- पाकिस्तान में 2026 के ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में देश पहले स्थान पर रहा, और 2025 में सबसे अधिक मौतें हुईं
- पंजाब प्रांत पाकिस्तान की राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य ताकत का केंद्र है, जिसके कारण अन्य प्रांत हाशिए पर हैं
- बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद गरीबी और राजनीतिक उपेक्षा का सामना कर रहा है
पाकिस्तान खुद को शांतिदूत साबित करने के लिए तुला हुआ है. ईरान-अमेरिका युद्ध में उसने इसे मौके पर लिया. ये अलग बात है कि युद्ध अब तक नहीं रुका है और दोनों ही देश पाकिस्तान को संदिग्ध नजरों से देखते हैं. मगर इससे भी ज्यादा दुख की बात पाकिस्तान की जनता के लिए ये है कि उसके हुक्मरान दूसरे देशों के युद्ध को समाप्त करने के लिए तो अपना पैसा और समय लगा रहे हैं, मगर अपने ही देश में होने वाली जंग को खत्म करने के लिए कुछ नहीं कर रहे.
पाकिस्तान की हालत खराब
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज (PICSS) की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 के ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में पाकिस्तान पहले नंबर पर रहा. अकेले 2025 में देश में 1,045 घटनाएं हुईं और 1,139 लोगों की मौत हुई, जो पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय में मौतों का सबसे बड़ा आंकड़ा है.

इस रक्तपात का एक प्रमुख कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का पुनरुत्थान है, जो 2007 में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के लिए गठित आतंकवादी नेटवर्कों का एक गठबंधन है, और इन मौतों में से आधे से अधिक के लिए वही जिम्मेदार है. 2024 में, पाकिस्तान में 521 आंतरिक हमले हुए, जिनमें 358 सुरक्षाकर्मी मारे गए. इस हिंसा का केंद्र खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान हैं. लेकिन वास्तव में इस अंतहीन अशांति को कौन सी बात हवा दे रही है?
असली वजह: "पंजाबिस्तान" का दबदबा
पाकिस्तान चार मुख्य प्रांतों से मिलकर बना है: पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (KP).हालांकि, पिछले कुछ सालों में आलोचकों और वहां के लोगों ने इस देश को "पंजाबस्तिान" कहना शुरू कर दिया है. इसकी वजह साफ है. बाकी देश पर पंजाब का पूरी तरह से दबदबा है. आप इस बात से इसका अंदाजा लगा सकते हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाद शरीफ और सेनाध्यक्ष से फील्ड मार्शल बने असीम मुनीर दोनों पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से ही हैं.
आंकड़ों पर नजर डालें
- पाकिस्तान के कुल जमीनी इलाके का लगभग 26% हिस्सा पंजाब में है, लेकिन यहां देश की 51% आबादी रहती है और यह देश की कुल GDP का 60% हिस्सा पैदा करता है. इस आर्थिक ताकत का सीधा असर राजनीतिक ताकत पर दिखता है. नेशनल असेंबली की 336 सीटों में से 173 सीटें (51.5%) अकेले पंजाब के पास हैं.
- सेना और नौकरशाही से लेकर अर्थव्यवस्था और यहां तक कि क्रिकेट टीम तक पर पंजाबियों का व्यवस्था पर भारी दबदबा है. इस केंद्रीकृत नियंत्रण ने अन्य राज्यों को गहरे हाशिए पर धकेल दिया है. संसाधनों के असमान वितरण और प्रांतीय स्वायत्तता की गंभीर कमी को लेकर देश भर में जातीय और राष्ट्रवादी विद्रोह भड़क उठे हैं. आइए, इस संकट को प्रांत दर प्रांत समझते हैं.
बलूचिस्तान: समृद्ध जमीन, गरीब लोग
- बलूचिस्तान का विवाद सबसे पुराना है. इसकी शुरुआत 1948 में हुई थी, जो पाकिस्तान बनने के ठीक एक साल बाद का विद्रोह था. बलूच लोगों का कहना था कि इस्लामाबाद ने उनकी जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया है. दशकों से वे आजादी, अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और अपनी अलग संस्कृति की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं.
- पंजाब के साथ इसकी तुलना चौंकाने वाली है. भौगोलिक रूप से, बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 44% हिस्सा है, लेकिन नेशनल असेंबली में इसे सिर्फ 20 सीटें (6%) ही मिलती हैं. यहां एक कड़वी सच्चाई यह है कि प्राकृतिक गैस, कोयला, तांबा और सोना के मामले में बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे अमीर प्रांत है. यह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का मुख्य केंद्र भी है. फिर भी, राष्ट्रीय GDP में इसका सीधा योगदान सिर्फ 5% है. इससे भी दुखदायी बात यह है कि यहां की 70% आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है, जो देश में सबसे ज्यादा है.
- वहां के लोगों का आरोप है कि विदेशी निवेश, खासकर चीन के बड़े प्रोजेक्ट, बलूचिस्तान की संपत्ति हड़पकर पंजाब के अमीर और ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाए गए हैं. इसी गुस्से की वजह से बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे उग्रवादी अलगाववादी गुट बने हैं, जिनके पास BLF, UBA और BRA के साथ मिलकर लगभग 6,000 लड़ाके हैं. यहां हिंसा चरम पर है. जुलाई 2026 में, लड़ाकों ने जियारत में एक डैम प्रोजेक्ट पर 42 लोगों (जिनमें 27 पुलिस अधिकारी शामिल थे) की हत्या कर दी. इससे पहले, मार्च 2025 में, उन्होंने एक यात्री ट्रेन को हाईजैक कर लिया था और 400 से ज्यादा लोगों को बंधक बना लिया था.

खैबर पख्तूनख्वा: आतंकवाद का मुख्य केंद्र
- अफगानिस्तान की सीमा से सटे खैबर पख्तूनख्वा (KP) में हिंसा का दौर तब शुरू हुआ जब 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद उग्रवादियों को सीमा पार भागने पर मजबूर होना पड़ा. 2021 में अफगान तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद से इस इलाके में हिंसा में तेजी आई है.
- हालांकि, पाकिस्तान की कुल आबादी का लगभग 17% और विधानसभा सीटों का 13.4% हिस्सा खैबर पख्तूनख्वा में है, फिर भी यहां के 48% लोग गरीबी में रहते हैं. यहां अशांति की मुख्य वजह इस्लामी उग्रवाद है, जिसे TTP, इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस (ISKP) और हाफिज गुल बहादुर ग्रुप जैसे संगठन बढ़ावा देते हैं.
- यह ध्यान रखना जरूरी है कि TTP, अफगान तालिबान से पूरी तरह अलग है. उनका मुख्य मकसद इस्लामाबाद को KP से बाहर करना और शरिया कानून लागू करना है. उनके हमले लगातार होते रहे हैं – इनमें दिसंबर 2025 में करक में घात लगाकर किया गया हमला भी शामिल है, जिसमें पांच पुलिस अधिकारी मारे गए थे, और नवंबर 2024 में कुर्रम जिले में हुआ एक भयानक चरमपंथी हमला भी, जिसमें 42 लोग (ज्यादातर शिया) मारे गए थे.

सिंध का जल संकट: एक आने वाली बड़ी मुसीबत
- सिंध की कहानी एक शानदार अतीत से दुखद पतन की कहानी है. प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी और अरब सागर तक पहुंच रखने वाली यह जगह, ऐतिहासिक रूप से व्यापार और खेती का एक समृद्ध केंद्र रही है. आज यहां गरीबी का स्तर 45% है.
- सिंचाई वाली खेती सिंध की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो यहां की 77% कृषि भूमि को कवर करती है. लेकिन यह प्रांत अभी पानी की भारी कमी (62%) का सामना कर रहा है. खराब प्रशासन और जर्जर बुनियादी ढांचे के कारण नहर का 40% से ज्यादा पानी रिसने और भाप बनकर उड़ने से बर्बाद हो जाता है. इसके अलावा, 78% भूजल बहुत खारा है, जिससे मिट्टी खराब हो रही है और फसलें बर्बाद हो रही हैं. ऊपर से गर्मियों में तापमान का 42 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा हो जाना, पानी की जरूरत को जीवन-मरण का सवाल बना देता है. ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स के अनुसार, पाकिस्तान जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले शीर्ष 10 देशों में शामिल है, जिससे सिंध की खेती का पतन और तेजी से हो रहा है.
- एक बड़ा विवादित मुद्दा नहर का वह प्रोजेक्ट था, जिसने प्रांतों को एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा कर दिया. जुलाई 2024 में, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के सह-अध्यक्ष और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने "छह रणनीतिक नहरों" के निर्माण को मंजूरी दी और कहा कि ये कृषि विकास और खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी हैं. जब फरवरी 2025 में चोलिस्तान नहर का उद्घाटन हुआ, तो सिंध में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए. लोगों को डर था कि इस प्रोजेक्ट से उनका जरूरी पानी ऊपर की ओर पंजाब की तरफ मोड़ दिया जाएगा. PPP, जो सिंध में सरकार चलाती है, लेकिन संघीय सरकार की सहयोगी भी है, इस खींचतान में फंस गई. जनता के भारी विरोध के कारण अगस्त 2025 में इस प्रोजेक्ट को रोकना पड़ा, लेकिन इससे जो गहरा गुस्सा सामने आया, वह अब भी बहुत विस्फोटक बना हुआ है.

गिलगित-बाल्टिस्तान: बिना आवाज वाला इलाका
- उत्तर में गिलगित-बाल्टिस्तान (GB) है, जो चीन, भारत और अफगानिस्तान की सीमाओं से लगा एक स्वायत्त और संसाधनों से भरपूर इलाका है. पहले जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा रहे GB पर 1947 से पाकिस्तान का कब्जा है, लेकिन इसे पूरा संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है.
- यहां के लोगों का पाकिस्तान की संसद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. जहां केंद्र सरकार राष्ट्रीय फायदे के लिए GB के बड़े पैमाने पर मौजूद पनबिजली और खनिज संसाधनों का इस्तेमाल करती है, वहीं स्थानीय लोग बेरोजगारी और लंबे समय तक बिजली कटौती से जूझ रहे हैं.
- इस निराशा के कारण स्थानीय कार्यकर्ताओं और 'बालावरिस्तान नेशनल फ्रंट' जैसे समूहों के नेतृत्व में विरोध-प्रदर्शन हुए हैं. फरवरी 2025 में, हजारों लोगों ने डायमर-बाशा बांध के विरोध में एक हफ्ते से ज्यादा समय तक काराकोरम हाईवे को जाम रखा. कुछ महीनों बाद, अप्रैल में, शिगर के स्थानीय लोगों ने जमीन हड़पने और बाहरी लोगों व चीनी कंपनियों को माइनिंग लीज (खनन के पट्टे) दिए जाने के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया.
गायब होती आवाजें: जबरदस्ती गायब किए जाने की कड़वी सच्चाई
आर्थिक असमानता और राजनीतिक तौर पर अलग-थलग किए जाने जैसे गहरे मुद्दों को सुलझाने के बजाय, इस्लामाबाद ने ज्यादातर सैन्य कार्रवाई का सहारा लिया है. इसका सबसे परेशान करने वाला नतीजा "जबरदस्ती गायब किए जाने" की समस्या है. खास तौर पर बलूचिस्तान और KP (खैबर पख्तूनख्वा) के वे एक्टिविस्ट जो संसाधनों के दोहन के खिलाफ आवाज उठाते हैं, अक्सर गायब हो जाते हैं. सरकार के अपने 'कमीशन ऑफ इन्क्वायरी ऑन एनफोर्स्ड डिसअपियरेंस' (COIED) के मुताबिक, 2016 और 2024 के बीच 10,500 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए. स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि असल संख्या इससे कहीं ज्यादा है. अकेले बलूच अलगाववादियों का दावा है कि दशकों में उनके 5,000 से ज्यादा लोग गायब हो चुके हैं. जब तक इस्लामाबाद अपने ही प्रांतों को संसाधनों के स्रोत वाली कॉलोनी की तरह समझना बंद नहीं करता और असल राजनीतिक भागीदारी और मानवाधिकारों पर ध्यान देना शुरू नहीं करता, तब तक पाकिस्तान खुद से ही लड़ता रहेगा.
यह भी पढ़ें-
खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ईरान पर अमेरिकी बमों की बौछार
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं