- अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की कमी के कारण बातचीत जंग में बदल जाती हैं, जिससे अंतिम समझौता कठिन है
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य में नियंत्रण और टोल वसूली को लेकर दोनों देशों के बीच गहरा विवाद और टकराव मौजूद है
- परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच गंभीर मतभेद हैं, जो वार्ता में बाधा हैं
US Iran Ceasefire Deal: ईरान और अमेरिका के बीच 40 दिन के बाद जंग रुक गई है. दोनों देशों के बीच आम सहमति से भले ही दो सप्ताह का संघर्ष-विराम सामने आया हो, लेकिन इससे पैदा हुए सवाल और चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं. इस पूरे संकट ने न सिर्फ पश्चिम एशिया की स्थिरता को हिलाया है, बल्कि अमेरिका की वैश्विक छवि और नेतृत्व पर भी असर डाला है. 2 हफ्ते का समय है और दोनों देशों के बीच तमान ऐसे मुद्दे हैं जिनपर भारी मतभेद है. दोनों देश तो एक साल के अंदर दो बार बातचीत करते करते जंग में उतर चुके हैं. चलिए आपको यहां 5 वजहें बताते हैं कि दोनों के बीच इतने कम वक्त में 'फाइनल डील' मुश्किल क्यों होगी.
1- भरोसे की भारी कमी
अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ी समस्या भरोसे की कमी है. पिछले एक साल में दोनों देशों ने दो बार बातचीत शुरू की, लेकिन हर बार बातचीत के बीच ही युद्ध शुरू हो गया. ऐसे माहौल में किसी भी अंतिम समझौते पर पहुंचना बहुत मुश्किल हो जाता है.
2- हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बड़ा विवाद
अमेरिका चाहता है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह खुली रहे. लेकिन ईरान अपनी भौगोलिक स्थिति का हवाला देकर इस समुद्री रास्ते पर नियंत्रण चाहता है. वो चाहता है कि वह यहां से गुजरने वाले देशों से टोल वसूले. देखना होगा कि 2 हफ्ते में इस मुद्दे पर क्या सहमति बनती है क्योंकि यह दोनों देशों के बीच बड़ा टकराव का मुद्दा है. अभी के लिए सीजफायर के ऐलान के बाद के पहले रिएक्शन में ट्रंप ने इस बात की भी गारंटी दी है कि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य में यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाने में मदद करेगा. उन्होंने कहा कि सकारात्मक कदम उठाए जाएंगे और खूब पैसा कमाया जाएगा.
3- परमाणु कार्यक्रम पर गहरा मतभेद
ईरान का कहना है कि अमेरिका ने उसे यूरेनियम संवर्धन (enrichment) की अनुमति दे दी है, जबकि अमेरिका साफ कह रहा है कि ईरान में कोई भी संवर्धन नहीं होना चाहिए. इस बड़े मतभेद के कारण आने वाले दो हफ्तों की बातचीत बहुत कठिन होने वाली है. न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार एक टेलीफोन इटरव्यू में सीजफायर के बाद जब ट्रंप से पूछा गया कि ईरान के पास मौजूद एनरिच यूरेनियम का क्या होगा तो इसपर ट्रंप ने कहा कि "इसका पूरी तरह से ध्यान रखा जाएगा, अगर ऐसा नहीं होता तो मैं समझौता ही नहीं करता."
4- ट्रंप को इमेज बनाने वाली डील चाहिए
ट्रंप को इन दो हफ्तों में ईरान के साथ ऐसी डील करनी होगी जो ट्रंप की खुद की छवि और उनकी वजह से अमेरिका की छवि पर लगे धब्बे को हटा सके. पहले हुए हमलों और टूटी वार्ताओं के कारण ईरान को अमेरिका की नीयत पर शक है. इतने जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर समझौता आमतौर पर महीनों-सालों लेता है, इसलिए सिर्फ दो सप्ताह की समय सीमा में ऐसी डील बनाना बेहद कठिन है जो ट्रंप को स्पष्ट “जीत” के रूप में पेश की जा सके.
5- ईरान की कमजोर स्थिति और जनता के सामने इमेज
ईरान ने भले अमेरिका को कड़ी टक्कर दी है, लेकिन जंग में उसकी सेना को बड़ा नुकसान भी पहुंचा है. उसकी अर्थव्यवस्था भी बहुत खराब हालत में है. साथ ही सरकार को देश के अंदर विरोध और जनता के गुस्से का भी सामना करना पड़ रहा है. ईरान की सरकार को अमेरिका से ऐसी डील करनी होगी जिसे वो अपनी जनता के सामने जीत के रूप में पेश कर सके. ईरानी सरकार ने जंग के बीच बार-बार कहा कि जंग खत्म करने की एक अनिवार्य शर्त यह होगी कि अमेरिका ईरान को हुए नुकसान की भरपाई करे, फिर से कंस्ट्रक्शन के लिए मुआवजा दे. अमेरिका को यह बात लगभग असंभव लग सकती है. देखना होगा कि क्या इसके बदले अमेरिका होर्मुज में टोल वसूलने की इजाजत देकर दूसरे रास्ते से ईरान को पैसा बनाने की सहूलियत देता है या नहीं.
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