अमेरिका और ईरान के बीच जब 17 जून को MoU पर साइन हुए तो लगा कि 4 महीनों से जो जंग चल रही है, वह अब खत्म हो जाएगी. लेकिन 20 दिन बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'सीजफायर खत्म' की बात कह दी. इसके बाद अमेरिका और ईरान एक बार फिर वहीं आकर खड़े हो गए, जहां से सबकुछ शुरू हुआ था.
सीजफायर टूटने के बाद देर रात अमेरिका और ईरान के बीच जमकर बमबारी हुई. अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दावा किया कि दो दिन में उसने ईरान में 170 से ज्यादा ठिकानों पर बमबारी की. दूसरी तरफ, ईरान की IRGC ने बहरीन और कुवैत में 85 अमेरिकी ठिकानों पर हमले करने का दावा किया है.
सीजफायर टूट क्यों गया?
अमेरिकी सेना का कहना है कि ईरान पर ये हमले होर्मुज स्ट्रेट से गुजर रहे जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में किए गए हैं.
CENTCOM ने बताया कि ईरान ने तीन जहाजों- मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले M/T अल रेकय्यात, सऊदी अरब के झंडे वाले M/T वेद्यान और लाइबेरिया के झंडे वाले M/T साइप्रस प्रॉस्पेरिटी पर हमले किए थे. माना जा रहा है कि ये जहाज ओमान के तट के पास से गुजर रहे थे.
At the direction of the Commander in Chief, U.S. Central Command forces have started conducting additional strikes against Iran to further degrade their ability to threaten freedom of navigation in the Strait of Hormuz. The United States is holding Iran accountable for recent…
— U.S. Central Command (@CENTCOM) July 8, 2026
ईरान ने सभी जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से 'सुरक्षित रास्ते' के लिए अपने नक्शे का पालन करने को कहा है. इस रास्ते में जहाज ईरान के तट के बहुत करीब से गुजरते हैं और ओमान के समुद्री इलाके के एक हिस्से को 'प्रतिबंधित क्षेत्र' घोषित किया गया है.
स्थानीय मीडिया में दावा किया जा रहा है कि ईरान ने इन तीन जहाजों को दिशा बदलने की चेतावनी दी थी, जिसे उन्हें नजरअंदाज कर दिया था.
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साइन होने के बाद ट्रंप ने आदेश कैसे दिया?
अमेरिका और ईरान के बीच लंबी बातचीत के बाद 14 पॉइंट के एक MoU पर 17 जून को साइन हुए थे. इस MoU के पांचवें पॉइंट में लिखा था कि ईरान 60 दिन तक होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों को सुरक्षित तरीके से निकलने देगा और उसके बाद ईरान और ओमान मिलकर इसका मैनेजमेंट संभाल सकते हैं.
MoU के तहत, अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर पर सहमति बन गई थी. लेकिन बुधवार को ट्रंप ने साफ कर दिया कि सीजफायर 'खत्म' हो गया है.
Iran can never have a nuclear weapon. Oil is flowing. Gas prices are falling. Markets are roaring.
— The White House (@WhiteHouse) June 18, 2026
A WIN for America and the world. 🇺🇸 pic.twitter.com/5klJgQkPMV
अब ऐसे में सवाल उठता है कि ट्रंप ने ईरान पर हमले का आदेश कैसे दे दिया? दरअसल, अमेरिकी संविधान उन्हें ऐसा करने का हक देता है. संविधान का अनुच्छेद 2 राष्ट्रपति को अमेरिकी सेना का कमांडर-इन-चीफ बनाता है. यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि अगर उन्हें लगता है कि अमेरिकी सेना, दूतावास या राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है तो वह संसद की मंजूरी के बिना भी तुरंत जवाबी हमले का आदेश दे सकते हैं.
हालांकि, युद्ध के मामलों में राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने के लिए 1973 में 'वॉर पॉवर रिजॉल्यूशन' बना था. इसके तहत अमेरिकी सेना को लड़ाई में भेजने के 48 घंटे के भीतर राष्ट्रपति को संसद में बताना जरूरी है. अगर जंग 60 दिन से ज्यादा लंबी खिंचती है तो फिर संसद की मंजूरी लेनी होगी.
पिछले हफ्ते ही अमेरिकी सीनेट में युद्ध को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पास किया गया था. सीनेट में यह प्रस्ताव 50-48 वोटों से पास हो गया था. इससे पहले 3 जून को भी अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी.
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प्रस्ताव पास, फिर हमला क्यों?
अमेरिका में खुद इस जंग का विरोध हो रहा है. पिछले हफ्ते अमेरिकी सीनेटर ने संसद में कहा था कि 'ईरान में ट्रंप की ऐतिहासिक गलती की कीमत अमेरिकियों को चुकानी पड़ रही है. इसे इतिहास में अमेरिकी की अब तक की सबसे खराब विदेश नीति वाली कार्रवाइयों में से एक के तौर पर दर्ज किया जाएगा.'
अमेरिकी संसद में युद्ध रोकने के लिए भले ही प्रस्ताव पास हो चुके हों लेकिन इसे मानने के लिए ट्रंप बाध्य नहीं हैं. युद्ध खत्म करने को लेकिन सीनेट में जो प्रस्ताव पास हुआ था, उस पर व्हाइट हाउस ने कहा कि प्रस्ताव की कोई 'अहमियत' नहीं है, क्योंकि उस समय ज्यादातर रिपब्लिकन मौजूद नहीं थे.
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने मंगलवार को कहा था, 'प्रस्ताव अमेरिकी सेना को हटाने की बात कहता है. लेकिन अभी कोई लड़ाई ही नहीं चल रही है, क्योंकि सीजफायर 7 अप्रैल को हो गया था.'
हालांकि, ट्रंप ने अमेरिकी सेना को ईरान पर हमला करने का आदेश दिया. उनका कहना है कि यह होर्मुज में जहाजों पर ईरानी हमलों का जवाब है. ट्रंप ने बुधवार को ईरान को लेकर कहा कि वह 'बहुत बुरा बर्ताव' कर रहा है. उन्होंने जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले करने का आरोप लगाया था.
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फिर पीस टॉक का क्या?
17 जून को जिस MoU पर साइन हुए थे, वह अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी को खत्म करने का एक रास्ता था. इस MoU पर साइन होने के बाद ही अमेरिका और ईरान के बीच कई अहम मुद्दों को लेकर बातचीत चल रही थी.
हालांकि, जब एक बार फिर से जंग जैसे हालात बन गए हैं तो पीस टॉक के भी पटरी से उतरने का खतरा है.
ईरान के साथ बातचीत पर ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी प्रतिनिधि बातचीत जारी रख सकते हैं लेकिन इसका कोई मतलब नहीं है. ट्रंप ने बुधवार को कहा, 'वे बात कर सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये वक्त की बर्बादी है.'
.@POTUS on Iran: "They called a little while ago. They want to make a deal so badly — I just don't know if they're worthy of making a deal. I don't know that they're going to honor the deal. That's the problem." pic.twitter.com/jQTENvyRGM
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) July 9, 2026
वहीं, ईरान का कहना है कि वह किसी भी कीमत पर झुकने वाला नहीं है. ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गलिबाफ ने कहा कि 'धौंस जमाने और वसूली का दौर खत्म हो गया है. इससे कुछ हासिल नहीं होगा. हम झुकने वाले नहीं हैं.'
जानकारों का मानना है कि ट्रंप इस MoU से निकलना चाहते थे, इसलिए ईरान पर सारा ठींकरा फोड़ रहे हैं.
तेहरान यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हसन अहमदियन ने अल-जजीरा से कहा कि MoU में होर्मुज को लेकर जो व्यवस्था तय हुई थी, अमेरिका अब उससे अलग व्यवस्था चाहता है. उन्होंने कहा कि अमेरिका इस MoU से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान से शर्तों को पूरा करने की उम्मीद कर रहा है.
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