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6 साल की लड़ाई… और बड़ी जीत! कार्यस्थल भेदभाव के केस में UK कोर्ट से NRI महिला को जानिए कैसे मिला न्याय?

एनआरआई संजू पाल ने लंदन हाई कोर्ट में एंडोमेट्रियोसिस से जुड़े दिव्यांगता भेदभाव के मामले में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है.

6 साल की लड़ाई… और बड़ी जीत! कार्यस्थल भेदभाव के केस में UK कोर्ट से NRI महिला को जानिए कैसे मिला न्याय?
  • यूके में रहने वाली एनआरआई संजू पाल ने छह साल की कानूनी लड़ाई के बाद लंदन हाई कोर्ट में बड़ी जीत हासिल की है
  • संजू पाल ने एंडोमेट्रियोसिस बीमारी से पीड़ित थी जिस कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था
  • Employment Appeal Tribunal ने पहले के फैसले को अपर्याप्त बताया और मामले को नई सुनवाई के लिए भेजा है
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यूके में रहने वाली एनआरआई प्रोफेशनल संजू पाल ने छह साल की कानूनी लड़ाई के बाद लंदन हाई कोर्ट में बड़ी जीत दर्ज की है.  एंडोमेट्रियोसिस जैसी क्रॉनिक बीमारी से जूझ रहीं 41 वर्षीय पाल का मामला अब कार्यस्थल पर दिव्यांगों के साध भेदभाव से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.  संजू पाल ने Equality Act 2010 और Employment Rights Act 1996 के तहत Accenture (UK) Ltd द्वारा अपनाए गए विवादित “up or out” मॉडल को चुनौती दी थी. इस मॉडल के तहत कर्मचारियों को तय समय में प्रमोशन न मिलने पर नौकरी से निकाला जा सकता है. 

Employment Appeal Tribunal (EAT) ने अपने फैसले में साफ कहा कि पहले दिए गए रोजगार ट्रिब्यूनल के निर्णय में एंडोमेट्रियोसिस को लेकर किए गए निष्कर्ष “पूरी तरह अपर्याप्त” थे. EAT ने माना कि मेडिकल सबूत स्पष्ट रूप से दिखाते थे कि पाल इस बीमारी से प्रभावित थीं, लेकिन ट्रिब्यूनल ने उनके दैनिक जीवन पर बीमारी के प्रभाव का सही आकलन नहीं किया.

क्या था पूरा मामला

EAT ने यह भी कहा कि बिना इलाज के स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है, इस पहलू पर भी ट्रिब्यूनल ने विचार नहीं किया. फैसले को खारिज करते हुए मामला नई सुनवाई के लिए एक नए ट्रिब्यूनल को भेज दिया गया है.  2019 में कंपनी ने पाल को सीनियर मैनेजर प्रमोशन न मिलने का हवाला देते हुए अंडरपरफॉर्मेंस के आधार पर नौकरी से निकाल दिया था.

 2022 में रोजगार ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी को अनुचित माना था

 2022 में रोजगार ट्रिब्यूनल ने उनकी बर्खास्तगी को अनुचित तो माना, लेकिन मात्र 4,275 पाउंड का बेसिक अवॉर्ड दिया था. EAT में अब इस मुआवजे की समीक्षा भी की जाएगी.  कानून फर्म Kilgannon & Partners के मुताबिक, EAT ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी की ‘क्षमता' का आकलन केवल उस काम के आधार पर किया जा सकता है जो उनके रोजगार अनुबंध में तय है. यह टिप्पणी “up or out” मॉडल की कानूनी वैधता पर सवाल खड़ा करती है.

संजू पाल ने इस लड़ाई के लिए CrowdJustice प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए फंड जुटाया था. संजू को यूके प्रधानमंत्री का ‘Points of Light Award' भी मिल चुका है, जो भारत और यूके में शिक्षा के लिए उनके सामाजिक कार्यों को मान्यता देता है.

फैसले के बाद पाल ने क्या कहा?

फैसले के बाद पाल ने कहा कि यह बेहद लंबी और थकाने वाली लड़ाई रही है. मैं चाहती हूं कि कार्यस्थल पर अवैध प्रथाएं खत्म हों और क्रॉनिक बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित हों.” Accenture (UK) Ltd ने चल रहे कानूनी मामले पर टिप्पणी करने से इनकार किया है. 
 

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