विज्ञापन

सुखबीर सिंह बादल पर हमला और अकाली दल के राजनीतिक संकट को समझिए

पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री और शिरोमणी अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल पर गुरुवार को महाराष्ट्र के नांदेड़ के एक गुरुद्वारे में हमला हुआ. क्या इस हमले को अकाली दल के राजनीतिक संकट से जोड़ा जा सकता है, बता रहे हैं रविंदर सिंह रॉबिन.

सुखबीर सिंह बादल पर हमला और अकाली दल के राजनीतिक संकट को समझिए
चंडीगढ़:

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल पर गुरुवार को महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक निहंग ने हमला किया. इस हमले ने उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. इसके साथ ही इस घटना ने एक पुराने राजनीतिक सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है. 2015 के बेअदबी विवाद को एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, इसके बाद भी अकाली नेतृत्व और सिखों के कुछ वर्गों के बीच अभी भी भरोसे की कमी बनी हुई है. 

इन दोनों सवालों को एक-दूसरे से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. फिलहाल ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि नांदेड़ में बादल पर हुआ हमला उन राजनीतिक या धार्मिक विवादों से जुड़ा था, जो पिछले कई सालों से उनके साथ जुड़े रहे हैं. हमले की वजह पुलिस जांच में सामने आनी चाहिए, राजनीतिक बयानबाजियों में नहीं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक हमले के आरोप में गिरफ्तार किए गए जसपाल सिंह का कहना है कि उसने यह हमला अचानक किया. शुरुआती जांच में इस बात के भी संकेत मिले हैं कि उसने अकेले ही हमला किया. जांचकर्ता हमले के कारणों का पता लगाने में जुटे हुए हैं. हालांकि, हमले के पीछे कोई राजनीतिक कारण साबित नहीं हुआ है, लेकिन इससे बादल से जुड़ा राजनीतिक संदर्भ खत्म नहीं हो जाता है.

सुखबीर बादल पर अब तक कितने हमले हुए हैं

सुखबीर बादल पर दो साल से भी कम समय में सिख धार्मिक स्थलों पर दो हमले हुए हैं. नांदेड़ की घटना से कुछ ही हफ्ते पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी वायरल हुआ था. इसमें एक सिख व्यक्ति ने दिल्ली एयरपोर्ट पर बादल का विरोध करते हुए उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए थे. इन घटनाओं को सिख समुदाय की राय का प्रमाण नहीं माना जा सकता. लेकिन ये घटनाएं ऐसे समय में हुई हैं, जब यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या बादल की राजनीतिक वापसी, पंथक राजनीति से जुड़े उनके समर्थकों के साथ दोबारा संबंध बनाने की प्रक्रिया से कहीं ज्यादा तेजी से हो रही है. यही इस पूरी कहानी का बड़ा सवाल है.

नांदेड़ के गुरुद्वारे में हमला

13 अगस्त को महाराष्ट्र के नांदेड़ में गुरुद्वारा माता साहिब देवन जी के दर्शन के बाद बादल पर हमला हुआ. हमलावर ने धारदार हथियार से उन पर हमला किया. इसमें उनके हाथ में चोट आई. उन्हें बचाने की कोशिश में उनकी सुरक्षा टीम का एक सदस्य घायल हो गया. हमलावर को मौके पर ही पकड़ लिया गया. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं. अब सवाल यह उठ रहा है कि इतनी कड़ी सुरक्षा वाले नेता के करीब हमलावर आखिर पहुंचा कैसे. 

Sukhbir Singh Badal, SAD, Nanded Gurudwara.jpg

सुखबीर सिंह बादल गुरुवार को महाराष्ट्र के नांदेड़ में अपनी पत्नी हरसिमरत कौर बादल के साथ.

धार्मिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों ने इस हमले की निंदा की है. श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज ने सिख धार्मिक परिसर में हुए इस हमले की कड़ी निंदा की. एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने भी घटना की निंदा करते हुए पूरी जांच की मांग की. वरिष्ठ अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया एनडीटीवी से हुई बातचीत में इस बात को खारिज किया कि हमला बादल के खिलाफ लोगों में मौजूद गुस्से का नतीजा था. उन्होंने इसे जानबूझकर किया हमला बताते हुए घटना की जांच की मांग की.

किसी आपराधिक घटना को सिर्फ राजनीतिक नाराजगी के आधार पर नहीं समझा जा सकता. वहीं दूसरी तरफ बादल से जुड़ी राजनीतिक बहस को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

स्वर्ण मंदिर में चली गोली 

इससे पहले चार दिसंबर 2024 को अमृतसर स्थित श्री दरबार साहिब के प्रवेश द्वार पर बादल सेवा कर रहे थे. यह सेवा श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा दी गई धार्मिक सजा का हिस्सा थी. इसी दौरान नारायण सिंह चौड़ा नाम के एक व्यक्ति ने उनको लक्ष्य करके गोली चला दी. सुरक्षाकर्मियों और वहां मौजूद लोगों ने हमलावर को पकड़ा. इससे बादल बच गए. उस समय बादल किसी चुनावी रैली में नहीं थे और न ही प्रचार कर रहे थे. वह सिख धर्म के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक के बाहर श्री अकाल तख्त साहिब के आदेश का पालन करते हुए सेवा कर रहे थे.

2007 से 2017 के बीच अकाली दल की सरकार में लिए गए कुछ फैसलों और उनसे हुई कुछ गलतियों पर उन्हें तनखैया घोषित किया गया था. इसका मतलब है कि उन्हें धार्मिक रूप से दोषी माना गया था. बादल ने सजा स्वीकार की और सिख धार्मिक स्थलों पर सेवा की.स्वर्ण मंदिर के बाहर हुई गोलीबारी को पूरे सिख समुदाय के गुस्से का सबूत नहीं माना जा सकता. एक व्यक्ति पूरे समुदाय की आवाज नहीं हो सकता. लेकिन यह घटना ऐसे समय में हुई थी, जब बादल के नेतृत्व और पंथक राजनीति को लेकर विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे.

अकाली सरकार में हुई घटनाएं

यह समझने के लिए हमें 2015 में वापस जाना होगा. श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाएं और उसके बाद बहबल कलां में हुई पुलिस फायरिंग अकाली दल-बीजेपी सरकार के लिए एक बड़े संकट में बदल गई थी. डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सिख धर्मगुरुओं द्वारा दी गई माफी और बाद में भारी विरोध के कारण उस माफी को वापस लेने के विवाद ने संकट को और गहरा कर दिया.

किसी दूसरी सरकार के लिए ये मामले शासन, कानून-व्यवस्था या राजनीतिक जवाबदेही के सवाल हो सकते थे.लेकिन शिरोमणि अकाली दल के लिए इसका असर कहीं ज्यादा गहरा था. अकाली दल ने लंबे समय से खुद को केवल एक राजनीतिक पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि सिख और पंथक हितों के प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में पेश किया था.इसलिए जब बेअदबी की घटनाएं हुईं और दोषियों को जल्दी न्याय नहीं मिला, तो गुस्सा सिर्फ सरकार के खिलाफ नहीं था. उस पार्टी के खिलाफ भी था, जिसकी राजनीतिक पहचान लंबे समय से सिख संस्थाओं और पंथक राजनीति से जुड़ी रही थी.ये घटनाएं उस पूरे दौर की राजनीतिक याद का हिस्सा बन गईं.

नांदेड़ के गुरुद्वार में हुए हमले के बाद सुखबीर सिंह बादल को एक स्थानीय अस्पताल ले जाया गया.

नांदेड़ के गुरुद्वार में हुए हमले के बाद सुखबीर सिंह बादल को एक स्थानीय अस्पताल ले जाया गया.
Photo Credit: PTI

बाद में सुखबीर सिंह बादल ने बेअदबी के दोषियों को न्याय दिलाने में अपनी सरकार की विफलता के लिए माफी मांगी.
2024 में श्री अकाल तख्त साहिब के सामने हुई कार्रवाई इससे भी आगे गई. बादल और अकाली दल के अन्य नेताओं से सरकार के दौरान लिए गए फैसलों को लेकर धार्मिक स्तर पर जवाब मांगा गया. इसके बाद बादल ने उन्हें दी गई धार्मिक सजा पूरी की. लेकिन उनके लिए यहां दो अलग-अलग प्रक्रियाएं थीं. एक थी सिख धार्मिक संस्थाओं के सामने प्रायश्चित करना. दूसरी थी मतदाताओं के साथ राजनीतिक संबंध दोबारा बनाना. पहली प्रक्रिया धार्मिक संस्था के फैसले से पूरी हो सकती है. लेकिन दूसरी प्रक्रिया के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं होती.

क्या कहती हैं बादल के विरोध की घटनाएं

यह अंतर हाल ही में उस समय फिर दिखाई दिया, जब सोशल मीडिया पर दिल्ली एयरपोर्ट का एक वीडियो वायरल हुआ.
इसमें एक सिख व्यक्ति ने बादल का कड़ा विरोध किया. उसने उनके नेतृत्व की आलोचना की, उन पर सिख समुदाय को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया और उनसे राजनीति से हट जाने को कहा.

एक बार फिर से यह कहना जरूरी है कि एक नाराज व्यक्ति पूरे पंजाब या दुनिया भर के सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता. इसी तरह किसी वायरल वीडियो को राजनीतिक बदलाव का सबूत भी नहीं माना जा सकता. लेकिन ऐसी घटनाएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे उस बड़े राजनीतिक सवाल से जुड़ती हैं, जिससे अकाली दल कई सालों से जूझ रहा है.
वह सवाल है, पार्टी अपने पारंपरिक पंथक समर्थकों का भरोसा दोबारा कैसे हासिल करेगी?

सुखबीर बादल की असली राजनीतिक चुनौती क्या है

अकाली दल अब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा है. सुखबीर बादल संगठन को फिर से मजबूत करने और पंजाब की प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत के रूप में पार्टी की स्थिति वापस हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. कोई भी पार्टी कुछ ही हफ्तों में अपनी चुनावी रणनीति बदल सकती है. नए पदाधिकारी नियुक्त किए जा सकते हैं, यात्राएं निकाली जा सकती हैं, रैलियां की जा सकती हैं और चुनावी रणनीति बदली जा सकती है. लेकिन अपने पारंपरिक समर्थकों के साथ भावनात्मक रिश्ता दोबारा बनाना बहुत लंबी प्रक्रिया हो सकती है.

राजनीति के जानकारों का मानना है कि 2015 की घटनाओं से गहराई से प्रभावित कई सिखों के लिए मुद्दा सिर्फ यह नहीं था कि पंजाब में किस पार्टी की सरकार है. मुद्दा श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्रता, पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही और उस पार्टी से उनकी उम्मीदों का था, जिसकी पहचान लंबे समय से पंथक राजनीति से जुड़ी रही है.

इससे बादल के सामने कई मुश्किल सवाल खड़े होते हैं. क्या धार्मिक संस्थाओं के स्तर पर माफी मांगने के बाद सिख समुदाय के बड़े हिस्से ने उन्हें माफ कर दिया है? क्या सेवा करने और श्री अकाल तख्त साहिब के आदेश को स्वीकार करने से उन सिखों की सोच बदली है, जिन्होंने अकाली दल से दूरी बना ली थी?

क्या अकाली दल अपनी विश्वसनीयता दोबारा हासिल करने के लिए पर्याप्त काम कर चुका है? और 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सिख युवाओं की नई पीढ़ी 2015 की घटनाओं को उसी राजनीतिक नजरिए से देखती है, जिस नजरिए से उस समय के लोगों ने देखा था?

क्या बादल के माफी मांगने से बदलेंगे हालात

राजनीति के जानकारों का कहना है कि लोकतांत्रिक विरोध और हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए. सुखबीर सिंह बादल के राजनीतिक रिकॉर्ड पर सवाल उठाए जा सकते हैं, उनकी आलोचना की जा सकती है और चुनाव में उन्हें चुनौती दी जा सकती है. लेकिन कोई भी राजनीतिक या धार्मिक नाराजगी किसी व्यक्ति पर शारीरिक हमला करने को सही नहीं ठहरा सकती.
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि नांदेड़ हमले की वजह को लेकर पुलिस जांच पूरी होने तक किसी तरह की अटकल नहीं लगानी चाहिए.

बादल माफी मांग चुके हैं. वह श्री अकाल तख्त साहिब के सामने पेश हो चुके हैं. उन्होंने धार्मिक सजा पूरी की है और अब अपनी पार्टी को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. अब उनके सामने इससे भी मुश्किल परीक्षा है. धार्मिक प्रायश्चित का फैसला कोई धार्मिक संस्था कर सकती है, लेकिन राजनीतिक माफी का फैसला सिर्फ जनता ही कर सकती है.

ये भी पढ़ें: जनगणना में पूछे जाएंगे 40 सवाल... कोविड की वैक्‍सीन कहां लगवाई, जाति भी पूछी जाएगी? लिस्‍ट जारी

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Sukhbir Singh Badal, Akali Dal, Punjab Assembly Election 2027
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com