ये लोग इजरायल की चुनावों में वोट डालते हैं. वे सांसदों को चुनते हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह तय करने में भी उनकी अहम भूमिका रही है. इसके बावजूद उनका प्रतिनिधित्व करने वालीं अरब पार्टियां इजरायल के इतिहास के ज्यादातर समय सत्ता से दूर रही हैं. लेकिन अब यह स्थिति फिर बदल सकती है. यह कहानी है इजरायल में रहने वाले उन फिलिस्तीनी नागरिकों की जिन्हें अपने ही देश में कानूनन भेदभाव का शिकार होना पड़ता है, आलोचकों का मानना है कि उन्हें दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा दर्जा दिया गया है.
अक्टूबर 2026 के चुनाव में न तो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को और न ही विपक्ष को साफ बहुमत मिला है. ऐसे में अगली सरकार कौन बनाएगा, यह तय करने की जिम्मेदारी अरब पार्टियों पर आ गई है. वह किंगमेकर बनती दिख रही है. लेकिन यह कहानी सिर्फ एक चुनाव के आंकड़ों से कहीं बड़ी है. यह कई दशकों से चली आ रही उस बहस का हिस्सा है, जिसमें फिलिस्तीनी पहचान, समान नागरिक अधिकार और इस सवाल पर चर्चा होती रही है कि क्या फिलिस्तीनी नागरिक ऐसे देश में असली ताकत हासिल कर सकते हैं, जो खुद को यहूदी देश मानता है.
ये अरब पार्टियां किसका प्रतिनिधित्व करती हैं?
इजरायल की अरब पार्टियां आम तौर पर इजरायल के फिलिस्तीनी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करती हैं. देश की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी करीब 20% है. इनमें से बहुत से लोग उन फिलिस्तीनियों के वंशज हैं, जो 1948 के अरब-इजरायल युद्ध और इजरायल के गठन के बाद देश की सीमाओं के अंदर ही रह गए थे. ये लोग कब्जे वाले वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में रहने वाले फिलिस्तीनियों से अलग हैं. वेस्ट बैंक और गाजा के फिलिस्तीनियों को इजरायल के राष्ट्रीय चुनावों में वोट देने की अनुमति नहीं है.
इस समुदाय में मुस्लिम (आबादी के लगभग 18 प्रतिशत), ईसाई और ड्रूज शामिल हैं. हालांकि, ड्रूज समुदाय की अपनी अलग राजनीतिक स्थिति है और उनमें से कई लंबे समय से यहूदियों के नेतृत्व वाली पार्टियों का समर्थन करते रहे हैं. इस समुदाय के सभी लोगों की राय एक जैसी नहीं है. कुछ पार्टियां फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद की बात करती हैं और चाहती हैं कि अरब नागरिकों को एक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता दी जाए. कुछ पार्टियां धर्म पर आधारित हैं. वहीं, कुछ पार्टियां नागरिक अधिकारों, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए अरब और यहूदियों के बीच सहयोग की बात करती हैं.
कैसे बदली अरब इजरायलियों की राजनीति
इजरायल के शुरुआती कुछ दशकों में अरब नागरिकों का प्रतिनिधित्व अक्सर उन चुनावी लिस्ट के जरिए होता था, जो डेविड बेन-गुरियन की प्रमुख पार्टी मापाई से जुड़ी थीं. अरब नागरिकों पर 1966 तक सैन्य शासन लागू था. उनके आने-जाने पर पाबंदियां थीं. इन चुनावी लिस्ट ने संसद में सीटें तो जीतीं, लेकिन जिन यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियों के समर्थन से वे बनी थीं, उनसे उन्हें ज्यादा स्वतंत्रता नहीं थी. एक दूसरी राजनीतिक परंपरा इजरायल की कम्युनिस्ट पार्टी थी. इसने भेदभाव के खिलाफ, समाजवाद और फिलिस्तीनी अधिकारों के लिए अरब और यहूदी कार्यकर्ताओं को एक साथ लाया.
बाद में इस आंदोलन में फूट पड़ गई. इसके बाद न्यू कम्युनिस्ट लिस्ट यानी राकाह अरब मतदाताओं के बीच एक बड़ी ताकत बन गई. 1977 में राकाह ने हदाश की स्थापना में मदद की. हदाश का पूरा नाम डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर पीस एंड इक्वालिटी है. यह आज भी अरब और यहूदियों का एक बड़ा गठबंधन है.
इस्लामी आंदोलन से आगे चलकर यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी 'राआम' का जन्म हुआ. इस पार्टी ने धार्मिक पहचान, सामाजिक मुद्दों और अरब समुदायों के लिए व्यावहारिक लाभ हासिल करने पर ध्यान दिया. इन अलग-अलग विचारों का असर आज भी दिखता है. हर पार्टी का गठबंधन बनाने, फिलिस्तीनी देश के गठन और यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ सहयोग को लेकर अपना अलग नजरिया है.
नोट- इस बार के चुनाव में 'राआम' के अभी लगभग 7 सीटें जीतने का अनुमान है. वहीं जॉइंट लिस्ट के 12 सीटें जीतने का अनुमान है.
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इंतिफादा और अक्टूबर 2000
इंतिफादा मतलब विद्रोह. पहली इंतिफादा दिसंबर 1987 में वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में शुरू हुई थी. यह एक बड़ा मोड़ साबित हुई. इजरायल के फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पहचान और कब्जे वाले इलाकों में रहने वाले फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता घरेलू राजनीति के सबसे अहम मुद्दे बन गए. इससे उन स्वतंत्र अरब संगठनों का महत्व भी बढ़ा, जो पहले यहूदी पार्टियों पर निर्भर रहने वाली चुनावी लिस्ट के मुकाबले अपनी अलग पहचान बना रहे थे.
अरब नागरिकों के सामने एक मुश्किल स्थिति थी. वे इजरायल के नागरिक थे. वे वोट दे सकते थे. लेकिन उनमें से कई फिलिस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे. इस आंदोलन को लेकर अरब नागरिकों की कोई एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं थी. इससे उन लोगों के बीच दूरी बढ़ गई, जो फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद का समर्थन करते थे, जो अरब-यहूदी साझेदारी के पक्ष में थे और जो इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था के अंदर रहकर बदलाव चाहते थे. 1990 के दशक में ओस्लो शांति प्रक्रिया से इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष खत्म होने की उम्मीद बढ़ी थी. लेकिन इससे कई अरब नागरिक इजरायल के भीतर अपनी स्थिति को लेकर और ज्यादा असंतुष्ट भी हुए.
दूसरी इंतिफादा सितंबर 2000 में शुरू हुई. इससे इजरायल और उसके अरब नागरिकों के बीच संबंधों को और बड़ा झटका लगा. अक्टूबर की शुरुआत तक विरोध प्रदर्शन अरब शहरों और गांवों तक फैल गए. प्रदर्शनकारी कब्जे वाले इलाकों में रहने वाले फिलिस्तीनियों के समर्थन में उतर आए. इजरायली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा की. इसमें 13 अरब नागरिक मारे गए. कई लोगों के लिए इन मौतों ने यह साफ कर दिया कि ऐसे देश में एकीकरण की कितनी सीमाएं हैं, जहां उनके साथ उनके मुताबिक समान व्यवहार नहीं किया जाता.

3 अक्टूबर 2026 को अर्राबा में दूसरे इंतिफादा की 26वीं बरसी पर मार्च करते अरब-इजरायली (AFP)
पुलिस और सरकार पर उनका भरोसा और कम हो गया. यहां तक कि मतदान के तरीके भी बदल गए. इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के मुताबिक, अरब नागरिकों के मतदान में भारी गिरावट आई. 2003 से 2013 के बीच हुए चार चुनावों में अरब नागरिकों का औसत मतदान करीब 57% रहा. वहीं, पूरे देश में औसत मतदान 66% था. चुनावों के बहिष्कार की मांग भी तेजी से बढ़ी. इसके पीछे सरकार की नीतियों को लेकर गुस्सा और अरब प्रतिनिधित्व के कमजोर होने की भावना थी.
फिर आई जॉइंट लिस्ट और उठा सत्ता का सवाल
2015 के चुनाव से पहले जॉइंट लिस्ट बनाई गई. अरब पार्टियों को एकजुट करने की जरूरत के कारण यह गठबंधन बना. इसमें हदाश, बलाद, ता'ल और 'राआम' शामिल हुईं. इन पार्टियों के बीच राष्ट्रवाद, धर्म और यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ संबंधों को लेकर मतभेद थे. इसके बावजूद वे एक साझा एजेंडे पर साथ आईं.
2015 में इस गठबंधन ने 13 सीटें जीतीं. मार्च 2020 में चारों पार्टियां फिर एक साथ चुनाव लड़ीं. उन्होंने रिकॉर्ड 15 सीटें जीतीं और संसद में तीसरा सबसे बड़ा दल बन गईं. लेकिन सिर्फ सीटें जीतने का मतलब सत्ता हासिल करना नहीं था. 2020 में जॉइंट लिस्ट ने राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन से सिफारिश की कि वे बेनी गैंट्ज को सरकार बनाने का मौका दें. अरब सांसदों के समर्थन पर निर्भर रहने का यह फैसला राजनीतिक रूप से विवादित था. लेकिन इस कोशिश से वैकल्पिक सरकार नहीं बन पाई. इस घटना ने एक पुरानी समस्या को फिर सामने ला दिया. अरब पार्टियां सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती थीं, लेकिन यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियां उन्हें हमेशा एक वैध और स्वीकार्य सहयोगी नहीं मानती थीं.
सरकार में शामिल हुई अरब पार्टी
2021 में मंसूर अब्बास की पार्टी 'राआम' जॉइंट लिस्ट से अलग हो गई और उसने ज्यादा व्यावहारिक राजनीति अपनाई. अब्बास का कहना था कि अरब नागरिकों के लिए हमेशा विपक्ष में बैठने के बजाय फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल होना ज्यादा फायदेमंद होगा. 'राआम' ने नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होकर सरकार बनाई. कई दशकों में यह पहली स्वतंत्र अरब पार्टी थी, जो इजरायल की सरकार में शामिल हुई.
पार्टी ने अरब समुदायों में अपराध और हिंसा से निपटने, आवास और जमीन के इस्तेमाल की योजना से जुड़ी समस्याओं, सरकारी नीतियों में बदलाव और इन समुदायों को पैसा दिलाने के लिए अभियान चलाया. उसने सार्वजनिक सेवाओं तक असमान पहुंच के मुद्दे भी उठाए. आलोचकों को डर था कि इजरायल के यहूदी चरित्र को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध सरकार में शामिल होने से फिलिस्तीनियों के राष्ट्रीय अधिकारों से समझौता हो सकता है.
वैसे 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में दक्षिणी इजरायल पर हुए हमले ने देश को पूरी तरह बदल दिया. इजरायली आंकड़ों के मुताबिक, इस हमले में करीब 1,200 लोग मारे गए और 251 लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले जाया गया. इसके जवाब में इजरायल ने सैन्य अभियान शुरू किया. इस अभियान ने गाजा के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया, सैकड़ों फिलिस्तीनियों की जान ले ली और वहां गंभीर मानवीय संकट पैदा कर दिया. इसके बाद का समय अरब नागरिकों के लिए खास तौर पर मुश्किल रहा. वे एक ऐसे देश में रह रहे थे, जो इस हमले से सदमे में था. वहीं, उनमें से कई लोग गाजा में फिलिस्तीनियों के दर्द से भी खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहे थे.
उनके प्रतिनिधियों के सामने एक मुश्किल स्थिति थी. उन्हें इजरायल के लोगों के दुख और डर, युद्ध को लेकर गुस्से और फिलिस्तीनियों के साथ हो रहे बर्ताव की चिंता के बीच संतुलन बनाना था. अपनी बात रखने की आजादी भी कम हो गई थी. अरब नागरिकों और कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक बयान देने और फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए निशाना बनाया जाने लगा.
हाशिए से सत्ता की चाबी तक?
किसी को सरकार बनाने के लिए 61 सीटें मिलती नहीं दिख रही हैं और ऐसे में अरब पार्टियां किंगमेकर बन जाएंगी. क्या नेतन्याहू का गठबंधन या मुख्य प्रतिद्वंद्वी, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट का विपक्षी गठबंधन उनके साथ हाथ मिलाएगा? अब सब कुछ इस बात पर है कि भविष्य का प्रधानमंत्री क्या अरब नेताओं को बराबर का साझेदार मानता है या सिर्फ मजबूरी में उनका वोट लेता है. इससे ही तय होगा कि इजरायल में अरबों की भागीदारी सिर्फ सीटों तक रहेगी या सच में सत्ता में बदलेगी.
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