- मिडिल ईस्ट तनाव से तेल महंगा हुआ, लेकिन ऊंची ब्याज दरों की आशंका से सोना फिसल गया.
- बाजार को डर है कि जंग महंगाई बढ़ाएगी, इसलिए निवेशकों की रणनीति बदल रही है.
- भारत पर असर सिर्फ सोने तक नहीं, तेल, महंगाई और आम आदमी की जेब पर भी पड़ सकता है.
आम तौर पर जब युद्ध चल रहा होता है तो बड़े निवेशक शेयर बाजार से पैसे निकाल कर सोने में लगाने लगते हैं. यही वजह है कि हर बड़े संकट के दौरान सोने की कीमतें बढ़ती हुई दिखाई देती हैं. लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है. मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है. होर्मुज जैसे दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते पर तनाव भी गहरा गया है. कच्चे तेल की कीमतें भी चढ़ रही हैं. दुनिया में महंगाई बढ़ने की आशंका भी तेज हो गई है. यानी अनिश्चितता बेहद बढ़ गई हैं. इन सभी विकट परिस्थितियों के बावजूद सोने की कीमतें नीचे आ रही हैं. आखिर सोने की कीमतें कम क्यों हो रही हैं?
इसका जवाब केवल इस युद्ध में नहीं है बल्कि अमेरिका की फेडरल रिजर्व यानी अमेरिकी केंद्रीय बैंक की नीतियों में छिपा है.

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आखिर हुआ क्या?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए हुआ अंतरिम समझौता अब खत्म हो चुका है. इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी सेना ने कहा कि उसने ईरान के खिलाफ नए हमले शुरू किए हैं, ताकि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित न हो. इन घटनाओं के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ गई. बाजार को डर है कि अगर तनाव और बढ़ा तो तेल की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है.

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तो फिर सोना क्यों गिरा?
यही सबसे बड़ा सवाल है. सोना हमेशा सेफ हेवन के तौर पर देखा जाता है, यानी इसे सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है. जब दुनिया में संकट आता है तो निवेशक सोने की ओर भागते हैं. लेकिन इस बार बाजार सिर्फ युद्ध नहीं देख रहा, बल्कि उसके आर्थिक असर को भी समझ रहा है.
अगर तेल महंगा होगा तो दुनियाभर में महंगाई बढ़ेगी. अगर महंगाई बढ़ेगी तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रख सकता है या जरूरत पड़ने पर फिर बढ़ा भी सकता है. यहीं से सोने पर दबाव शुरू हो जाता है.

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ब्याज दर और सोने का क्या रिश्ता है?
बेशक सोने के सबसे सुरक्षित निवेश में से माना जाता हो पर यह आपके पास रखे होने से आपको ब्याज नहीं देता. वहीं अगर बैंक, सरकारी बॉन्ड या दूसरी सुरक्षित जगहों पर ज्यादा ब्याज मिलने लगे, तो कई निवेशक सोना बेचकर अपना पैसा उनमें लगाने लगते हैं. मतलब अगर ब्याज दरें ऊंची या बढ़ी हुई मिले तो बड़े निवेशक अपने शेयर और सोना बेच कर उन सुरक्षित जगहों पर लगा देते हैं. यानी ऊंची ब्याज दरें अक्सर सोने के लिए अच्छी खबर नहीं होतीं. इसी वजह से मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बावजूद सोने की कीमतों में गिरावट देखने को मिली.

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तेल का असर सिर्फ पेट्रोल तक सीमित नहीं
तेल महंगा होने का मतलब सिर्फ पेट्रोल और डीजल महंगा होना नहीं है. इसका असर ट्रांसपोर्ट, हवाई यात्रा, फैक्ट्री, बिजली, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के सामान तक पहुंचता है. यानी अगर तेल लगातार महंगा रहता है तो पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ सकती है. इसी डर ने निवेशकों की सोच बदल दी है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी बढ़ाई चिंता
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक विकास का अनुमान घटाकर 3 फीसद कर दिया है. इसका मतलब है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था के आगे बढ़ने की गति पहले की उम्मीद से मंद पर सकती है. एक तरफ जंग का खतरा है, तो दूसरी तरफ महंगाई का दबाव और तीसरी ओर धीमी होती वैश्विक अर्थव्यवस्था. यानी बाजार एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहा है.

यूएस फेडरल रिजर्व
बड़े बैंक अब क्या कह रहे हैं?
बैंक ऑफ अमेरिका ने भी 2026 के लिए सोने की औसत कीमत का अपना अनुमान 14 फीसदी घटा दिया है. बैंक का मानना है कि अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व सख्त रुख अपनाए रखता है, तो सोने में बहुत बड़ी तेजी की उम्मीद कम हो सकती है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सोना अपनी अहमियत खो देगा.

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क्या अब सोने में निवेश नहीं करना चाहिए?
भले ही इस साल रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद से सोने की कीमतों में 20 फीसद तक गिरावट आई है पर ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आपको सोने में निवेश नहीं करना चाहिए. क्योंकि सोना आज भी दुनिया का सबसे भरोसेमंद सुरक्षित निवेश माना जाता है. अमेरिकी
लेकिन अब सिर्फ जंग देखकर निवेश का फैसला लेना सही नहीं होगा.
निवेशकों को यह भी देखना होगा कि महंगाई किस दिशा में जा रही है, अमेरिकी फेडरल रिजर्व क्या फैसला लेता है, डॉलर कितना मजबूत है और तेल की कीमतें आगे क्या रुख अपनाती हैं. यानी सोने की कीमत तय करने में सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि ब्याज दर, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाते हैं.

सोना खरीदार की फाइल फोटो
भारत पर इसका क्या असर होगा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहता है, तो इसका असर भारतीय बाजार में भी दिखाई देगा. साथ ही अगर तेल महंगा होता है तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इससे महंगाई बढ़ने का खतरा भी रहेगा. यानी मिडिल ईस्ट की जंग का असर सिर्फ युद्ध वाले देशों तक सीमित नहीं है. इसकी गूंज भारत के सर्राफा बाजार से लेकर आम आदमी की जेब तक सुनाई दे सकती है.
आखिर पूरी कहानी क्या कहती है?
इस बार बाजार ने साफ संदेश दिया है. जंग बढ़ने से सिर्फ सोना नहीं चमकता. अगर उसी जंग से तेल महंगा होता है, महंगाई बढ़ती है और ब्याज दरें ऊंची रहने की आशंका बनती है, तो वही हालात सोने की कीमतों पर दबाव भी डाल सकते हैं. तो ये कह सकते हैं कि इस समय बाजार का सबसे बड़ा डर ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध नहीं, बल्कि जंग होने की सूरत में पैदा होने वाली महंगाई है और फिलहाल सोने की चाल भी उसी डर की कहानी बयां कर रही है.
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