बारीक नक्काशी माउंट आबू के विमलवासाही और मोढेरा के सूर्य मंदिर की उत्कृष्ट शिल्पकारी जैसी है.

Rani Ki Vav

रानी की वाव में भगवान विष्णु की शेषनाग पर लेटे हुए मूर्ति यहां का सबसे प्रमुख आकर्षण है.
Photo Credit: Gujarat Tourism

अंग्रेजों को दिखे थे सिर्फ कुछ खंभे, आज है यूनेस्को की 'विश्व धरोहर'

1890 के दशक में जब पुरातत्वविद् हेनरी कौसेन्स और जेम्स बर्गेस ने यहां का दौरा किया था, तब यह बावड़ी पूरी तरह मिट्टी में दबी थी. उन्हें सिर्फ कुएं का ऊपरी हिस्सा और कुछ खंभे ही दिखाई दिए थे. आखिरकार 1940 के दशक में इसे दोबारा खोजा गया. बाद में 1980 के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसकी सफाई और जीर्णोद्धार का काम किया. आज यह ASI द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है और इसके चारों ओर 100 मीटर का नो-डेवलपमेंट जोन बनाया गया है. इसके अद्वितीय मूल्य को देखते हुए साल 2014 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे अपनी 'विश्व धरोहर' सूची में शामिल किया.

Rani Ki Vav

रानी की वाव को हेनरी कौसेन्स और जेम्स बर्गेस ने खोजा था.
Photo Credit: Gujarat Tourism

18 करोड़ लाकर रात में शुरू किया गया हाई-टेक शो

अगर कोई ऐतिहासिक इमारत अचानक अपनी कहानी खुद सुनाने लगे तो आपको कैसा लगेगा? 31 मार्च 2026 से यहां ठीक ऐसा ही हो रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ई-लॉन्च के जरिए यहां एक भव्य 3D प्रोजेक्शन मैपिंग शो और हेरिटेज लाइटिंग की शुरुआत की है. गुजरात सरकार द्वारा 18 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया यह हाई-टेक शो 24 मिनट लंबा है. इस शो के शुरू होने से अब यह धरोहर शाम 6 बजे के बाद भी पर्यटकों के लिए खुली रहती है. सूर्यास्त के बाद यह ऐतिहासिक बावड़ी एक जीवंत और गतिशील कहानी में बदल जाती है. यह शो हर शाम 7:30 से 8:00 बजे और 8:00 से 8:30 बजे तक दो स्लॉट में दिखाया जाता है. पर्यटकों के लिए इसकी एंट्री बिल्कुल मुफ्त रखी गई है और हर शो में लगभग 125 लोगों के बैठने की व्यवस्था है.

rani ki vav light show

रानी की वाव में हर शाम 7:30 से 8:00 बजे और 8:00 से 8:30 बजे तक दो स्लॉट में लाइट शो दिखाया जाता है.
Photo Credit: Gujarat Tourism

कैसे पहुंचें इस 11वीं सदी के ऐतिहासिक अजूबे तक?

अगर आप इस अनूठी विरासत को देखने का मन बना चुके हैं, तो यहां पहुंचना बेहद आसान है. सबसे निकटतम हवाई अड्डा अहमदाबाद है, जो 125 किलोमीटर की दूरी पर है. यह भारत और अंतरराष्ट्रीय शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. जबकि पाटन का अपना रेलवे स्टेशन है. इसके अलावा, पास का प्रमुख रेलवे स्टेशन मेहसाना है, जो पाटन से बस द्वारा सिर्फ 1 घंटे की दूरी पर है. अहमदाबाद से पाटन पहुंचने में अंतर-शहरी बसों से 3.5 घंटे लगते हैं, जबकि मेहसाना से बस द्वारा 1 घंटे का समय लगता है. शेयर्ड जीपें भी उपलब्ध हैं, जो थोड़ी तेज होती हैं लेकिन बस के मुकाबले कम आरामदायक होती हैं.

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