रूसी तेल की खरीद पर भारत पर 100% टैरिफ यानी भारी-भरकम टैक्स का खतरा मंडरा रहा था. लेकिन पासा पलटने में दो दिन भी नहीं लगे. इसके लागू होने से ठीक दो दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर लगे कड़े प्रतिबंधों वाले कानून के तहत भारत को बड़ी छूट दे दी. भारत आज रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में गिना जाता है.
ऐसे में ट्रंप के इस अचानक बदले रुख ने सबको चौंका दिया है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि ट्रंप ने रूस और उससे तेल खरीदने वाले देशों को लेकर अपने तेवर एकदम ढीले कर लिए?
इसका सीधा जवाब शायद खुद अमेरिका के घरेलू हालातों और राजनीति में छिपा है. यह चौंकाने वाला फैसला ठीक उस वक्त आया है, जब ट्रंप ने हाल ही में रूस से डीजल मंगाने की एक बड़ी डील की है.
दरअसल, नवंबर में अमेरिका के भीतर मिड-टर्म चुनाव होने वाले हैं और ट्रंप की पूरी कोशिश है कि किसी भी तरह देश में पेट्रोल-डीजल के दाम काबू में लाए जा सकें.
खुद ट्रंप ने हाल ही में खुलकर कहा भी था, 'आम अमेरिकियों, खासकर हमारे मेहनती किसानों, पशुपालकों और ट्रक ड्राइवरों की जेब पर बोझ कम करना ही इस वक्त मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है.'
आज के समय में अमेरिका में डीजल की आसमान छूती कीमतें वहां की सरकार के लिए सिरदर्द बन चुकी हैं. डीजल महंगा होने से माल ढुलाई और खेती-किसानी का खर्च बहुत बढ़ गया है, जिसकी सीधी मार आम जनता पर पड़ रही है और खाने-पीने की चीजें लगातार महंगी होती जा रही हैं.

खाली हो रहा अमेरिका का तेल भंडार?
एमके ग्लोबल की चीफ इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा का मानना है कि इस छूट के पीछे असली मकसद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को बेलगाम होने से रोकना है.
उनका कहना है, 'अमेरिका बिल्कुल नहीं चाहता कि रूसी तेल अचानक बाजार से गायब हो जाए. अगर ऐसा हुआ, तो चुनाव के मुहाने पर खड़े अमेरिका समेत पूरी दुनिया में तेल के दाम बेकाबू हो जाएंगे और ट्रंप के लिए यह एक बड़ा सियासी नुकसान साबित हो सकता है.'
ट्रंप के सामने चुनौती सिर्फ डीजल की महंगाई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका का अपना तेल भंडार (पेट्रोलियम स्टॉक) भी बहुत तेजी से खाली हो रहा है.
'एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन' के आंकड़े बताते हैं कि 9 अक्टूबर 2026 को अमेरिका का यह स्टॉक घटकर महज 1.51 अरब बैरल रह गया था. जबकि साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान यही भंडार 2.11 अरब बैरल के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर था. साल 2003 के बाद से अमेरिकी तेल भंडार का यह अब तक का सबसे निचला स्तर है.
भंडार खाली होने का सीधा मतलब यह है कि ग्लोबल मार्केट में जरा सा भी उतार-चढ़ाव आया, तो अमेरिका खुद को संभाल नहीं पाएगा. अगर दुनिया में तेल की सप्लाई में थोड़ी भी रुकावट आई, तो अमेरिकी बाजारों में डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतें रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं.

संकट में फंसे रूस के लिए बड़ी संजीवनी
अमेरिका की यह छूट यूक्रेन युद्ध की मार झेल रहे रूस के ऑयल सेक्टर के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है.
कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अगस्त में रूस का तेल निर्यात घटकर सिर्फ 64 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो 2018 के बाद का सबसे खराब आंकड़ा है. ऊपर से यूक्रेन की सेना जिस तरह रूस के एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रही है, उससे वहां की रिफाइनरियों का कामकाज पिछले 20 सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है.
सिर्फ एक महीने के भीतर ही रूस के कुल तेल निर्यात में रोजाना 4.10 लाख बैरल की बड़ी गिरावट आई है. साल 2022 से शुरू हुई इस जंग की वजह से रूस को अब तक तेल के कारोबार में लगभग 200 अरब डॉलर से ज्यादा का तगड़ा नुकसान हो चुका है.

भारत को मिली यह राहत कब तक?
चुनावी फायदे के लिए ट्रंप की इस व्यावहारिक नीति ने भारत को कुछ समय के लिए बड़ी राहत तो दे दी है, लेकिन जानकारों का कहना है कि यह राहत बहुत लंबी नहीं चलने वाली. चुनाव खत्म होते ही अमेरिका का रुख फिर से बदल सकता है.
माधवी अरोड़ा चेताते हुए कहती हैं, 'भले ही अभी भारत के लिए यह बहुत अच्छी खबर है, लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिए कि रूस को लेकर ट्रंप का रवैया पल-पल बदलता रहता है. इसके अलावा, अपने पिछले कार्यकाल में भारत के प्रति भी उनका रुख बहुत दोस्ताना नहीं रहा था. इसलिए मानकर चलिए कि मिड-टर्म चुनाव बीतते ही इस मामले में अमेरिका दोबारा सख्त फैसले ले सकता है.'
फिलहाल तो ट्रंप का एकमात्र और सबसे बड़ा लक्ष्य साफ है- अमेरिकी जनता को सस्ती दरों पर डीजल-पेट्रोल देना. महंगाई के डर, खाली होते तेल भंडारों और सिर पर आ चुके चुनावों के बीच, रूस या उसके खरीदारों पर कड़े तेवर दिखाने से कहीं ज्यादा जरूरी ट्रंप के लिए अपनी सत्ता बचाना और तेल की निर्बाध सप्लाई बनाए रखना बन गया है.
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