विज्ञापन

सवा लाख की नौकरी को सुरक्षित मान बैठा था पोता, दादा ने 7 चाबियां देकर समझाया कमाई का गणित

महीने के सवा लाख रुपये कमाने के घमंड में चूर पोते को उसके दादाजी ने सात चाबियों के गुच्छे के जरिए वित्तीय सुरक्षा का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया. उन्होंने समझाया कि कमाई का केवल एक जरिया होना जोखिम भरा है और नौकरी दरअसल किराए का ताला है, जिसकी चाबी हमेशा मालिक के पास रहती है.

सवा लाख की नौकरी को सुरक्षित मान बैठा था पोता, दादा ने 7 चाबियां देकर समझाया कमाई का गणित
दादाजी की 7 चाबियों के राज ने एक झटके में सिखाया सबक.
pixabay.com

VIRAL POST: नौकरी के साथ-साथ कमाई के अतिरिक्त साधन (मल्टीपल इनकम सोर्सेज) तैयार करने की व्यावहारिक सीख देती एक पोते और उसके दादाजी की कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. आज के अनिश्चित दौर में सिंगल इनकम पर निर्भरता के जोखिम को रेखांकित करते हुए यह कहानी बताती है कि नौकरी दरअसल एक 'किराए का ताला' है, जिसकी असली चाबी हमेशा मालिक के पास होती है. दादाजी के कमर पर लटकने वाले सात चाबियों के गुच्छे के माध्यम से लेखक ने समझाया है कि वित्तीय सुरक्षा के लिए बैकअप प्लान कितना जरूरी है.

दादाजी की कमर पर लटकने वाली चाबियों का राज

आइए, इस कहानी को खुद पोते की जुबानी सुनते हैं. बचपन की यादें बड़ी अजीब और गहरी होती हैं. मुझे आज भी याद है कि मेरे दादाजी की कमर पर हमेशा चाबियों का एक भारी-भरकम गुच्छा लटका रहता था. उस गुच्छे में 7 चाबियां थीं. यह बात मेरे बाल-मन को हमेशा परेशान करती थी, क्योंकि हमारे पूरे घर में ताले सिर्फ दो ही थे. जब मैं 11 साल का हुआ, तो मुझसे रहा नहीं गया. मैंने पूछ ही लिया, "दादाजी, जब घर में दो ही ताले हैं, तो यह बाकी की पांच चाबियां किसकी हैं?" दादाजी मुस्कुराए और मेरे सिर पर हाथ रखकर बोले, "बेटा, जिस दिन तू जिंदगी में सिर्फ एक ताले पर भरोसा करना छोड़ देगा, उस दिन इस राज से पर्दा उठाऊंगा." उस वक्त मैं उनकी बात का मतलब नहीं समझ पाया.

दादाजी ने उतार दिया सारा घमंड

समय पंख लगाकर उड़ गया. पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई. अपनी मेहनत के दम पर ठीक 17 साल बाद वह दिन आया, जब मेरा बड़ा प्रमोशन हुआ. मेरी सैलरी बढ़कर  1.20 लाख रुपए महीना हो गई. मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था. घर पहुंचते ही मैंने गर्व से दादाजी से कहा, "अब मेरी सैलरी सवा लाख के करीब है. अब अपनी लाइफ पूरी तरह सेट है!"

यह भी पढ़ें | 101 साल में इस कंपनी ने नहीं निकाला एक भी कर्मचारी, CEO ने बताया- दबाव में भी किस तरह करते हैं काम
 

"एक चाबी से घर चलता है, 7 चाबियों से पीढ़ियां"

मेरी बात सुनकर दादाजी के चेहरे पर कोई हड़बड़ी नहीं थी. उन्होंने शांत भाव से अपनी कमर से वह पुराना चाबियों का गुच्छा निकाला, मेरी हथेली पर रखा और बोले, "जरा इन्हें गिन." मैंने चाबियों को गिनना शुरू किया, तो मेरा ध्यान उन पर बंधी छोटी-छोटी पर्चियों पर गया. हर चाबी पर एक नाम लिखा था- दुकान का शटर, ऊपर का किराए वाला कमरा, गांव के खेत का गोदाम, बैंक लॉकर, डाकघर की पासबुक वाली दराज, किराए पर चलने वाला ट्रक और किताबों की अलमारी. गुच्छे के मुख्य छल्ले पर एक बहुत पुरानी, पीली पड़ चुकी पर्ची पर लिखा था, "एक चाबी से घर चलता है. सात चाबियों से पीढ़ियां."

जब दादा बोले- अच्छा वक्त हमेशा नहीं रहता

दादाजी ने मुझे समझाया कि उनकी पहली चाबी साल 1964 में आई थी, जो उनकी दुकान की थी. इसके बाद हर 7-8 साल में उन्होंने मेहनत करके एक नई चाबी यानी आमदनी का नया जरिया जोड़ा. मैंने हैरान होकर पूछा, "लेकिन दादाजी, जब दुकान इतनी अच्छी चल ही रही थी, तो बाकी के इन झंझटों को पालने की क्या जरूरत थी?"दादाजी ने जो जवाब दिया, वह आज के हर नौकरीपेशा इंसान को दीवार पर लिख लेना चाहिए. उन्होंने कहा, "बेटा, अच्छा वक्त हमेशा नहीं रहता. लेकिन याद रखना, नई चाबी हमेशा अच्छे वक्त में ही बनती है. जब बुरा वक्त आता है, तब तो लोग ताले बचाने में लग जाते हैं. जिस इंसान के पास कमाई का सिर्फ एक जरिया है, वह केवल एक फोन कॉल से सड़क पर आ सकता है. आज नौकरी गई, तो कल से घर का चूल्हा बंद. लेकिन जिसके पास कमाई के अलग-अलग रास्ते हैं, उसे किस्मत भी एक झटके में नीचे नहीं गिरा सकती. नौकरी खुद की चाबी नहीं है बेटा, यह तो किराए का ताला है, जिसकी असली चाबी हमेशा मालिक के पास रहती है."  

यह भी पढ़ें | 3 साल में चाहिए 1 करोड़ रुपए? फिनफ्लुएंसर अंकुर वारिकू ने बताया- समझदार लोग भी करते हैं ये बड़ी गलती

"मेरी भी तीन चाबियां तैयार हो गई"

दादाजी की इस बात ने मेरे भीतर के भ्रम को तोड़ दिया. मैंने उसी हफ्ते अपनी दूसरी चाबी बनाने पर काम शुरू कर दिया. नौकरी के साथ-साथ मैंने वीकेंड पर ऑनलाइन क्लासेस लेना शुरू किया और धीरे-धीरे एक छोटा सा निवेश किया. आज मेरे गुच्छे में भी 3 चाबियां तैयार हो चुकी हैं. इस अमूल्य सीख को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए, मैंने अपने बेटे के 10वें जन्मदिन पर उसे महंगे खिलौने के बजाय एक खाली छल्ला उपहार में दिया और उस पर वही पर्ची बांध दी, "एक चाबी से घर चलता है. सात चाबियों से पीढ़ियां." इस कहानी का सबसे बड़ा सार यही है. आज आपके पास जो नौकरी या बिजनेस है, वह बेहतरीन हो सकता है. लेकिन क्या आपके पास कोई 'बैकअप प्लान' है? जब जिंदगी में सब कुछ सही चल रहा हो, तभी अपनी दूसरी या तीसरी चाबी बनाने की शुरुआत करें.

यह भी पढ़ें | शर्मा चायवाले की हर महीने की कमाई 9 लाख, खुद बताया- 'कैसे होती है इनकम, गल्ले में कितना बचता है?'

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Financial Freedom Business Ideas, Generational Wealth, Generational Wealth India, Generational Wealth Indian Families, Personal Finance Advice
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com