- SpaceX के एक रॉकेट का चार टन वजनी एक टुकड़ा बुधवार को तेज रफ्तार से चंद्रमा से टकराने वाला है
- रॉकेट का यह हिस्सा दोपहर लगभग 12.05 बजे चंद्रमा की सतह से 8,690 किमी/घंटा की रफ्तार से टकराएगा
- नासा का कहना है कि इस टक्कर से लगभग 60 फीट (18 मीटर) चौड़ा और 12 फीट (चार मीटर) गहरा गड्ढा बनने की उम्मीद है
स्पेस यानी अंतरिक्ष में कुछ खास होने वाला है. दुनिया में सबसे पावरफुल रॉकेट बनाने वाली कंपनी SpaceX के एक रॉकेट का चार टन वजनी एक टुकड़ा, जो पिछले साल से अंतरिक्ष में तैर रहा है, बुधवार को तेज रफ्तार से चंद्रमा से टकराने वाला है. यह चाह कर नहीं किया जा रहा है लेकिन इसने आपदा में अवसर दे दिया है. इस टक्कर से पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है, लेकिन इससे चंद्रमा पर एक नया क्रेटर यानी गड्ढा बनेगा और आगे वैज्ञानिक रिसर्च करने का मौका मिलेगा.
स्कूल बस का आकार और फिर चांद से होगी टक्कर
द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार स्कूल-बस के आकार की यह चीज, जो चांद से टकराने वाली है, दरअसल SpaceX के फाल्कन 9 रॉकेट का दूसरा चरण है. इस रॉकेट ने जनवरी 2025 में फायरफ्लाई एयरोस्पेस के लूनर लैंडर को चंद्रमा की ओर भेजा था. अब रॉकेट का यह हिस्सा भारतीय समयानुसार बुधवार को दोपहर लगभग 12.05 बजे चंद्रमा की सतह से 8,690 किमी/घंटा की रफ्तार से टकराएगा. इस टक्कर से चंद्रमा की धूल का गुबार उठेगा, जो शायद सूरज की रोशनी में चमकेगा, लेकिन पृथ्वी से नंगी आंखों (बिना किसी इक्विपमेंट) से देखना मुश्किल होगा.
नासा का कहना है कि इस टक्कर से लगभग 60 फीट (18 मीटर) चौड़ा और 12 फीट (चार मीटर) गहरा गड्ढा बनने की उम्मीद है. रॉकेट के इस टुकड़े के चंद्रमा के पश्चिमी किनारे पर मौजूद आइंस्टीन क्रेटर से टकराने की उम्मीद है, जिसे पृथ्वी से देखना अक्सर मुश्किल होता है.
यह चांद पर क्रैश क्यों कर रहा?
वैसे आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि रॉकेट का यह हिस्सा धरती पर क्यों नहीं गिरा. दरअसल रॉकेट के इन अलग-अलग हिस्सों को 'स्टेज' कहा जाता है. आमतौर पर रॉकेट के पेलोड (जिसे स्पेस में ले जाया जा रहा है) को कक्षा में सही जगह पर पहुंचाने के बाद ये स्टेज पृथ्वी के वायुमंडल में वापस गिरकर जल जाते हैं या समुद्र में गिर जाते हैं. लेकिन चूंकि जनवरी 2025 के लूनर लैंडर मिशन के लिए पृथ्वी के पास वाले मिशनों की तुलना में ज्यादा जोर (थ्रस्ट) की जरूरत थी, इसलिए रॉकेट का दूसरा चरण अंतरिक्ष में ही रह गया. यह हजारों अन्य अंतरिक्ष मलबे के टुकड़ों के बीच बिना किसी निश्चित दिशा के तैरता रहा.
इस साल की शुरुआत में ही जाकर वैज्ञानिकों को पता चला कि रॉकेट का इस चरण ने अपना बचा हुआ फ्यूल खत्म कर दिया था और इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता, यह एक ऐसे ऑर्बिटल रास्ते पर था जो चंद्रमा पर जाकर खत्म होता है. यानी इसकी टक्कर चांद की सतह से तय थी.
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