- कई देशों ने अमेरिका में रखे अपने सोने के भंडार को वापस मंगाने या चर्चा में लाने का निर्णय लिया
- नॉर्वे का सॉवरेन वेल्थ फंड अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट में अपनी हिस्सेदारी घटाने की योजना बना रहा है
- यूरोपीय संघ अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए क्लाउड नियम बना रहा है
अमेरिका से लगातार कई देश सोना निकाल रहे हैं. यही नहीं हथियार खरीदने और छात्रों को भेजने के मामले में भी अमेरिका अब पहली पसंद नहीं रह गया है. कभी अपना सोना सुरक्षित रखने के लिए सभी देश अमेरिका के सामने लाइन लगाकर खड़े रहते थे कि हमारा सोना रख लो. ऐसी ही हालत अमेरिकी हथियारों की थी. हर देश की यही तमन्ना होती थी कि अमेरिका के बनाए हथियार उसे मिल जाए. बस, उसके बाद किसी की हिम्मत नहीं होगी उसकी सीमा की तरफ देखने की.
किस-किस ने सोना निकाला
यही हाल अमेरिकी विश्वविद्यालयों का था. दुनिया का हर स्टूडेंट का सपना होता था कि उसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों में एडमिशन मिल जाए. यही नहीं अमेरिका घूमने और देखने की चाहत पूरी दुनिया के लोगों में हुआ करती थी. मगर अब ऐसा नहीं है. अमेरिका से दूर जाने की ये छोटी-छोटी कोशिशें भी अमेरिका के लिए बड़ा झटका हैं, जिन्होंने दशकों से अमेरिकी आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत को बनाए रखने में मदद की है. नीदरलैंड ने पिछले हफ्तें अमेरिका और कनाडा से 86 टन सोना वापस मंगा लिया. उन्होंने ऐसा बहुत ज्यादा सिस्टम से जुड़े जोखिमों से बचने के लिए किया. फ्रांस पहले ही अपना सारा सोना न्यूयॉर्क से हटा चुका है, जर्मनी, इटली और स्पेन में इस बात को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है कि क्या अपने सोने के भंडार को अमेरिका में ही रखा जाए.
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ट्रेजरी मार्केट से फंड भी निकाल रहे
नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड ने ट्रेजरी मार्केट में अस्थिरता के बीच अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी कम करने की योजना की घोषणा की. सॉवरेन वेल्थ फंड दुनिया का सबसे बड़ा फंड है. फाइनेंस के अलावा, यूरोपीय देश अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के और भी तरीके ढूंढ रहे हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हथियारों के मामले में यूरोप अमेरिकी हथियारों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ज्यादातर उपकरण स्थानीय स्तर पर हासिल करने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिकी तकनीक से भी बना रहे दूरी
रॉयटर्स ने यह भी बताया कि टेक्नोलॉजी के मामले में, EU ने इस गर्मी में अमेरिकी कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम करने की योजना बनाई है. इसके तहत ऐसे क्लाउड नियम बनाए जा रहे हैं जो Amazon, Google और Microsoft को संवेदनशील कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए मुकाबला करने से रोकेंगे. दुनिया भर के लोग भी अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से देख रहे हैं. हाल के एडमिशन साइकल में अमेरिकी कॉलेजों में इंटरनेशनल एप्लीकेशंस में 10% की गिरावट आई है. इंटरनेशनल स्टूडेंट वीजा से जुड़े कड़े नियमों और ट्रंप प्रशासन के व्यापक इमिग्रेशन रुख का इस पर काफी असर पड़ा है.
अमेरिकी टूरिज्म में भी गिरावट
लंबे समय से सहयोगी रहे देशों के साथ रिश्ते तनावपूर्ण होने के कारण, 2025 में अमेरिका की इंटरनेशनल यात्राओं में 5.5% की गिरावट आई, जो महामारी के बाद पहली ऐसी गिरावट थी. पिछले साल कनाडा से होने वाली यात्राओं में 25% की कमी आई और यह गिरावट 2026 की शुरुआत तक जारी रही. ट्रंप के कार्यकाल की शुरुआत के बाद से जर्मनी से अमेरिका की यात्राओं में 25% की गिरावट आई है, और देश के ट्रैवल एसोसिएशन ने इसके लिए राजनीति को एक वजह बताया है. हाल ही में हुई 'प्यू' (Pew) की एक स्टडी से पता चलता है कि पश्चिमी देशों में अमेरिका की साख को काफी नुकसान पहुंचा है.
अमेरिका के दोस्त भी दोस्त नहीं मान रहे
सर्वे में शामिल 10 देशों में से सिर्फ हंगरी और पोलैंड ही ऐसे देश हैं, जहां ज्यादातर लोग अभी भी अमेरिका को एक भरोसेमंद साथी मानते हैं. इन सभी 10 देशों में (जिनमें दक्षिणपंथी लोकलुभावन नेताओं वाले दो देश भी शामिल हैं) ज्यादातर लोगों का मानना है कि उन्हें ट्रंप पर भरोसा नहीं है कि वे वैश्विक मामलों में सही फैसले लेंगे. इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका के साथ साझेदारी पूरी तरह खत्म हो रही है. अब भी अमेरिकी डॉलर का दबदबा बना हुआ है, सहयोगी देश अमेरिकी सैन्य ताकत पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अमेरिका अब भी सबसे पसंदीदा जगह बना हुआ है. मगर ये धीरे-धीरे चमक खो रहा है.
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