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हैकर्स को हैक करेगा अमेरिका! ट्रंप ने कंपनियों को दी साइबर हमले की छूट- चीन और रूस को कर रहे कॉपी?

अबतक साइबर हमले करने जैसा काम आम तौर पर अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों तक ही सीमित था. अब डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने प्राइवेट कंपनियों को भी इसकी अनुमति दे दी है. जानिए उन्हें क्या शर्तें माननी पड़ेगी.

हैकर्स को हैक करेगा अमेरिका! ट्रंप ने कंपनियों को दी साइबर हमले की छूट- चीन और रूस को कर रहे कॉपी?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कंपनियों को दी साइबर हमले की छूट
  • ट्रंप सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को विदेशी साइबर अपराधियों पर साइबर हमले करने की अनुमति देने का आदेश जारी किया
  • योजना के तहत कंपनियां न्याय विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के साथ मिलकर काम करेंगी, नियमों का पालन करेंगी
  • अमेरिका की साइबर सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव, अब तक साइबर हमले अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों तक सीमित थे

डोनाल्ड ट्रंप की सरकार अब अमेरिकी कंपनियों को हैकर्स पर खुद साइबर अटैक करने की अनुमति देने की तैयारी में है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप सरकार के नए आदेश के तहत कुछ कंपनियां अमेरिकी न्याय विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के साथ मिलकर विदेशी साइबर क्रिमिनल्स के गिरोहों को निशाना बना सकेंगी. व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि इस कदम से हैकिंग के जरिए फिरौती मांगने यानी रैंसमवेयर जैसी डिजिटल समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी. लेकिन कई सवाल भी उठ रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप की सरकार की तैयारी क्या है?

न्यूयॉर्क टाइम्स की इस रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार देर रात एक राष्ट्रीय सुरक्षा आदेश पर हस्ताक्षर किया. इसके तहत कुछ चुनी हुई अमेरिकी कंपनियां न्याय विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के साथ मिलकर विदेशी साइबर अपराधी गिरोहों पर हैकिंग हमला कर सकेंगी. यह काम कुछ तय शर्तों के तहत होगा. इन साइबर हमलों का इस्तेमाल साइबर क्राइम को अंजाम देने वाले विदेशी गिरोहों पर नजर रखने के लिए किया जा सकेगा. इसके अलावा उनके कंप्यूटर सिस्टम और नेटवर्क में रुकावट डालने, जानकारी बदलने या सिस्टम को नुकसान पहुंचाने के लिए हैकिंग की जाएगी. इसमें ऑनलाइन और जमीन पर मौजूद कंप्यूटर सिस्टम, दोनों शामिल होंगे.

इस प्रोग्राम में शामिल होने के लिए कंपनियों की पहले जांच की जाएगी. उन्हें सरकार के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करना होगा, जिसमें नियमों के उल्लंघन पर 1 मिलियन डॉलर का जुर्माना शामिल है. साथ ही, किसी हमले (टेस्ट) को आगे बढ़ाने से पहले उन्हें जस्टिस और होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट के अधिकारियों से लिखित मंजूरी लेनी होगी.

रिपोर्ट के अनुसार अभी यह साफ नहीं है कि कौन-कौन सी कंपनियां इस योजना में शामिल होंगी या कोई कंपनी इसके लिए तैयार होगी भी या नहीं.

लेकिन यह अमेरिका की साइबर सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव है. पिछले कई दशकों में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों सरकारों की नीति मुख्य रूप से कंपनियों के अपने कंप्यूटर सिस्टम को सुरक्षित बनाने पर रही थी. अबतक साइबर हमले करने जैसा काम आम तौर पर अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों तक ही सीमित था.

क्या चीन और रूस से सीख रहे ट्रंप?

इस रिपोर्ट के अनुसार कुछ हद तक, यह नई व्यवस्था अमेरिका को चीन और रूस जैसे अपने मुख्य साइबर-विरोधियों के और करीब लाएगी. इन देशों में जासूसी एजेंसियां ​​लंबे समय से अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मिशनों के लिए प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कॉन्ट्रैक्ट हैकर्स पर निर्भर रही हैं. ताकि सरकार जरूरत पड़ने पर इससे इनकार कर सके. यानी सीधे तौर पर अपनी जिम्मेदारी से बच सके. 

क्यों उठ रहे सवाल?

एक्सपर्ट्स को यह चिंता रही है कि इससे साइबर युद्ध और बढ़ सकता है. इसके अलावा अगर किसी अमेरिकी कंपनी के साइबर हमले से नुकसान होता है, तो उस कंपनी की कानूनी जिम्मेदारी क्या होगी और दूसरे देशों के कानूनों के तहत उस पर क्या कार्रवाई हो सकती है, जैसे सवाल भी उठ सकते हैं. ट्रंप के नए आदेश में इन सभी चिंताओं का सीधा जवाब नहीं दिया गया है. हालांकि, इसमें कहा गया है कि सरकार साइबर हमलों से लगातार बढ़ रहे खर्च और नुकसान को कम करने के लिए “निजी क्षेत्र की नई सोच और क्षमता” का इस्तेमाल करना चाहती है.

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