- अमेरिकी सेना की 82nd एयरबोर्न डिवीजन पैराशूट असॉल्ट के लिए ट्रेन स्पेशल फोर्स है
- यह यूनिट युद्ध के दौरान दुश्मन के अहम ठिकानों पर कब्जा कर मुख्य सेना के लिए सुरक्षित रास्ता बनाती है
- यह फोर्स बिना किसी एयरबेस या बंदरगाह की जरूरत के आसमान से उतरकर तेजी से कार्रवाई करने में सक्षम है
मिडिल ईस्ट में तीन हफ्तों से ज्यादा दिनों से चल रही जंग अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है. एक तरफ अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर हमला कर रहे हैं. वहीं ईरान भी पूरी ताकत से मुंहतोड़ जवाब दे रहा है. युद्ध की आग के बीच खबरें आ रही हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी सबसे भरोसेमंद और घातक सैन्य यूनिट को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, पेंटागन ने 82nd एयरबोर्न डिवीजन के करीब 3,000 सैनिकों को तैनात करने का आदेश जारी कर दिया है. ये सैनिक अमेरिका की 'इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स' यानी IRF का हिस्सा हैं. यह वो फोर्स जो दुनिया के किसी भी कोने में 18 घंटे के अंदर पहुंच सकती है. लेकिन सवाल यह है कि हजारों मील दूर बैठे अमेरिका के लिए यह फोर्स इतनी अहम क्यों है? आइए समझते हैं इस डिवीजन की ताकत, इसके काम करने का तरीका और इसका अब तक का खतरनाक इतिहास.
क्या है 82nd एयरबोर्न डिवीजन?
अमेरिकी सेना की 82nd एयरबोर्न डिवीजन एक इन्फैंट्री यानी पैदल सेना है. ये कोई साधारण सैनिक नहीं हैं. ये सेना पैराशूट असॉल्ट यानी हवा से जमीन पर हमला के लिए जानी जाती है। इन्हें 'ऑल अमेरिकन' (AA) के नाम से भी जाना जाता है. यह आसमान से दुश्मन की लाइन में घुसकर हमला करने में माहिर है. यहां सामान्य सैनिकों को बंदरगाहों, हवाई अड्डों या सड़कों की जरूरत पड़ती है, वहीं 82nd एयरबोर्न को सिर्फ हवा चाहिए. वो सी-17 ग्लोबमास्टर या सी-130 हरक्यूलिस विमानों से हजारों फीट ऊपर से कूदते हैं, पैराशूट खोलते हैं और जमीन पर उतरकर टारगेट तक पहुंचते हैं.
इस यूनिट की सबसे बड़ी खासियत इनकी क्विक रिएक्शन क्षमता है. यह अमेरिकी सेना की इमीडिएट रिस्पांस फोर्स (IRF) का मुख्य हिस्सा हैं. इसका मतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति या रक्षा मंत्रालय से आदेश मिलने के महज 18 घंटे के भीतर ये सैनिक दुनिया के किसी भी कोने में तैनात होकर युद्ध लड़ने के लिए तैयार हो सकते हैं. इनके पास बेहद एडवांस्ड और हल्के हथियार होते हैं, जो इन्हें तेजी से मूव करने में मदद करते हैं. इन्हें आमतौर पर दुश्मन के अहम ठिकानों, जैसे एयरफील्ड, संचार केंद्रों और सप्लाई चेन पर कब्जा करने के लिए भेजा जाता है. इसके बाद ये पीछे से आ रही मुख्य अमेरिकी सेना और भारी हथियारों के लिए सुरक्षित रास्ता बनाते हैं.

82nd Airborne Division
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कब-कब दुनिया ने देखा है इनका दम?
अमेरिका की इस एलीट फोर्स का इतिहास गजब का रहा है. जब-जब अमेरिका को सबसे मुश्किल मोर्चों पर जीत की जरूरत पड़ी है, उसने 82nd एयरबोर्न को ही आगे किया है. 82nd एयरबोर्न की कहानी 1917 से शुरू होती है, लेकिन असली पहचान 1942 में एयरबोर्न डिवीजन बनने के बाद बनी.
> द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर की सेना को दिया चकमा: 1944 में हिटलर की नाजी सेना के पीछे कूदकर फ्रांस को आजाद कराने में इनका सबसे यादगार रोल था. 6 जून 1944 को समुद्र से उतरने वाली सेना से 5 घंटे पहले 12 हजार पैराट्रूपर्स ने नॉर्मंडी के पीछे दुश्मन लाइनों में छापा मारा. उनका काम था, पुलों और सड़कें कब्जा करना, ताकि मुख्य सेना अंदर आ सके. 33 दिन बिना राहत के लड़ाई लड़ी. लाखों जिंदगियां बचाईं और यूरोप की आजादी की नींव रखी.
> सद्दाम हुसैन के खिलाफ ऑपरेशन: 1991 के खाड़ी युद्ध और फिर 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के दौरान, एयरबोर्न डिवीजन ने सद्दाम हुसैन की सेना के दांत खट्टे किए थे. इराक के भीतर तेजी से घुसपैठ करने और प्रमुख शहरों पर कंट्रोल करने में इन्होंने फ्रंटलाइन पर लीड किया था. 100 घंटे की ग्राउंड वॉर में इनकी तेजी ने पूरा खेल पलट दिया.
> काबुल का रेस्क्यू ऑपरेशन: इसके अलावा अगस्त 2021 में जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस लौट रही थी और तालिबान तेजी से पूरे देश पर कब्जा कर रहा था, तब काबुल में भारी अफरातफरी मच गई थी. उस मुश्किल वक्त में हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सुरक्षित रखने, वहां से हजारों नागरिकों को निकालने और रेस्क्यू ऑपरेशन को कवर देने का सबसे जोखिम भरा जिम्मा इसी 82nd एयरबोर्न डिवीजन ने उठाया था.

आखिर क्यों हैं ये दुनिया के किसी भी कोने में घुसने में माहिर'?
क्योंकि 82nd एयरबोर्न पारंपरिक नियम नहीं मानती. इनके लिए ना किसी बंदरगाह की जरूरत ना ही किसी एयरबेस की. ये आसमान से उतरकर दुश्मन को चौंका देते हैं. ट्रेनिंग इतनी कड़ी कि हर पैराट्रूपर रात के अंधेरे में भी सटीक लैंडिंग कर सकता है. उनके पास सबसे एडवांस्ड पैराशूट, नाइट विजन, ड्रोन और प्रिसीजन वीपन हैं. ये यूनिट न सिर्फ लड़ती है, बल्कि लड़ाई की शुरुआत ही तय कर देती है. अगर अमेरिका मिडिल ईस्ट युद्ध में 82nd एयरबोर्न के सैनिकों को उतारती है, तो इसका क्या अंजाम होगा? ये तो वक्त ही बताएगा.
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