- जापान में ऑस्ट्रेलिया के नए राजदूत एंड्रयू शीरर ने इंडो-पैसिफिक सुरक्षा सहयोग फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा है
- चीन इसे अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा गठबंधन का पूरक और कोल्ड वॉर जैसी पुरानी गुटबाजी की सोच मानता है
- चीन का कहना है कि क्षेत्रीय देश किसी एक देश के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करेंगे और टकराव की कीमत नहीं चुकाएंगे
जापान में ऑस्ट्रेलिया के नए राजदूत एंड्रयू शीरर ने ऐसा तीर छोड़ा है, जो चीन को बहुत तेज चुभा है. खास बात ये है कि शिरर पहले ऑस्ट्रेलिया के नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर रह चुके हैं और ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा रणनीति बनाने में उनकी अहम भूमिका रही है. इसलिए, उनकी बातें सिर्फ एक राजनयिक की निजी राय नहीं मानी जा सकती है. यही वजह है कि चीन उनके फेंके तीर का आकलन करने में जुट गया है कि ये कितना खतरनाक है.
चीन की परेशानी को ग्लोबल टाइम्स के लेख से समझा जा सकता है. ग्लोबल टाइम्स लिखता है, 'जापान में ऑस्ट्रेलिया के नए राजदूत एंड्रयू शीरर ने टोक्यो के साथ संबंध संभालने से कहीं बड़ा काम अपने हाथ में लिया है. वे चीन का मुकाबला करने के लिए एक नए "इंडो-पैसिफिक" नेटवर्क का प्रस्ताव रखने में जुटे हैं. ये एक कोरी कल्पना है.'
क्या है 'इंडो-पैसिफिक प्लान'
निक्केई एशिया ने बुधवार को रिपोर्ट दी कि शीरर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में समुद्री सुरक्षा और जरूरी मिनरल सप्लाई चेन को शामिल करते हुए एक "इंडो-पैसिफिक" सुरक्षा सहयोग फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा है. इसका मकसद इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए एशिया की अन्य मध्यम शक्तियों को साथ लाना है. इसे क्षेत्रीय मध्यम शक्तियों को एकजुट करने की एक नई पहल के तौर पर पेश किया गया है. इसमें ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत और दक्षिण कोरिया, वियतनाम को एकजुट ताकत बनाने पर जोर दिया गया है. उनका मानना है कि ये चारों मध्यम शक्तियां अगर एक गुट बना लें तो इंडो पैसिफिक में कोई भी देश हावी नहीं हो पाएगा. ये गुट डिफेंस पैक्ट सा होगा.
चीन क्यों मान रहा इसे खतरा
मगर चीन का मानना है कि असल में शीरर का प्रस्ताव चीन को रोकने के मकसद से बने अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा गठबंधन सिस्टम के लिए एक पूरक बैकअप ढांचा है. यह कोल्ड वॉर के दौर की पुरानी और दोबारा इस्तेमाल की गई गुटबाजी वाली सोच है, जिसे एक नए क्षेत्रीय विजन के तौर पर पेश किया जा रहा है. ईस्ट चाइना नॉर्मल यूनिवर्सिटी में ऑस्ट्रेलियन स्टडीज सेंटर के डायरेक्टर चेन होंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि यह प्रस्ताव चीन को रोकने के लिए "समान सोच" के आधार पर एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में कुछ देशों के बीच तंत्र बनाने की अमेरिकी सोच के अनुरूप है. चेन ने कहा, "फर्क यह है कि अब अमेरिका के सीधे तौर पर अगुवाई करने के बजाय ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के दूसरे सहयोगी देश तालमेल बिठाने की ज्यादा जिम्मेदारी लेंगे. इससे अमेरिका का गठबंधन सिस्टम और मजबूत होगा, जिसमें अमेरिका को हर समय मौजूद रहने की जरूरत नहीं होगी." हालांकि, उन्होंने इसमें भारत का नाम नहीं लिया.
क्या चीन का दावा सही
चीन का मानना है कि जापान, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देश दुनिया में किसी एक देश का वर्चस्व नहीं चाहते. वो खुद के फैसले लेना चाहते हैं. मगर इसकी कीमत वो किसी दूसरी शक्ति से टकराव मोल लेकर नहीं चुकाएंगे. इसलिए चीन का मानना है कि ये कोरी कल्पना है. हां, राजदूत के इस प्लान को चीन ने इंडो पैसिफिक में अमेरिका के कमजोर होने की मुनादी जरूर मान ली है. अब देखना ये है कि क्वाड से इतर क्या ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत, वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे देश क्या कोई अलग गुट बनाने पर इस विचार को और बढ़ाएंगे या मौजूदा समय में ये कोरी कल्पना ही है.
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