- अंतरिक्ष में बेकार सैटेलाइट और रॉकेट के मलबे की वजह से भारी ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति
- भारत सरकार की एजेंसी IN-SPACe ने प्राइवेट स्पेस कंपनियों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की
- गाइडलाइंस के तहत किसी भी स्पेस ऑब्जेक्ट की पृथ्वी पर वापसी के दौरान जोखिम 10000 में 1 से कम होना अनिवार्य है
भारत समेत दुनियाभर के कई देश स्पेस में लगातार अपने सैटेलाइट और रॉकेट भेज रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंतरिक्ष में बेकार सैटेलाइट और रॉकेट का इतना मलबा जमा हो गया है कि वहां भारी ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति है. स्पेस में ग्रेविटी न होने की वजह से यह कचरा हमेशा-हमेशा के लिए वहां जमा रहेगा. ऐसे में अंतरिक्ष से धरती पर सैटेलाइट या रॉकेट का मलबा गिरने की खबरें अक्सर लोगों में दहशत पैदा करती हैं. हाल के सालों में दुनिया के कई हिस्सों में अनियंत्रित रॉकेटों के टुकड़े गिरने की घटनाएं सामने आई हैं. स्पेस के इस कचरे के खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने एक बेहद सख्त कदम उठाया है.
IN-SPACe ने जारी की गाइडलाइंस
भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की नोडल एजेंसी इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) ने प्राइवेट स्पेस कंपनियों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं. इसके तहत अब आसमान से धरती पर लौटने वाले किसी भी स्पेस ऑब्जेक्ट के लिए कड़े सुरक्षा मानक तय कर दिए गए हैं. IN-SPACe ने नई गाइडलाइंस जारी करते हुए कहा है कि निजी स्पेस कंपनियों को किसी भी नियोजित स्पेस ऑब्जेक्ट की री-एंट्री यानी पृथ्वी पर वापसी के दौरान होने वाले नुकसान या किसी व्यक्ति के हताहत होने का जोखिम 10,000 में 1 से कम रखना होगा.
क्या है '10,000 में 1' का नियम?
नई गाइडलाइंस का सबसे अहम हिस्सा 'कैजुअल्टी रिस्क' यानी जान-माल के नुकसान के खतरे को सीमित करना है. आसान भाषा में समझें तो, अगर कोई भारतीय प्राइवेट कंपनी अपने किसी अंतरिक्ष यान, सैटेलाइट या रॉकेट के हिस्से को वापस धरती पर लाती है, तो उससे धरती पर मौजूद किसी इंसान की जान जाने या संपत्ति के नुकसान की आशंका 10,000 में 1 से कम यानी 0.0001% से भी कम होनी चाहिए.
नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी जैसी अंतरिक्ष एजेंसियां ही अब तक इतने कड़े मानकों का पालन करती आई हैं, लेकिन अब भारत ने भी प्राइवेट कंपनियों के लिए इस 'ग्लोबल स्टैंडर्ड' को अनिवार्य कर दिया है.
IN-SPACe, जो निजी संस्थाओं की सभी अंतरिक्ष एक्टिविटी के लिए सिंगल-विंडो एजेंसी है, ने यह भी अनिवार्य कर दिया है कि किसी भी स्पेस ऑब्जेक्ट की री-एंट्री की योजना बनाने वाली भारतीय संस्था को, चाहे वह भारतीय हो या बाहर की, इसके लिए पहले मंजूरी लेनी होगी.
री-एंट्री के लिए लेनी होगी मंजूरी
गाइडलाइंस में कहा गया है, 'जो विदेशी संस्थाएं भारत के क्षेत्र में अपने स्पेस ऑब्जेक्ट की नियोजित री-एंट्री करना चाहती हैं, उन्हें केवल भारत में रजिस्टर्ड संस्थाओं के माध्यम से ही IN-SPACe से मंजूरी लेनी होगी.' इसमें कहा गया है कि कंपनियों को री-एंट्री से जुड़ी सभी गतिविधियां अपने जोखिम और जिम्मेदारी पर करनी होंगी और इससे जुड़ी कोई भी देनदारी भारत सरकार पर नहीं डालनी होगी.
इसी वजह से कंपनियों को पर्याप्त बीमा लेना होगा, जिसमें थर्ड-पार्टी लायबिलिटी इंश्योरेंस भी शामिल होगा. अगर IN-SPACe मंजूरी देते समय इसकी जरूरत बताता है या निर्देश देता है, तो कंपनियों को इसका पालन करना होगा.
गाइडलाइंस में यह भी कहा गया है कि अगर किसी स्पेस ऑब्जेक्ट की री-एंट्री की योजना है, तो मंजूरी के लिए आवेदन करते समय कंपनियों को इसकी जानकारी स्पष्ट रूप से देनी होगी. इसके अलावा अगर कोई कंपनी लॉन्च के बाद री-एंट्री का फैसला करती है और इसकी जानकारी पहले नहीं दी गई थी, तो उसे री-एंट्री की प्रक्रिया शुरू होने से कम से कम छह महीने पहले मंजूरी के लिए आवेदन करना होगा.
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