अमेरिका-ईरान के बीच चल रही टेंशन ने दुनियाभर के देशों को एक बड़ी ऊर्जा संकट में डाल दिया है. तनाव की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बंद है, नतीजन वैश्विक बाजार में लगभग 20% कच्चे तेल की सप्लाई पर असर पड़ा. सबसे बड़ा झटका भारत को लगा है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल और 60% एलपीजी गैस आयात करता है. हालात ऐसे बने हैं कि सऊदी अरब और यूएई ने तेल भेजने के लिए नए रास्ते का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जिससे उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर निर्भर नहीं रहना पड़े.
यूएई, सऊदी अरब का मास्टर स्ट्रोक
अब इस तेल संकट के बीच दुनिया में तेल सप्लाई का तरीका तेजी से बदल रहा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब और यूएई ने एक नए प्लान पर काम कर रहे हैं, जिसके जरिए वो होर्मुज से गुजरने की बजाय दूसरे रास्तों से तेल भेज रहे हैं. इस बदलाव की वजह से उनके तेल निर्यात में करीब 15 लाख बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई और अब ये आंकड़ा करीब 80 लाख बैरल रोज तक पहुंच गया है. हालांकि ये लेवल युद्ध शुरू होने से पहले जितना था, उससे अभी भी कम है. वहीं, टेंशन को देखते हुए यूएई भी तैयारी में जुटा है और उसने होर्मुज को बाईपास करने के लिए एक नई कच्चे तेल की पाइपलाइन का करीब 50% काम पूरा कर लिया है, जिससे जरूरत पड़ने पर तेल की सप्लाई जारी रखी जा सके.
साल 1970 से बड़ा है ये संकट
दूसरी तरफ भारत 40% कच्चा तेल इसी रास्ते से लेता था, अब जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बंद है तो देश में 15 दिनों में चार बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ चुके हैं. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने ऑयल मार्केट रिपोर्ट , मई 2026 में खुलासा किया कि मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से मार्च 2026 के दौरान वैश्विक बाजारों में हर दिन तेल की सप्लाई जितनी मात्रा में बाधित हुई वो 1970 के दशक के दो बड़े तेल संकटों के दौरान हुए कुल नुकसान से भी कहीं ज्यादा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, अप्रैल महीने के दौरान गल्फ देशों से अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में औसतन 18 लाख बैरल कच्चा तेल प्रति दिन कम पहुंचा, जबकि इस पूरे संकट के दौरान फरवरी से 13 मई तक कुल नुकसान 1 करोड़ 28 बैरल से ज़्यादा हर दिन हुआ.
क्षमता दोगुनी करने की तैयारी में सुल्तान अल जबेर
यूएई सरकार के इंडस्ट्री और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी मंत्री सुल्तान अल जबेर ने कहा है कि फुजैराह बंदरगाह से तेल निर्यात को तेजी से बढ़ाने के लिए पाइपलाइन प्रोजेक्ट पर काम तेज किया जा रहा है, जिससे इसकी क्षमता को दोगुना किया जा सके. लेकिन सरकार ने ये भी साफ कर दिया है कि हालात संभालना इतना आसान नहीं है. कच्चे तेल की सप्लाई को युद्ध से पहले के करीब 80% स्तर तक वापस लाने में कम से कम चार महीने लग सकते हैं.
तेल की स्थिति नॉर्मल होने में लगेगा समय
वहीं, पूरी दुनिया में तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य होने में 2027 की दूसरी तिमाही तक का समय लग सकता है. इसका मतलब है कि तब तक भारत के साथ दुनियाभर के देशों को तेल की कमी और महंगे दामों का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, यूएई का ये प्लान भविष्य में तेल सप्लाई के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है.
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