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UAE का ओपेक छोड़ना सऊदी अरब के दबदबे का अंत क्यों माना जा रहा है? 10 प्वाइंट्स में समझिए

रिपोर्ट में कार्टेल के लिए व्यापक प्रभावों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिसमें सुझाव दिया गया है कि यूएई के बाहर निकलने से अन्य सदस्य देशों को ओपेक में बने रहने पर अब संदेह है.

UAE का ओपेक छोड़ना सऊदी अरब के दबदबे का अंत क्यों माना जा रहा है? 10 प्वाइंट्स में समझिए
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव खाड़ी देशों के लिए मुश्किल साबित हो सकता है.
  • संयुक्त अरब अमीरात ने ओपेक और ओपेक+ समूहों से अलग होकर पश्चिम एशिया में सऊदी अरब के प्रभुत्व को चुनौती दी है
  • यूएई अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाकर वैश्विक तेल बाजार में अधिक हिस्सेदारी और मूल्य निर्धारण की स्वतंत्रता चाहता है
  • इस कदम से सऊदी अरब और यूएई के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और क्षेत्रीय ऊर्जा नीति में बदलाव हुआ है
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संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का  मंगलवार को ओपेक और ओपेक+ समूहों से अलग होने की घोषणा करने को विश्लेषकों ने पश्चिम एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना है. उनका मानना है कि ये सऊदी अरब के प्रति दशकों से चली आ रही आर्थिक अधीनता का निर्णायक अंत है. पीएसआईएफओएस कंसल्टिंग ग्रुप के एक नए रणनीतिक विश्लेषण ने इस निर्णय को महज एक तकनीकी एडजस्टमेंट नहीं, बल्कि क्षेत्रीय ऊर्जा नीति पर सऊदी के प्रभुत्व के खिलाफ एक राजनीतिक विद्रोह बताया है.

  1. यह कदम अमीराती विदेश नीति में एक मौलिक बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात अब अमेरिका, इजरायल और तेजी से बढ़ते एशियाई बाजारों की ओर उन्मुख एक स्वतंत्र मार्ग पर चल रहा है. ओपेक+ ढांचे के भीतर, क्षेत्र की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच वर्षों से तनाव पनप रहा है. अमीराती रणनीति बाजार हिस्सेदारी को कीमत से अधिक महत्व देने की है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था अधिक विविध है और उत्पादन लागत कम है. विश्लेषकों का कहना है कि अबू धाबी बिक्री की मात्रा को अधिकतम करना चाहता है, भले ही इसके लिए उसे थोड़ी कम कीमत स्वीकार करनी पड़े.
  2. पीएसआईएफओएस की रिपोर्ट में कहा गया है, "यूएई की वापसी सऊदी अरब के नेतृत्व वाली नीतियों के प्रति उसके आर्थिक समर्पण की औपचारिक समाप्ति का प्रतीक है." दोनों देशों के संबंध एक घनिष्ठ गठबंधन से आर्थिक प्रतिस्पर्धा में बदल गए हैं. इस वापसी के पीछे एक प्रमुख कारण यूएई का फंसे हुए परिसंपत्तियों. का डर है. उसे डर है कि उसके तेल भंडार इस्तेमाल होने से पहले ही अपना आर्थिक मूल्य खो सकते हैं. 2040 तक वैश्विक जीवाश्म ईंधन की मांग चरम पर पहुंचने का अनुमान है, ऐसे में अबू धाबी अपने संसाधनों का से कमाने की होड़ में लगा है.
  3. संयुक्त अरब अमीरात ने 2030 तक अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रति दिन करने के लिए पहले ही 122 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश कर दिया है. हालांकि, ओपेक के प्रतिबंधात्मक कोटा के कारण ऐतिहासिक रूप से अमीरात का उत्पादन 26 लाख से 31 लाख बैरल प्रति दिन तक ही सीमित रहा है. कार्टेल से बाहर निकलकर, संयुक्त अरब अमीरात अंततः अपने विशाल अवसंरचना निवेशों को गति दे सकेगा और हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों सहित हरित अर्थव्यवस्था की ओर अपने को ले जा सकेगा.
  4. इसके अलावा, अबू धाबी अपने "मुरबान" कच्चे तेल को ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए वैश्विक मूल्य निर्धारण बेंचमार्क के रूप में स्थापित करने का इरादा रखता है. इस महत्वाकांक्षा के लिए आपूर्ति में उस स्तर की लचीलता की आवश्यकता है, जिसे ओपेक की कठोर कोटा प्रणाली संभव नहीं बनाती है.
  5. बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओपेक और ओपेक+ गठबंधन से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बाहर निकलने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इस कदम से वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में कमी आ सकती है. ट्रंप ने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान का जिक्र करते हुए कहा, "गैस, तेल और अन्य सभी चीजों की कीमतों में कमी लाने के लिए यह एक अच्छी बात है. उनके पास सब कुछ है. वास्तव में, वह एक महान नेता हैं. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. ओपेक में कुछ समस्याएं चल रही हैं." 
  6. विश्लेषकों का कहना है कि यूएई के बाहर निकलने से तेल की कीमतों पर सऊदी अरब-रूस की सहमति प्रभावी रूप से टूट गई है और ऊर्जा आपूर्ति को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की ब्लॉक की क्षमता कमजोर हो गई है. अब उम्मीद की जा रही है कि यूएई ओपेक की सामूहिक मूल्य निर्धारण व्यवस्था को दरकिनार करते हुए, चीन और भारत के साथ सीधे और तरजीही आपूर्ति समझौते करेगा - जो वैश्विक तेल मांग का बदलता हुआ केंद्र बिंदु हैं.
  7. खाड़ी देशों में, इस वापसी से सऊदी अरब और भी अधिक अलग-थलग पड़ जाएगा. ऐतिहासिक रूप से, यूएई रूस के बार-बार होने वाले अति-उत्पादन का जवाब अति उत्पादन कर देता रहा है. विश्लेषकों का मानना ​​है कि अबू धाबी की उपस्थिति के बिना, रियाद को शेष सदस्यों के बीच अनुशासन बनाए रखने के लिए प्राइस वॉर में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.
  8. पीएसआईएफओएस कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यूएई के बाहर निकलने से खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के प्रतिस्पर्धी गुटों में विभाजित होने का खतरा है. विश्लेषण का निष्कर्ष यह है, "यह महज एक तकनीकी एडजस्टमेंट नहीं है. यह एक ऐसा भूकंप है जो खाड़ी देशों के ऊर्जा संबंधों की भू-राजनीतिक संरचना को नया आकार देगा... जिसके परिणाम आने वाले वर्षों तक क्षेत्रीय राजनीति, वैश्विक बाजारों और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर गहरा प्रभाव डालेंगे."
  9. इस बीच, आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी व्यवधानों के चलते ओपेक से यूएई के बाहर निकलने का तात्कालिक प्रभाव सीमित रह सकता है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण यूएई से उत्पादन में वृद्धि की ओर इशारा करता है. यूएई ने पहले ही पर्याप्त अतिरिक्त उत्पादन क्षमता विकसित कर ली है, जो रसद संबंधी बाधाओं के कम होने पर वैश्विक बाजारों में प्रवेश कर सकती है.
  10. रिपोर्ट में कहा गया है, "हमारा मानना ​​है कि यह कदम लंबी अवधि में कीमतों को नरम करने में मददगार साबित हो सकता है, हालांकि ओपेक द्वारा आपूर्ति प्रबंधन में कम एकजुटता के कारण बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है." रिपोर्ट में कार्टेल के लिए व्यापक प्रभावों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिसमें सुझाव दिया गया है कि यूएई के बाहर निकलने से अन्य सदस्य देशों को ओपेक में बने रहने पर अब संदेह है, विशेष रूप से घटते राजस्व और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच.

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