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ड्रोन युद्ध का नया दौर ! लेजर और माइक्रोवेव से दुश्मन के UAV गिराने निकला अमेरिका, भारत भी रेस में

रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-अमेरिका तनाव और ऑपरेशन सिंदूर के बाद एंटी-ड्रोन तकनीक पर दुनिया का फोकस बढ़ा है. अमेरिकी सेना लेजर और माइक्रोवेव हथियारों का बड़ा परीक्षण करने जा रही है. जानिए यह तकनीक कैसे काम करती है और भारत D4 जैसे सिस्टम के साथ इस रेस में कहां खड़ा है.

ड्रोन युद्ध का नया दौर ! लेजर और माइक्रोवेव से दुश्मन के UAV गिराने निकला अमेरिका, भारत भी रेस में
AI की सहायता से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर

रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका तनाव हो या भारत का 'ऑपरेशन सिंदूर', हाल के दिनों में एक बात साफ हुई है कि युद्ध के मैदान में ड्रोन सबसे बड़े गेमचेंजर बनकर उभरे हैं. इसी बदलती तस्वीर के बीच अमेरिकी सेना दुश्मन के ड्रोन को लेजर और माइक्रोवेव हथियारों से हवा में ही मार गिराने की तैयारी शुरू कर रही है. अमेरिका अगले एक साल तक हाई-एनर्जी लेजर और हाई-पावर माइक्रोवेव सिस्टम का बड़ा ऑपरेशनल परीक्षण करने जा रहा है, ताकि यह देखा जा सके कि क्या भविष्य के युद्धों में इन तकनीकों के भरोसे ड्रोन हमलों को रोका जा सकता है. यह खबर भारत के लिए भी अहम है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों से निपटने की अपनी क्षमता दिखाई थी. वहीं पाकिस्तान की तरफ से पंजाब, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान सेक्टर में ड्रोन के जरिए हथियार, नशा और खुफिया गतिविधियों की लगातार कोशिशों ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है. ऐसे में सवाल यह है कि अमेरिका किस तकनीक पर काम कर रहा है और एंटी-ड्रोन तकनीक की इस वैश्विक दौड़ में भारत कहां खड़ा है?

क्या करने जा रही है अमेरिकी सेना?

अमेरिकी सेना की जॉइंट इंटरएजेंसी टास्क फोर्स-401 हाई-एनर्जी लेजर और हाई-पावर माइक्रोवेव तकनीकों का बड़े पैमाने पर परीक्षण करने जा रही है. इन सिस्टमों को अलग-अलग सैन्य ठिकानों पर लगाया जाएगा और सैनिक करीब एक साल तक इन्हें वास्तविक परिस्थितियों में चलाकर देखेंगे. मकसद सिर्फ ड्रोन गिराना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि लंबे समय तक इन सिस्टमों का प्रदर्शन कैसा रहता है, इन पर कितना खर्च आता है और सैन्य अभियानों के दौरान इनका इस्तेमाल कितना आसान है. अमेरिकी सेना यह भी जानना चाहती है कि क्या इन हथियारों का इस्तेमाल बिना हवाई क्षेत्र को बंद किए और बिना सैन्य अड्डों के रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित किए किया जा सकता है. यही वजह है कि इस परीक्षण को भविष्य की सैन्य रणनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.

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क्या दुनिया में पहली बार ऐसा हो रहा है?

इस सवाल का सीधा जवाब है नहीं. अमेरिका, इजरायल, ब्रिटेन, चीन और रूस पिछले कई वर्षों से लेजर और दूसरी डायरेक्टेड एनर्जी तकनीकों पर काम कर रहे हैं. अमेरिकी सेना पहले भी लेजर आधारित DE M-SHORAD सिस्टम और हाई-पावर माइक्रोवेव हथियारों का सफल परीक्षण कर चुकी है. हाल के वर्षों में अमेरिका ने ड्रोन हमलों से निपटने के लिए कई प्रोटोटाइप सिस्टम फील्ड में उतारे हैं. लेकिन इस बार की खास बात यह है कि अमेरिकी सेना पहली बार इन तकनीकों को इतने लंबे समय तक वास्तविक सैन्य माहौल में परखना चाहती है. यानी अब फोकस लैब या सीमित परीक्षण से आगे बढ़कर रोजमर्रा के सैन्य इस्तेमाल पर है. आसान शब्दों में कहें तो अब तकनीक को लैब से निकालकर असली दुनिया में परखा जाएगा.

लेजर और माइक्रोवेव हथियार कैसे काम करते हैं?

हाई-एनर्जी लेजर किसी ड्रोन पर ऊर्जा की बेहद ताकतवर किरण छोड़ता है. इससे ड्रोन का ढांचा, सेंसर या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम क्षतिग्रस्त हो सकता है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी सटीकता है.

एक साथ कई ड्रोन गिरा सकता है माइक्रोवेव सिस्टम

हाई-पावर माइक्रोवेव तकनीक ड्रोन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को जाम या नष्ट कर सकती है. खास बात यह है कि यह एक साथ कई ड्रोन को प्रभावित कर सकती है. इसलिए ड्रोन स्वार्म यानी एक साथ आने वाले कई ड्रोन के खिलाफ इसे काफी प्रभावी माना जाता है.

दुनिया अचानक एंटी-ड्रोन तकनीक पर इतना जोर क्यों दे रही है?

रूस-यूक्रेन युद्ध ने साबित कर दिया कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़ी सैन्य ताकतों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. कुछ हजार डॉलर का ड्रोन लाखों डॉलर के टैंक, रडार या सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है. पश्चिम एशिया में भी ड्रोन और मिसाइल हमले आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं. समस्या यह है कि कई बार जिस ड्रोन को गिराने के लिए महंगी मिसाइल दागी जाती है, उसकी कीमत मिसाइल की कीमत से कई गुना कम होती है. ऐसे में सेनाएं ऐसे समाधान खोज रही हैं जिनसे कम लागत में ज्यादा ड्रोन रोके जा सकें. लेजर और माइक्रोवेव हथियार इसी वजह से चर्चा में हैं.

भारत इस रेस में कहां खड़ा है?

भारत भी एंटी-ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है. डीआरडीओ और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने मिलकर D4 यानी Drone Detect, Deter and Destroy सिस्टम विकसित किया है. यह भारत का स्वदेशी एंटी-ड्रोन सिस्टम है, जो दुश्मन ड्रोन को पहचानने, ट्रैक करने और जरूरत पड़ने पर नष्ट करने में सक्षम है

D4 सिस्टम की खासियत क्या है?

D4 सिस्टम कई स्तरों पर काम करता है. सबसे पहले रडार और सेंसर ड्रोन का पता लगाते हैं. इसके बाद RF जामिंग और GPS स्पूफिंग के जरिए ड्रोन को भटकाने की कोशिश की जाती है. अगर खतरा बना रहता है तो लेजर आधारित हार्ड-किल सिस्टम के जरिए उसे गिराया जा सकता है.रिपोर्टों के मुताबिक भारत ने 10 से 12 किलोवाट क्षमता वाले लेजर आधारित डायरेक्टेड एनर्जी सिस्टम पर भी काम किया है, जिन्हें छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है.

'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद क्यों बढ़ी इसकी अहमियत?

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने दिखाया कि आधुनिक हवाई खतरों से निपटने के लिए बहुस्तरीय रक्षा व्यवस्था कितनी जरूरी है. वहीं पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार ड्रोन गतिविधियों ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है. कई बार ड्रोन के जरिए हथियार, गोला-बारूद और नशीले पदार्थ भारतीय सीमा में भेजने की कोशिशें सामने आई हैं. यही वजह है कि भारत अब सिर्फ ड्रोन की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उन्हें कम लागत और कम समय में निष्क्रिय करने वाली तकनीकों पर भी तेजी से काम कर रहा है. एंटी-ड्रोन सिस्टम, जामर और लेजर हथियार आने वाले वर्षों में भारतीय सुरक्षा ढांचे का अहम हिस्सा बन सकते हैं.
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आने वाला वक्त ड्रोन और एंटी ड्रोन का है

ड्रोन अब सिर्फ निगरानी का उपकरण नहीं रहे. वे आधुनिक युद्ध की रणनीति का केंद्र बन चुके हैं. इसलिए आने वाले समय में हथियारों की सबसे बड़ी दौड़ टैंक, लड़ाकू विमान या मिसाइलों की नहीं, बल्कि ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीकों की हो सकती है.अमेरिका का नया परीक्षण इसी भविष्य की झलक दिखाता है. वहीं भारत भी अपने स्वदेशी D4 सिस्टम और लेजर आधारित तकनीकों के जरिए इस नई चुनौती के लिए तैयारी कर रहा है. आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि आसमान पर ज्यादा ताकत किसकी होगी, ड्रोन की या उन्हें हवा में ही खत्म कर देने वाली नई पीढ़ी की रक्षा तकनीकों की.
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