Corporate Job Viral Post: सैलरी और प्रमोशन की दौड़ में हम इतना आगे निकल आए हैं कि अब अपनों की ही दहलीज पर परदेशी बन चुके हैं...बेंगलुरु के एक पिता का यह दर्द सिर्फ एक पोस्ट नहीं, बल्कि उस 'कॉर्पोरेट पिंजरे' की दास्तां है जहां जेब तो भर रही है, पर यादों का दामन खाली होता जा रहा है. 12 घंटे की शिफ्ट और मासूम बेटे के साथ खेलने की हसरत के बीच फंसा यह शख्स अब अपनी नौकरी को लात मारने की तैयारी में है. क्या ये सिर्फ एक पोस्ट है या हर नौकरीपेशा बाप की दबी हुई चीख? आइए, इस वायरल दर्द की गहराई को समझते हैं.

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बेंगलुरु की सड़कों पर सिर्फ ट्रैफिक ही नहीं जाम है, बल्कि यहां के प्रोफेशनल की जिंदगी भी ऑफिस और घर के बीच 'जाम' होकर रह गई है. हाल ही में रेडिट पर एक बाप का जो दर्द छलका है, उसने हजारों लोगों को आइना दिखा दिया. यह शख्स सुबह 11 से रात 11 बजे तक काम की चक्की में पिसता है, लेकिन इसकी असल तकलीफ थकान नहीं, बल्कि अपने एक साल के कलेजे के टुकड़े से बढ़ती दूरियां हैं. उसने लिखा कि जब उसका नन्हा बेटा घुटनों के बल रेंगते हुए उसके पास आता है, इस उम्मीद में कि पापा उसे गोद में उठाएंगे, तब अक्सर उसे किसी 'इमर्जेंसी कॉल' या मीटिंग की वजह से मुंह फेरना पड़ता है. उस वक्त बच्चे के चेहरे पर जो मायूसी आती है, वो इस पिता के दिल को छलनी कर देती है. उसे डर है कि पैसे के चक्कर में वो ये अनमोल पल हमेशा के लिए खो देगा, जो कभी दोबारा लौटकर नहीं आएंगे.
Trying to quit corporate slavery for my son
by u/Mystery-Ripper in Bengaluru
मजबूरी का नाम नौकरी या जिम्मेदारी? (Corporate Compulsions vs Personal Life)
इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर जैसे कोई सोई हुई आग सुलगा दी है. कोई कह रहा है कि 'नौकरी छोड़ना आफत मोल लेना है', तो कोई सलाह दे रहा है कि 'बच्चे के बचपन से कीमती कुछ नहीं.' एक यूजर ने तो यहां तक लिख दिया कि, वो खुद घर का अकेला कमाने वाला है, इसलिए चाहकर भी इस 'पिंजरे' से बाहर नहीं निकल सकता. मिडिल क्लास आदमी के लिए करियर और औलाद के बीच का ये बैलेंस किसी पतली रस्सी पर चलने जैसा हो गया है.
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क्या है इस मुश्किल का हल? (Finding Balance in Today's Fast-Paced World)
इंटरनेट पर बहस छिड़ी है कि क्या सिर्फ नौकरी छोड़ना ही समाधान है? कुछ लोगों ने बीच का रास्ता सुझाते हुए कहा ,कि अचानक इस्तीफा देने से बेहतर है कि पहले कोई 'साइड बिजनेस' जमाया जाए. वहीं कुछ का मानना है कि ऑफिस के घंटों में बदलाव और वीकेंड्स पर फोन स्विच ऑफ करना भी राहत दे सकता है. ये खबर आज के दौर का कड़वा सच है. जहां हम अपनों के लिए ही कमाते हैं, पर उनके लिए ही वक्त नहीं निकाल पाते. यह इमोशनल कर देने वाली दास्तां सिर्फ एक इंसान की नहीं, बल्कि उस हर शख्स की है जो लैपटॉप की स्क्रीन और बच्चे की मुस्कान के बीच झूल रहा है. पैसा तो आता-जाता रहेगा, लेकिन बच्चे का वो 'बचपन' एक बार गया तो फिर दोबारा किसी बोनस या प्रमोशन से वापस नहीं खरीदा जा सकता.
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(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)
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